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Lapoojhanna
1970 के दशक के उत्तरार्ध में, उत्तर भारत के एक छोटे-से क़स्बे रामनगर में बिताए गए एक बचपन का वृत्तांत है ‘लपूझन्ना’। नौ-दस साल के बच्चे की निगाह से देखी गई ज़िंदगी अपने इतने सारे देखे-अदेखे रंगों के साथ सामने आती है कि पढ़ने वाला गहरे-मीठे नॉस्टैल्जिया में डूबने-उतराने लगता है। बचपन के निश्चल खेलों, जल्लाद मास्टरों, गुलाबी रिबन पहनने वाली लड़कियों, मेले-ठेलों, पतंगबाज़ी और फ़ुटबॉल के क़िस्सों से भरपूर ‘लपूझन्ना’ भाषा और स्मृति के बीच एक अदृश्य पुल का निर्माण करने की कोशिश है। सबसे ऊपर यह उपन्यास आम आदमी के जीवन और उसकी क्षुद्रता का महिमागान है जिसके बारे में हमारे समय के बड़े कवि संजय चतुर्वेदी कहते हैं—‘रामनगर की इन कथाओं में लपूझन्ना कोई चरित्र नहीं मिलेगा। समाधि लगाकर देखिए तो लपूझन
224 pages, Paperback
Published January 1, 2022
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Displaying 1 - 30 of 39 reviews
September 10, 2025
मेरी ये बात शायद किताब की ख़ूबसूरती के आगे फीकी लगे, पर फिर भी कहूँगा-लपूझन्ना पढ़ते हुए लगा जैसे मैं अपने ही छत से झाँककर अशोक, लफत्तू और लाल सिंह की दुनिया देख रहा हूँ। नैनीताल और रामनगर की वो गलियाँ, वो धूप, वो शरारतें-सब मेरी ही साँसों के आस–पास थे।✨
शायद इसलिए कि मैं भी नैनीताल की उन्हीं गलियों में बड़ा हुआ हूँ। किताब पढ़ते वक्त कई बार लगा कि ये सब तो मेरी ही यादें हैं, मेरी ही मोहल्ले की कहानियाँ हैं। छोटे शहर की दुनिया अलग होती है। यहाँ आधुनिकता देर से पहुँचती है, और उसी देरी से पैदा होती है नई खोजें। किताब में बच्चों का पेंसिल के छिलके से चुम्बक बनाना, कायपड्डा और पिड्डू जैसे "आइंस्टाइन के जुगाड़"-याद दिलाते हैं कि बचपन की मासूम बेवकूफ़ियाँ ही असल विज्ञान थीं।
मुझे भी अपने बचपन की याद दिला गई-बरसाती ढलानों पर पत्थर के नीचे साबुन लगाकर फिसलना, बुराँश के फूल 🌺तोड़कर रस बनाना, फुटबॉल खेलना जब तक साँस टूट न जाए, संडे की सुबह साइकिल निकालकर पूरे शहर का नक्शा नापना। बौनां के बम-पकौड़े पर लफत्तू की उधारी- कभी जेबों से निकला चमत्कारी कैश, कभी बाक़ीख़ाता-बस यही हमारी असली VIP पास थी, फिर आता झुककर देखा गया सिनेमा, पहाड़ की Netflix।🎞️
लफत्तू तो मेरा भी दोस्त लगने लगा। उसकी बातें- 'बलबाद हो दाएगा लौंदियों के तक्कल में! बेते' जैसे कोई पुराना साथी अब भी कान में फुसफुसा रहा हो।
उसकी हकलाहट भरी सलाहें भी एकदम मासूम- “नैन्ताल कोई थाला इंग्लित मात्तलनी के बाप के जो क्या है कि कोई लामनगल वाला वाँ नईं जा सकता…”- और फिर ज़ोर से हँसकर कहना, “फिल लाल बैलबातम के साथ हैपी नूई कलेगा थाला!”😆
किताब ने वो पहली मोहब्बत भी याद दिला दी- स्कूल के fest में क्रश के लिए गाना डेडिकेट करना, और फिर cyber-cafe की तरफ़ भागना। वहाँ Orkut 💬 खुलता था- जहाँ testimonials ही ‘लव लेटर’ होते थे, scrapbook ही टाइमलाइन। छोटे शहरों की पहली मोहब्बतें वहीं लिखी जाती थीं, मासूम, बेपरवाह और सच।
और धर्म? जिस मासूमियत से ये किताब उसे छूती है-वो नैनीताल की गलियों जैसी ही है। जहाँ दोस्तियाँ मज़हब से ऊपर होती हैं, और मोहब्बत ही सबसे बड़ा धर्म।
कभी-कभी लगा, “अरे य-ये सब तो मैंने भी किया है…” और कभी लगा, काश लफत्तू सच में मेरे साथ पढ़ता और कहता- “बीयोओओई… जली को आग कैते ऐं बेते, बुजी को लाक। औल उथ आग थे निकले बालूद को विछ्छनात कैते हैं।”
और सबसे ज़्यादा याद लाल सिंह की आई- जो अशोक को नैनीताल पढ़ने भेजते वक्त बस अड्डे तक आया, संदूक पकड़ाया और पाँच रुपये थमाकर आँख पोंछते हुए चुपचाप लौट गया। वही दोस्त होते हैं, जो चुपचाप हमारी पीठ पर हाथ रखते हैं।🫂
तो हाँ, लपूझन्ना ने मुझे न सिर्फ अपने बचपन से जोड़ा, बल्कि अपने शहर से भी फिर मिलवाया। इतना कह सकता हूँ कि जो भी हिंदी में सहज है, वो इसे ज़रूर पढ़े। और जब वे पढ़ेंगे तो चेहरे पर वही हल्की मुस्कान बनी रहेगी-जो सिर्फ छोटे शहर की यादों से आती है।
कुछ किताबें पढ़ने से ज़्यादा जी जाती हैं-लपूझन्ना मेरे लिए वैसी ही रही।🙂↕️✨
शहर जितना छोटा होता है आसमान उतना बड़ा! 💛
शायद इसलिए कि मैं भी नैनीताल की उन्हीं गलियों में बड़ा हुआ हूँ। किताब पढ़ते वक्त कई बार लगा कि ये सब तो मेरी ही यादें हैं, मेरी ही मोहल्ले की कहानियाँ हैं। छोटे शहर की दुनिया अलग होती है। यहाँ आधुनिकता देर से पहुँचती है, और उसी देरी से पैदा होती है नई खोजें। किताब में बच्चों का पेंसिल के छिलके से चुम्बक बनाना, कायपड्डा और पिड्डू जैसे "आइंस्टाइन के जुगाड़"-याद दिलाते हैं कि बचपन की मासूम बेवकूफ़ियाँ ही असल विज्ञान थीं।
मुझे भी अपने बचपन की याद दिला गई-बरसाती ढलानों पर पत्थर के नीचे साबुन लगाकर फिसलना, बुराँश के फूल 🌺तोड़कर रस बनाना, फुटबॉल खेलना जब तक साँस टूट न जाए, संडे की सुबह साइकिल निकालकर पूरे शहर का नक्शा नापना। बौनां के बम-पकौड़े पर लफत्तू की उधारी- कभी जेबों से निकला चमत्कारी कैश, कभी बाक़ीख़ाता-बस यही हमारी असली VIP पास थी, फिर आता झुककर देखा गया सिनेमा, पहाड़ की Netflix।🎞️
लफत्तू तो मेरा भी दोस्त लगने लगा। उसकी बातें- 'बलबाद हो दाएगा लौंदियों के तक्कल में! बेते' जैसे कोई पुराना साथी अब भी कान में फुसफुसा रहा हो।
उसकी हकलाहट भरी सलाहें भी एकदम मासूम- “नैन्ताल कोई थाला इंग्लित मात्तलनी के बाप के जो क्या है कि कोई लामनगल वाला वाँ नईं जा सकता…”- और फिर ज़ोर से हँसकर कहना, “फिल लाल बैलबातम के साथ हैपी नूई कलेगा थाला!”😆
किताब ने वो पहली मोहब्बत भी याद दिला दी- स्कूल के fest में क्रश के लिए गाना डेडिकेट करना, और फिर cyber-cafe की तरफ़ भागना। वहाँ Orkut 💬 खुलता था- जहाँ testimonials ही ‘लव लेटर’ होते थे, scrapbook ही टाइमलाइन। छोटे शहरों की पहली मोहब्बतें वहीं लिखी जाती थीं, मासूम, बेपरवाह और सच।
और धर्म? जिस मासूमियत से ये किताब उसे छूती है-वो नैनीताल की गलियों जैसी ही है। जहाँ दोस्तियाँ मज़हब से ऊपर होती हैं, और मोहब्बत ही सबसे बड़ा धर्म।
कभी-कभी लगा, “अरे य-ये सब तो मैंने भी किया है…” और कभी लगा, काश लफत्तू सच में मेरे साथ पढ़ता और कहता- “बीयोओओई… जली को आग कैते ऐं बेते, बुजी को लाक। औल उथ आग थे निकले बालूद को विछ्छनात कैते हैं।”
और सबसे ज़्यादा याद लाल सिंह की आई- जो अशोक को नैनीताल पढ़ने भेजते वक्त बस अड्डे तक आया, संदूक पकड़ाया और पाँच रुपये थमाकर आँख पोंछते हुए चुपचाप लौट गया। वही दोस्त होते हैं, जो चुपचाप हमारी पीठ पर हाथ रखते हैं।🫂
तो हाँ, लपूझन्ना ने मुझे न सिर्फ अपने बचपन से जोड़ा, बल्कि अपने शहर से भी फिर मिलवाया। इतना कह सकता हूँ कि जो भी हिंदी में सहज है, वो इसे ज़रूर पढ़े। और जब वे पढ़ेंगे तो चेहरे पर वही हल्की मुस्कान बनी रहेगी-जो सिर्फ छोटे शहर की यादों से आती है।
कुछ किताबें पढ़ने से ज़्यादा जी जाती हैं-लपूझन्ना मेरे लिए वैसी ही रही।🙂↕️✨
शहर जितना छोटा होता है आसमान उतना बड़ा! 💛
June 26, 2025
बचपन की यादों में लेकर जाता बहुत ही खूबसूरत उपन्यास! हर कोई अपने लफ़त्तू को याद करने लगेगा पढ़ने के बाद। लाल सिंह का वात्सल्य, बंटू का लीचड़पन और लफ़त्तू के कारनामे इस उपन्यास को एक अलग दुनिया में ले जाते हैं । इस उपन्यास का हीरो बचपन है। इस उपन्यास में विस्थापित होकर किसी शहर में आने के सिलसिले से, उस शहर को अपना ब्रह्मांड बना लेना, फिर उसी शहर में लगभग मेहमान जैसे आने तक का सफ़र हैं ।दोस्ती, आशिक़ी, अफ़लातूनी, मस्ती, प्रेम, बेफ़िक्री, दर्द, अकेलापन और वो तमाम जज़्बात जो एक बचपन को बचपाँड़ बनाते हैं, सब हैं। फिर से उन दिनों में लेकर जाने और आजकल जिन शब्दों का प्रयोग लगभग बंद हो चुका हैं उन्हें फिर से पढ़ने का जो मज़ा पांडे जी ने दिया हैं उसके लिए बहुत आभार ♥️
October 27, 2022
अशोक जी की किताब आपको अपने बचपन कि यादों में गुम कर देगी। हममें से हर किसी की जिंदगी में एक लफफत्तू होता है जो हमारे बचपन की यादों का केंद्रबिंदु बन जाता है। हममें से जिसने भी अपना बचपन एक आम शहर में गुजारा है वो इस किताब के एक एक किस्से को अपने से जुड़ा हुआ पाएगा।
June 15, 2025
Rarely does a narrator enhance a book more than the solitary reading experience.
Anil Datt’s captivating narration elevates Ashok Pande’s book, transporting every 80s and 90s kid down memory lane to relive days of mischievous innocence.
Pro tip :
a) Listen in 1.5X+ speed.
b) The book could lose its charm owing to repetition of themes. Enjoy it in short sporadic sessions, than in one continuous go.
Anil Datt’s captivating narration elevates Ashok Pande’s book, transporting every 80s and 90s kid down memory lane to relive days of mischievous innocence.
Pro tip :
a) Listen in 1.5X+ speed.
b) The book could lose its charm owing to repetition of themes. Enjoy it in short sporadic sessions, than in one continuous go.
December 12, 2025
“लपोझन्ना” पढ़ें और महसूस कीजिए 1970 के दशक का बचपन कितना जादुई और मासूम था। अनिल दत्त की सुनाने की कला ने इसे हज़ार गुना रोचक बना दिया है। छोटे शहरों की गलियों में खेलना, दोस्तों के साथ हर छोटी-छोटी शरारतें, और लाफट्टू या लाल सिंह जैसे दोस्तों की दोस्ती की कहानियाँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह कहानी कभी खत्म न हो, और लेखक का बचपन हमेशा जिंदा रहे। यह किताब बचपन की नर्म, प्यारी यादों का पुल बनाती है और दिल को छू जाती है|
September 28, 2024
बचपन की मासूमियत, बचपन बचपन की शरारत, बचपन की फ़िक्रें, बचपन की पक्की यारियाँ, बचपन की ही मोहब्बत को अगर आप अच्छे से मिला दें और मोबाइल फ़ोन के पहले वाली धीमी आँच पर पका लें तो लपूझन्ना नाम का शानदार व्यंजन आपके लिये तैयार है….
July 26, 2026
We could never loved the earth so well if we had no childhood in it. ~ George Eliot
लप्पूझन्ना : अशोक पांडे
एक प्रिय मित्र की अनुशंसा पर—और जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में पुस्तक प्राप्त होने के बाद—मैंने बीते सप्ताहांत अशोक पाण्डेय के उपन्यास लप्पू‑झन्ना का पाठ पूरा किया। शीर्षक‑शब्द “लप्पू‑झन्ना” उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश) की बोलचाल में प्रचलित एक अनौपचारिक अभिव्यक्ति है, जिसका संकेत उन व्यक्तियों की ओर होता है जिन्हें कमज़ोर, ढीले‑ढाले या गंभीरता से न लिए जाने योग्य समझा जाता है—यद्यपि बिहार‑झारखंड जैसे प्रदेशों में इसकी प्रचलिति अपेक्षाकृत कम ही है। कृति प्रथम पुरुष में लिखी गई है और कथावाचक का नाम लेखक के नाम से मेल खाता है; इसी से इसका स्वर पारंपरिक उपन्यास की अपेक्षा बचपन की स्मृतियों का आत्मीय संस्मरण अधिक बन पड़ता है। कथा‑समय 1975–1977 का है—जब कथावाचक लगभग दस‑ग्यारह वर्ष का है—और स्थान रामनगर; प्रत्येक अध्याय उस उम्र की किसी पृथक घटना का जीवंत झरोखा है। पुस्तक की अधिकांश घटनाएँ हास्य‑रस से पुलकित हैं और पढ़ते हुए पाठक अनायास ही खिल उठता है। लेखक का जन्म नवंबर 1966 में हुआ और मैं उनसे ठीक दो वर्ष छोटा हूँ; इसलिए उस दौर की हिंदी फ़िल्मों और आपातकाल (1975–77) के वातावरण के अनेक संदर्भ मेरे भीतर भी स्मृति की गूंज बनकर उठते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ठेठ लोकबोलियों में लिखा गया गद्य सहज, सरस और चलताऊ‑सी फुर्ती लिए है; कई संवाद‑स्थितियाँ इतनी दिलचस्प और मूर्खा‑मिश्रित हैं कि खिलखिला उठना स्वाभाविक हो जाता है।
सबसे दीप्तिमान पात्र है लफ्तू—कथावाचक का प्रिय, भीतर से अत्यंत संवेदनशील पर बाहर से उद्दंड‑उच्छृंखल मित्र। उसकी तुतलाहट‑भरी बेबाक बोली, चोरी की आदत, पढ़ाई से अरुचि, बड़ों के प्रति निर्भय‑अवज्ञा, शोले सिनेमा के संवादों का अकिंचन‑सा पर असरदार शौक़, और गालियों के चुलबुले, कभी‑कभी चमत्कारिक प्रयोग—इन सबके बावजूद वह अविस्मरणीय, स्नेहसिक्त और मनुष्यत्व से भरापूरा लगता है। निस्संदेह वह कथा का ‘किंगपिन’ है—पर अकेला नहीं: लाल सिंह, बंटू और फुच्छी जैसे चरित्र भी अपने‑अपने ढंग से रेखांकित रहते हैं। फिर भी, लफ्तू पुस्तक की आत्मा है—राह भटकता‑सा, पर सोने‑सा दिल लिए; बाह्यतः शोरगुल‑भरा, भीतर से विश्वासयोग्य और कोमल।
कृति में मुरादाबाद, काशीपुर, मेरठ और रामनगर के ठेठ बोलचाल के मुहावरे बार‑बार उभरते हैं। मेरा बचपन रांची में बीता; अतः कई अभिव्यक्तियाँ परिचित होते हुए भी उतनी आत्मीय न लगीं—पर पश्चिमी यूपी या हरियाणा के पाठकों को यह भाषा निश्चय ही घर‑सी प्रतीत होगी। विद्यालय‑जीवन का चित्रण यहाँ बड़ी प्रामाणिकता और विनोदी कटाक्ष के साथ आता है—छोटे कस्बे का प्राथमिक स्कूल, जहाँ विद्यार्थी उद्दंड हैं, शिक्षक उनसे भी अधिक; अनुशासन मानो किसी लोककथा का पात्र हो, उपस्थित नहीं। पढ़ाई न छात्रों की प्राथमिकता है, न शिक्षकों की—और इसी अराजक, पर जीवन्त आलोक में कस्बाई जीवन अपनी सच्ची धड़कन के साथ दर्ज होता है। बार‑बार लौटने वाले दो स्थल विशेष रूप से याद रह जाते हैं—सिनेमा हॉल के पास स्थित बौन्ना की जर्जर दुकान, जहाँ अशोक और लफ्तू बम‑पकौड़ा चट कर जाते हैं; और पास ही लाल सिंह की चाय‑दूकान, जहाँ उनसे कुछ बड़ा लाल सिंह दो नटखटों पर अपना अपनापा उँडेलता है। बम‑पकौड़े का ज़िक्र आते ही मैं अपने किशोर दिनों में लौट गया—रांची के एचईसी टाउनशिप के झोपड़ी मार्केट और सेक्टर‑2 में समोसा (हमारे यहाँ ‘सिंघाड़ा’) और प्याज़‑पकौड़ी का स्वाद जैसे जीभ पर फिर खिल उठा।
मैं शिशु विद्या मंदिर जैसे अनुशासनप्रिय और संस्कृतनिष्ठ हिंदी के आग्रह वाले विद्यालय में पढ़ा हूँ; इसीलिए पुस्तक के अनेक वाक्य‑प्रयोग मुझे कुछ खुरदरे और चुभन‑भरे प्रतीत हुए। फिर भी, पाठानुभव अत्यंत सुखद रहा—अपने ही बचपन, अपने संगी‑साथियों और उन निखालिस दिनों की गलियों में फिर घूमने का अवसर मिला। लेखक किशोरवय की सहज आकर्षण‑भावनाओं (समवयस्क, कभी‑कभी थोड़ी बड़ी लड़कियों की ओर) को भी विनोद और आत्मीयता के साथ स्थान देता है—पचास के उत्तरार्ध में खड़े पाठक को भले यह बालसुलभ लगे, पर इसकी प्रसन्न लहरें हँसा भी देती हैं और छू भी जाती हैं।
एक और प्रसंग जिसने मुझे सुखद आश्चर्य से भर दिया और मुझे कक्षा पाँच से सात के दिनों की अत्यंत आत्मीय स्मृतियों में लौटा दिया, वह था पुस्तक के एक अध्याय में “राजन–इक़बाल” जासूसी उपन्यासों का संक्षिप्त‑सा उल्लेख। इस श्रृंखला से मैं इस कदर जुड़ा हुआ था कि महीने में दो‑तीन उपन्यास पढ़ डालना सामान्य बात थी—कुछ सीमित जेब‑ख़र्च से ख़रीदे जाते, कुछ उधार लिए जाते और कुछ आपसी अदला‑बदली से जुटाए जाते। राजन और इक़बाल जैसे किशोर जासूसों द्वारा अंजाम दी जाने वाली असंभव‑सी लगने वाली गुप्तचर कार्रवाइयों को पढ़ने में जो संतोष मिलता था, उसकी बराबरी कोई और आनंद नहीं कर पाता था। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि घर में इस तरह का पठन न तो प्रोत्साहित किया जाता था और न ही सहन। बार‑बार की चेतावनियों के बावजूद जब मुझ पर कोई असर नहीं हुआ, तो कई पुस्तकों को निर्दयता से फाड़ दिया गया—मानो वही अनुशासन का अंतिम उपाय हो। इसके बावजूद, आज भी मैं राजन‑इक़बाल श्रृंखला और रायदादा की राम‑रहीम शृंखला को बड़े स्नेह और कृतज्ञता के साथ याद करता हूँ। अब यह स्पष्ट होता है कि वही छोटी‑छोटी पुस्तकें मेरे भीतर पुस्तकों के प्रति स्थायी प्रेम का बीज बो गई थीं। मेरे लिए राजन‑इक़बाल ने वही भूमिका निभाई, जो अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़े अनेक विद्यार्थियों के लिए हार्डी बॉयज़ ने निभाई।
लप्पूझन्ना पढ़ते समय जागृत हुई अधिकांश स्मृतियाँ सुखद थीं—पर सभी नहीं। पुस्तक में शिक्षकों को अकसर निरीह छात्रों पर ज़रा‑सी बात पर निर्दय पिटाई करते हुए दिखाया गया है, और ऐसे कई प्रसंग अत्यंत सजीवता से वर्णित हैं। जब‑जब मैं ऐसे अंश पढ़ता, एक पुरानी स्मृति के कारण भीतर तक सिहर उठता। पाँचवीं कक्षा की बात है। हमारे विज्ञान के शिक्षक थे—मनोज बनर्जी गुरुजी—करीब पच्चीस वर्ष के, तेज‑तर्रार और प्रभावशाली व्यक्तित्व के युवक। अपने अधिकांश छात्र जीवन में—प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर तक—मैं शिक्षकों पर कम और स्वाध्याय पर अधिक निर्भर रहा हूँ। एक दिन, जब वे वनस्पति विज्ञान से जुड़ा कोई पाठ पढ़ा रहे थे, मैं अपने ही विचारों में डूबा हुआ था। अनजाने में मैंने अपनी फ़ाउंटेन पेन की ढक्कन से हवा फूँकनी शुरू कर दी, जिससे सीटी जैसी आवाज़ निकल रही थी। उन्होंने कुछ क्षण तक मुझे देखा, फिर मुझे खड़ा होने को कहा और साथ‑साथ एक अन्य छात्र को निर्देश दिया कि वह मैदान से बेहया के पौधे की कुछ मजबूत टहनियाँ ले आए—जो वहाँ प्रचुर मात्रा में उगता था। टहनियाँ आते ही उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया—इतनी देर तक कि सारी टहनियाँ टूट गईं—और मुझे तब तक यह भी समझ नहीं आया था कि मेरा अपराध क्या है। बाद में बताया गया कि कक्षा में सीटी बजाना अक्षम्य अपराध था, क्योंकि वहाँ लड़कियाँ भी थीं और इसे उनके प्रति उद्दंडता माना गया। उस समय मैं मात्र नौ वर्ष का था—कक्षा का शायद सबसे छोटा छात्र—और ऐसी किसी व्याख्या से सर्वथा अनभिज्ञ। स्तब्ध और भयभीत अवस्था में जब मैं घर पहुँचा, तो तेज़ बुख़ार चढ़ चुका था, पर माता‑पिता को सच बताने का साहस नहीं जुटा पाया। उस घटना के बाद मैंने शिक्षकों से यथासंभव दूरी बनाए रखने की कोशिश की। आत्म‑रक्षा की यह अवचेतन प्रवृत्ति मेरे साथ इंजीनियरिंग कॉलेज तक बनी रही—हालाँकि इस बीच मुझे कई अच्छे और संवेदनशील शिक्षक भी मिले। आज भी किसी शिक्षक के सामने खड़ा होना मुझे असहज कर देता है। बचपन का एक अकेला, किंतु गहरा आघात जीवन भर के व्यवहार और मनोवृत्ति को किस तरह आकार दे सकता है—यह उसका प्रमाण है।
मेरी एक छोटी‑सी आपत्ति भाषा की अतिरंजित उद्दंडता को लेकर है। लड़का‑लड़की के स्थान पर लौंडा‑लौंडिया जैसे शब्द पश्चिमी यूपी की बोलचाल में सामान्य हैं, पर बार‑बार का प्रयोग कुछ असहजता ला देता है। इसके अतिरिक्त च—या, ह—मी जैसे सपाट अशिष्ट पद और लड़कियों के लिए माल जैसा संबोधन—ये सब मुझे टाले जा सकने योग्य लगे। मेरा मानना है, संस्मरण का असर भाषा की करकशता पर नहीं, संवेदना की सच्चाई पर टिका होता है; अतः संयत शब्दावली भी समान रूप से प्रभावकारी हो सकती है। बचपन की स्मृति‑यात्रा पर मेरे प्रिय पठनों में मार्क ट्वेन की द एडवेंचर्स ऑफ़ हकलबेरी फ़िन और टॉम सॉयर, तथा रस्किन बॉन्ड की अनेक रचनाएँ शामिल हैं—जिनमें अपने‑अपने भूगोल‑समाज का बाल्यकाल अद्भुत प्रामाणिकता और संयत भाषा के साथ उभरता है। हालाँकि यह आपत्ति अल्प है। जो मुझे खटका, वही अन्य पाठक को और अधिक यथार्थपरक व रसपूर्ण प्रतीत हो सकता है।
समग्रतः लप्पू‑झन्ना एक उत्तम, मनोरंजक और स्मृतिप्रधान कृति है—जिसकी मैं निस्संकोच अनुशंसा करता हूँ। इसे पढ़िए—अच्छा लगेगा। मैं तो अपने दो मित्रों के लिए इसकी दो प्रतियाँ मँगा चुका हूँ; विश्वास है, वे इसे मेरे ही समान स्नेह से पढ़ेंगे।
और अंत में, जो पंक्ति मेरे संग सबसे देर तक ठहरी, वह है लफ्तू का अपनी विशिष्ट तुतलाती ज़ुबान में बोला संवाद—
“जो दल गया, बेते - वो मल गया”
लप्पूझन्ना : अशोक पांडे
एक प्रिय मित्र की अनुशंसा पर—और जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में पुस्तक प्राप्त होने के बाद—मैंने बीते सप्ताहांत अशोक पाण्डेय के उपन्यास लप्पू‑झन्ना का पाठ पूरा किया। शीर्षक‑शब्द “लप्पू‑झन्ना” उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश) की बोलचाल में प्रचलित एक अनौपचारिक अभिव्यक्ति है, जिसका संकेत उन व्यक्तियों की ओर होता है जिन्हें कमज़ोर, ढीले‑ढाले या गंभीरता से न लिए जाने योग्य समझा जाता है—यद्यपि बिहार‑झारखंड जैसे प्रदेशों में इसकी प्रचलिति अपेक्षाकृत कम ही है। कृति प्रथम पुरुष में लिखी गई है और कथावाचक का नाम लेखक के नाम से मेल खाता है; इसी से इसका स्वर पारंपरिक उपन्यास की अपेक्षा बचपन की स्मृतियों का आत्मीय संस्मरण अधिक बन पड़ता है। कथा‑समय 1975–1977 का है—जब कथावाचक लगभग दस‑ग्यारह वर्ष का है—और स्थान रामनगर; प्रत्येक अध्याय उस उम्र की किसी पृथक घटना का जीवंत झरोखा है। पुस्तक की अधिकांश घटनाएँ हास्य‑रस से पुलकित हैं और पढ़ते हुए पाठक अनायास ही खिल उठता है। लेखक का जन्म नवंबर 1966 में हुआ और मैं उनसे ठीक दो वर्ष छोटा हूँ; इसलिए उस दौर की हिंदी फ़िल्मों और आपातकाल (1975–77) के वातावरण के अनेक संदर्भ मेरे भीतर भी स्मृति की गूंज बनकर उठते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ठेठ लोकबोलियों में लिखा गया गद्य सहज, सरस और चलताऊ‑सी फुर्ती लिए है; कई संवाद‑स्थितियाँ इतनी दिलचस्प और मूर्खा‑मिश्रित हैं कि खिलखिला उठना स्वाभाविक हो जाता है।
सबसे दीप्तिमान पात्र है लफ्तू—कथावाचक का प्रिय, भीतर से अत्यंत संवेदनशील पर बाहर से उद्दंड‑उच्छृंखल मित्र। उसकी तुतलाहट‑भरी बेबाक बोली, चोरी की आदत, पढ़ाई से अरुचि, बड़ों के प्रति निर्भय‑अवज्ञा, शोले सिनेमा के संवादों का अकिंचन‑सा पर असरदार शौक़, और गालियों के चुलबुले, कभी‑कभी चमत्कारिक प्रयोग—इन सबके बावजूद वह अविस्मरणीय, स्नेहसिक्त और मनुष्यत्व से भरापूरा लगता है। निस्संदेह वह कथा का ‘किंगपिन’ है—पर अकेला नहीं: लाल सिंह, बंटू और फुच्छी जैसे चरित्र भी अपने‑अपने ढंग से रेखांकित रहते हैं। फिर भी, लफ्तू पुस्तक की आत्मा है—राह भटकता‑सा, पर सोने‑सा दिल लिए; बाह्यतः शोरगुल‑भरा, भीतर से विश्वासयोग्य और कोमल।
कृति में मुरादाबाद, काशीपुर, मेरठ और रामनगर के ठेठ बोलचाल के मुहावरे बार‑बार उभरते हैं। मेरा बचपन रांची में बीता; अतः कई अभिव्यक्तियाँ परिचित होते हुए भी उतनी आत्मीय न लगीं—पर पश्चिमी यूपी या हरियाणा के पाठकों को यह भाषा निश्चय ही घर‑सी प्रतीत होगी। विद्यालय‑जीवन का चित्रण यहाँ बड़ी प्रामाणिकता और विनोदी कटाक्ष के साथ आता है—छोटे कस्बे का प्राथमिक स्कूल, जहाँ विद्यार्थी उद्दंड हैं, शिक्षक उनसे भी अधिक; अनुशासन मानो किसी लोककथा का पात्र हो, उपस्थित नहीं। पढ़ाई न छात्रों की प्राथमिकता है, न शिक्षकों की—और इसी अराजक, पर जीवन्त आलोक में कस्बाई जीवन अपनी सच्ची धड़कन के साथ दर्ज होता है। बार‑बार लौटने वाले दो स्थल विशेष रूप से याद रह जाते हैं—सिनेमा हॉल के पास स्थित बौन्ना की जर्जर दुकान, जहाँ अशोक और लफ्तू बम‑पकौड़ा चट कर जाते हैं; और पास ही लाल सिंह की चाय‑दूकान, जहाँ उनसे कुछ बड़ा लाल सिंह दो नटखटों पर अपना अपनापा उँडेलता है। बम‑पकौड़े का ज़िक्र आते ही मैं अपने किशोर दिनों में लौट गया—रांची के एचईसी टाउनशिप के झोपड़ी मार्केट और सेक्टर‑2 में समोसा (हमारे यहाँ ‘सिंघाड़ा’) और प्याज़‑पकौड़ी का स्वाद जैसे जीभ पर फिर खिल उठा।
मैं शिशु विद्या मंदिर जैसे अनुशासनप्रिय और संस्कृतनिष्ठ हिंदी के आग्रह वाले विद्यालय में पढ़ा हूँ; इसीलिए पुस्तक के अनेक वाक्य‑प्रयोग मुझे कुछ खुरदरे और चुभन‑भरे प्रतीत हुए। फिर भी, पाठानुभव अत्यंत सुखद रहा—अपने ही बचपन, अपने संगी‑साथियों और उन निखालिस दिनों की गलियों में फिर घूमने का अवसर मिला। लेखक किशोरवय की सहज आकर्षण‑भावनाओं (समवयस्क, कभी‑कभी थोड़ी बड़ी लड़कियों की ओर) को भी विनोद और आत्मीयता के साथ स्थान देता है—पचास के उत्तरार्ध में खड़े पाठक को भले यह बालसुलभ लगे, पर इसकी प्रसन्न लहरें हँसा भी देती हैं और छू भी जाती हैं।
एक और प्रसंग जिसने मुझे सुखद आश्चर्य से भर दिया और मुझे कक्षा पाँच से सात के दिनों की अत्यंत आत्मीय स्मृतियों में लौटा दिया, वह था पुस्तक के एक अध्याय में “राजन–इक़बाल” जासूसी उपन्यासों का संक्षिप्त‑सा उल्लेख। इस श्रृंखला से मैं इस कदर जुड़ा हुआ था कि महीने में दो‑तीन उपन्यास पढ़ डालना सामान्य बात थी—कुछ सीमित जेब‑ख़र्च से ख़रीदे जाते, कुछ उधार लिए जाते और कुछ आपसी अदला‑बदली से जुटाए जाते। राजन और इक़बाल जैसे किशोर जासूसों द्वारा अंजाम दी जाने वाली असंभव‑सी लगने वाली गुप्तचर कार्रवाइयों को पढ़ने में जो संतोष मिलता था, उसकी बराबरी कोई और आनंद नहीं कर पाता था। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि घर में इस तरह का पठन न तो प्रोत्साहित किया जाता था और न ही सहन। बार‑बार की चेतावनियों के बावजूद जब मुझ पर कोई असर नहीं हुआ, तो कई पुस्तकों को निर्दयता से फाड़ दिया गया—मानो वही अनुशासन का अंतिम उपाय हो। इसके बावजूद, आज भी मैं राजन‑इक़बाल श्रृंखला और रायदादा की राम‑रहीम शृंखला को बड़े स्नेह और कृतज्ञता के साथ याद करता हूँ। अब यह स्पष्ट होता है कि वही छोटी‑छोटी पुस्तकें मेरे भीतर पुस्तकों के प्रति स्थायी प्रेम का बीज बो गई थीं। मेरे लिए राजन‑इक़बाल ने वही भूमिका निभाई, जो अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़े अनेक विद्यार्थियों के लिए हार्डी बॉयज़ ने निभाई।
लप्पूझन्ना पढ़ते समय जागृत हुई अधिकांश स्मृतियाँ सुखद थीं—पर सभी नहीं। पुस्तक में शिक्षकों को अकसर निरीह छात्रों पर ज़रा‑सी बात पर निर्दय पिटाई करते हुए दिखाया गया है, और ऐसे कई प्रसंग अत्यंत सजीवता से वर्णित हैं। जब‑जब मैं ऐसे अंश पढ़ता, एक पुरानी स्मृति के कारण भीतर तक सिहर उठता। पाँचवीं कक्षा की बात है। हमारे विज्ञान के शिक्षक थे—मनोज बनर्जी गुरुजी—करीब पच्चीस वर्ष के, तेज‑तर्रार और प्रभावशाली व्यक्तित्व के युवक। अपने अधिकांश छात्र जीवन में—प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर तक—मैं शिक्षकों पर कम और स्वाध्याय पर अधिक निर्भर रहा हूँ। एक दिन, जब वे वनस्पति विज्ञान से जुड़ा कोई पाठ पढ़ा रहे थे, मैं अपने ही विचारों में डूबा हुआ था। अनजाने में मैंने अपनी फ़ाउंटेन पेन की ढक्कन से हवा फूँकनी शुरू कर दी, जिससे सीटी जैसी आवाज़ निकल रही थी। उन्होंने कुछ क्षण तक मुझे देखा, फिर मुझे खड़ा होने को कहा और साथ‑साथ एक अन्य छात्र को निर्देश दिया कि वह मैदान से बेहया के पौधे की कुछ मजबूत टहनियाँ ले आए—जो वहाँ प्रचुर मात्रा में उगता था। टहनियाँ आते ही उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया—इतनी देर तक कि सारी टहनियाँ टूट गईं—और मुझे तब तक यह भी समझ नहीं आया था कि मेरा अपराध क्या है। बाद में बताया गया कि कक्षा में सीटी बजाना अक्षम्य अपराध था, क्योंकि वहाँ लड़कियाँ भी थीं और इसे उनके प्रति उद्दंडता माना गया। उस समय मैं मात्र नौ वर्ष का था—कक्षा का शायद सबसे छोटा छात्र—और ऐसी किसी व्याख्या से सर्वथा अनभिज्ञ। स्तब्ध और भयभीत अवस्था में जब मैं घर पहुँचा, तो तेज़ बुख़ार चढ़ चुका था, पर माता‑पिता को सच बताने का साहस नहीं जुटा पाया। उस घटना के बाद मैंने शिक्षकों से यथासंभव दूरी बनाए रखने की कोशिश की। आत्म‑रक्षा की यह अवचेतन प्रवृत्ति मेरे साथ इंजीनियरिंग कॉलेज तक बनी रही—हालाँकि इस बीच मुझे कई अच्छे और संवेदनशील शिक्षक भी मिले। आज भी किसी शिक्षक के सामने खड़ा होना मुझे असहज कर देता है। बचपन का एक अकेला, किंतु गहरा आघात जीवन भर के व्यवहार और मनोवृत्ति को किस तरह आकार दे सकता है—यह उसका प्रमाण है।
मेरी एक छोटी‑सी आपत्ति भाषा की अतिरंजित उद्दंडता को लेकर है। लड़का‑लड़की के स्थान पर लौंडा‑लौंडिया जैसे शब्द पश्चिमी यूपी की बोलचाल में सामान्य हैं, पर बार‑बार का प्रयोग कुछ असहजता ला देता है। इसके अतिरिक्त च—या, ह—मी जैसे सपाट अशिष्ट पद और लड़कियों के लिए माल जैसा संबोधन—ये सब मुझे टाले जा सकने योग्य लगे। मेरा मानना है, संस्मरण का असर भाषा की करकशता पर नहीं, संवेदना की सच्चाई पर टिका होता है; अतः संयत शब्दावली भी समान रूप से प्रभावकारी हो सकती है। बचपन की स्मृति‑यात्रा पर मेरे प्रिय पठनों में मार्क ट्वेन की द एडवेंचर्स ऑफ़ हकलबेरी फ़िन और टॉम सॉयर, तथा रस्किन बॉन्ड की अनेक रचनाएँ शामिल हैं—जिनमें अपने‑अपने भूगोल‑समाज का बाल्यकाल अद्भुत प्रामाणिकता और संयत भाषा के साथ उभरता है। हालाँकि यह आपत्ति अल्प है। जो मुझे खटका, वही अन्य पाठक को और अधिक यथार्थपरक व रसपूर्ण प्रतीत हो सकता है।
समग्रतः लप्पू‑झन्ना एक उत्तम, मनोरंजक और स्मृतिप्रधान कृति है—जिसकी मैं निस्संकोच अनुशंसा करता हूँ। इसे पढ़िए—अच्छा लगेगा। मैं तो अपने दो मित्रों के लिए इसकी दो प्रतियाँ मँगा चुका हूँ; विश्वास है, वे इसे मेरे ही समान स्नेह से पढ़ेंगे।
और अंत में, जो पंक्ति मेरे संग सबसे देर तक ठहरी, वह है लफ्तू का अपनी विशिष्ट तुतलाती ज़ुबान में बोला संवाद—
“जो दल गया, बेते - वो मल गया”
January 27, 2025
अधिकांश लड़कियों की तरह जब मैं छोटी थी तब मैं भी सोचती थी कि काश मैं लड़का होती । ये ख़याल न सिर्फ़ लड़की होने के कारण झेलने वाली असमानताओं के कारण था बल्कि इसके अलावा एक और बड़ा कारण था वह यह कि मुझे पता था कि लड़कियों की अपेक्षा बचपन से ही लड़कों का संसार घर से बाहर के एक ज़्यादा बड़े दायरे में होता है । बाद में मैंने जाना की लड़कियों का जो अपना अलग अनुभव होता है वह भी कोई कम रोचक नहीं । पर लड़कों के इस बड़े दायरे से मुझे ईर्ष्या होती थी । इसलिए शायद वयस्क ज़िंदगी की शुरुआत से ही मुझे लड़कों की दोस्ती रोचक लगती क्योंकि अक्सर वे बचपन के अपने ये क़िस्से सुनाया करते । शायद मीडिया में भी अक्सर पुरुष अपने बचपन की ये कहानियाँ बड़े चाव के साथ सुनाते हैं और ये भी इस रोचकता का कारण है । इस किताब को पढ़ कर यही लगा कि एक वयस्क अपने लड़कपन के क़िस्से सुना रहा है ।
किताब की खूबी बहुत बारीकी से खड़े किए गए चरित्र हैं । यह बारीकियाँ हर चरित्र को उसे दिये गये मज़ाक़िया नाम से भी बहुत सामने आती है चाहे फिर वो ‘दुर्गा दत्त मासाब’ के भाई ‘मुर्ग़ा दत्त मासाब’ हों या ‘घुच्ची’ के खेल को गलती से ‘फ़ुच्ची’ कह देने वाला ‘फ़ुच्ची कप्तान’, चाहे शहर में रहने वाला पड़ौस की अंग्रेज़ी मास्टरनी का भाई ‘लाल बैल बॉटम’ हो या टॉकीज के पास पकौड़े बेंचने वाला बौना ।
एक स्कूल है जहां मास्टर साइंस के एक्सपेरिमेंट के नाम पर महीनों एक ज़िंदा कछुए में बच्चों को उलझा का ख़ुद जासूसी उपन्यास पढ़ते हैं, या कक्षा में शराब सेवन करते हैं, या उन्हें अपनी स्वरचित कविताओं का शिकार बनाते हैं या कि छोटी छोटी बातों में उनकी धुनाई करते हैं । यह सब बहुत रोचकता के साथ लेखक हमें बताता है, उसी चाव के साथ जैसे कोई बचपन का दोस्त आपको बताये । उपन्यास में लड़कपन के मज़ेदार खेल हैं, स्कूल है, फ़िल्मों के डायलॉग हैं, मासूम प्रेम प्रसंग हैं, और सबसे ज़्यादा मज़ेदार चरित्र हैं । लफ़्त्तू लेखक का सबसे
किताब की खूबी बहुत बारीकी से खड़े किए गए चरित्र हैं । यह बारीकियाँ हर चरित्र को उसे दिये गये मज़ाक़िया नाम से भी बहुत सामने आती है चाहे फिर वो ‘दुर्गा दत्त मासाब’ के भाई ‘मुर्ग़ा दत्त मासाब’ हों या ‘घुच्ची’ के खेल को गलती से ‘फ़ुच्ची’ कह देने वाला ‘फ़ुच्ची कप्तान’, चाहे शहर में रहने वाला पड़ौस की अंग्रेज़ी मास्टरनी का भाई ‘लाल बैल बॉटम’ हो या टॉकीज के पास पकौड़े बेंचने वाला बौना ।
एक स्कूल है जहां मास्टर साइंस के एक्सपेरिमेंट के नाम पर महीनों एक ज़िंदा कछुए में बच्चों को उलझा का ख़ुद जासूसी उपन्यास पढ़ते हैं, या कक्षा में शराब सेवन करते हैं, या उन्हें अपनी स्वरचित कविताओं का शिकार बनाते हैं या कि छोटी छोटी बातों में उनकी धुनाई करते हैं । यह सब बहुत रोचकता के साथ लेखक हमें बताता है, उसी चाव के साथ जैसे कोई बचपन का दोस्त आपको बताये । उपन्यास में लड़कपन के मज़ेदार खेल हैं, स्कूल है, फ़िल्मों के डायलॉग हैं, मासूम प्रेम प्रसंग हैं, और सबसे ज़्यादा मज़ेदार चरित्र हैं । लफ़्त्तू लेखक का सबसे
May 17, 2025
कुछ किताबें होती हैं, जो कहीं नहीं ले जातीं। बस वहीं खड़ा कर देती हैं, जहाँ से कभी चले थे। "लपूझन्ना" भी वैसी ही एक किताब है। ना कोई वायदा, ना कोई चालाकी बस एक सीधी आवाज़ "चल बे, वहीँ चलते हैं जहाँ धूल थी, दोस्त थे, और दुनिया सीधी थी।"
कुछ दिन पहले मनीष सर ने इस किताब का ज़िक्र किया था।नाम सुना *लपूझन्ना* तो लगा जैसे कोई पुराना यार नुक्कड़ से चिल्लाया हो, बिना लिहाज़ के, बिना वजह के। मनीष सर किताबों के मामले में वैसे भी हमारे जैसे लोगों के 'लफत्तू' हैं, जो बोलते हैं तो भरोसा होता है।
अशोक पांडे ने लपूझन्ना लिखते वक्त कोई कहानी नहीं गढ़ी। बस गली के मोड़ों से गर्द उड़ाई, छज्जों से टपकती पुरानी बातें उठाईं, और हमारे भीतर जो थोड़ा सा बच्चा अब भी जिंदा था उसके गाल खींच दिए हौले से।
कहानी चार दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है पर जो असल में हर उस लड़के की है, जो घर से बिना बताए घूमता था, जेब में मारबलें खनखनाती थीं।
"लपूझन्ना" तेज़-तर्रार किस्सा नहीं है। ये किताब टहलती है, जैसे बारिश के बाद गलियों में पानी बहता है धीमा, खिलखिलाता हुआ, खुद से बेख़बर।
अशोक की ज़ुबान कोई बनावटी मंच की ज़ुबान नहीं है। ये वही मोहल्ले की भाषा है जहाँ बातें पूरी नहीं होतीं, जहाँ अधूरे वाक्य भी पूरे समझ लिए जाते हैं।
पढ़ते-पढ़ते कई बार लगेगा कोई पीठ थपथपा कर कह रहा है "याद है बे, वो दिन?" और जवाब में हल्की सी गीली हँसी निकलेगी, बिना सोचे, बिना चाहे।
"लपूझन्ना" पढ़ना मतलब थोड़ी देर के लिए फिर से वही बन जाना, जिसे दुनिया डराना भूल गई थी। जहाँ सपने किसी अमरूद की तरह जेब में रखते थे, और जिन्दगी बस उतनी थी जितनी एक गली लंबी होती है।
अगर आपके पास भी कोई 'लफत्तू' था,
अगर आपके लिए भी कोई गली दुनिया से बड़ी थी,
तो फिर लपूझन्ना आपके ही लिए है।
पढ़िए
धीरे-धीरे
जैसे मिट्टी में पानी उतरता है
बिना शोर किए, बस चुपचाप... गहरा...
कुछ दिन पहले मनीष सर ने इस किताब का ज़िक्र किया था।नाम सुना *लपूझन्ना* तो लगा जैसे कोई पुराना यार नुक्कड़ से चिल्लाया हो, बिना लिहाज़ के, बिना वजह के। मनीष सर किताबों के मामले में वैसे भी हमारे जैसे लोगों के 'लफत्तू' हैं, जो बोलते हैं तो भरोसा होता है।
अशोक पांडे ने लपूझन्ना लिखते वक्त कोई कहानी नहीं गढ़ी। बस गली के मोड़ों से गर्द उड़ाई, छज्जों से टपकती पुरानी बातें उठाईं, और हमारे भीतर जो थोड़ा सा बच्चा अब भी जिंदा था उसके गाल खींच दिए हौले से।
कहानी चार दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है पर जो असल में हर उस लड़के की है, जो घर से बिना बताए घूमता था, जेब में मारबलें खनखनाती थीं।
"लपूझन्ना" तेज़-तर्रार किस्सा नहीं है। ये किताब टहलती है, जैसे बारिश के बाद गलियों में पानी बहता है धीमा, खिलखिलाता हुआ, खुद से बेख़बर।
अशोक की ज़ुबान कोई बनावटी मंच की ज़ुबान नहीं है। ये वही मोहल्ले की भाषा है जहाँ बातें पूरी नहीं होतीं, जहाँ अधूरे वाक्य भी पूरे समझ लिए जाते हैं।
पढ़ते-पढ़ते कई बार लगेगा कोई पीठ थपथपा कर कह रहा है "याद है बे, वो दिन?" और जवाब में हल्की सी गीली हँसी निकलेगी, बिना सोचे, बिना चाहे।
"लपूझन्ना" पढ़ना मतलब थोड़ी देर के लिए फिर से वही बन जाना, जिसे दुनिया डराना भूल गई थी। जहाँ सपने किसी अमरूद की तरह जेब में रखते थे, और जिन्दगी बस उतनी थी जितनी एक गली लंबी होती है।
अगर आपके पास भी कोई 'लफत्तू' था,
अगर आपके लिए भी कोई गली दुनिया से बड़ी थी,
तो फिर लपूझन्ना आपके ही लिए है।
पढ़िए
धीरे-धीरे
जैसे मिट्टी में पानी उतरता है
बिना शोर किए, बस चुपचाप... गहरा...
November 25, 2023
लपूझन्ना अशोक पाण्डे का पहला उपन्यास है, और कितना ही खूबसूरत उपन्यास है। रामनगर में बिताए बचपन के दो साल और वहाँ बटोरी यादों को उन्होंने खूबसूरती से पन्नों पर उतारा है। कहानी किसी धीमी गति से चलती रेल के जैसे बढ़ती जाती है, और आप धीरे धीरे उस सफर की चाल में खोते जाते हैं। सबसे खास बात ये की ये किताब हम पढ़ने वाले को भी अपना बचपन जी लेने का दोबारा मौका देती है। कहानी आसान है और अंत आते ही जैसे मुझे लगने लगा की काश अंत ना हो। लेकिन बचपन की तरह, कहानी भी खत्म तो होनी ही है। उपन्यास सभी को पढ़ लेना चाहिए।
March 5, 2024
Dosti yarri pyar dill tutuna emergency and laffattu totally loved it uhu uhu also i have been all the place book talks about so it was like movie running infront of my eyes seeing laffattu doing everything. In last I will say i am laffafu's best friend.
January 18, 2026
लपुझन्ना बचपन की मासूमियत, दोस्ती और शरारतों का ऐसा चित्रण है, जो आपको हँसाएगा भी और भावुक भी करेगा। इसकी पृष्ठभूमि 1970 के दशक का उत्तर भारत है, खासकर रामनगर कस्बा। कहानी एक 9-10 साल के बच्चे की नज़र से उस दौर की सादगी और जीवनशैली को जीवंत करती है।
कहानी की शुरुआत लेखक के पिता के अल्मोड़ा से रामनगर ट्रांसफर होने से होती है। परिवार खेताड़ी मोहल्ले में एक किराए के मकान में रहने लगता है। यह मोहल्ला हिंदू और मुस्लिम बस्तियों के बीच है, जिसे लेखक मज़ाक में “हिंदुस्तान-पाकिस्तान” कहता है। यहाँ मंदिर, मस्जिद, अज़ान, आरती और शहर का शोर, सब कुछ है।
लेखक का सबसे करीबी दोस्त है लफत्तू,एक तोतला लड़का, जिसे एक नंबर का चोर माना जाता है और पढ़ाई में इतना कमजोर कि घर वाले उसे “बौड़म” कहते हैं। लेकिन उसके पास किस्सों और सामान्य ज्ञान का खज़ाना है, जिससे वह लेखक को रोज़ समृद्ध करता है।
कहानी में एक ऐसा स्कूल है, जहाँ पढ़ाई से ज़्यादा बाकी सब होता है। बच्चे अपने शिक्षकों को मज़ेदार उपनाम देते हैं, जैसे अंग्रेज़ी मास्साब को “टोड” (क्योंकि उनकी गर्दन नहीं दिखती), पिचकी नाक वाले को “पिच्चु”, और एक तो “टट्टी मास्साब” भी हैं। लेखक ने बड़े रोचक ढंग से बताया है कि कैसे इन नामों का जन्म हुआ और ये मास्साब क्या-क्या पढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, थ्योरी मास्साब कोयले जैसे रंग के हैं और चित्रकला को “ऑल्ट” तथा भूगोल को “भिगोल” कहते हैं।
अशोक का ज़्यादातर समय लफत्तू के साथ बीतता है, लेकिन उसके अन्य दोस्त भी कहानी में रंग भरते हैं। लाल सिंह, जो पिता की चाय की दुकान संभालता है, थोड़ा बड़ा है, इसलिए उसमें वात्सल्य और संवेदनशीलता है। बंटू, जो थोड़ा लीचड़पन लिए हुए है, लेकिन मज़ेदार है। और एक बौना, जो पकोड़े बेचता है। उसके पकोड़े “बमपकौड़े” कहलाते हैं और ये दोस्तों की जान हैं। कभी घुच्ची में जीते पैसों से, कभी चोरी किए पैसों से, तो कभी घर से मिले इनाम से ये बमपकौड़े खाते हैं।
पास ही एक सिनेमा घर है, जहाँ बौना कम पैसे में फ़िल्म दिखाने का जुगाड़ करता है। कपड़ों में धूल-मिट्टी लग जाती है तो उसके भी मज़ेदार बहाने बनते हैं।
रामनगर का फुटबॉल क्लब, जिसमें स्टार खिलाड़ी मुसलमान हैं, पूरे शहर का चहेता है। सांप्रदायिकता और पूर्वाग्रह हैं, लेकिन बच्चों पर कोई असर नहीं। मोहर्रम के ताज़िये की मिठाई, उर्स का मेला, रामलीला और दशहरा, सब कुछ कहानी में है।
साइकिल के टायर दौड़ाना, आम तोड़ना, नदी में खेलना, छत पर क्रिकेट खेलना, रेल की पटरी पर पैसे रखकर चुंबक बनाने की कोशिश, पेंसिल के छिलकों से सुगंधित रबर बनाने का प्रयोग, ये सब बचपन की यादें ताज़ा कर देते हैं।
एक मज़ेदार प्रसंग है बोर्डिंग स्कूल की परीक्षा का, जहाँ अशोक को टट्टी मास्साब पढ़ाने आते हैं। वहाँ एक होशियार और बातूनी लड़की भी पढ़ती है, जो इस कहानी के मुख्य पात्र यानी अशोक का चौथा प्रेम है। मास्साब का परिवार जब लेखक के घर आता है, तो बच्चे की शरारतें और गंदगी का वर्णन इतना जीवंत है कि आपको सचमुच सफाई करने का मन हो जाए।
लेखक ने उपन्यास को गंभीर नहीं होने दिया। इसमें भावुकता है, कोमलता है, उद्दंडता है, लेकिन सब कहानी को आगे बढ़ाते हैं। लफत्तू की तोतली आवाज़ में गालियाँ भी हैं, जो हँसी ला देती हैं। कहीं ज़ोर से हँसी आती है, तो कहीं मासूमियत मन मोह लेती है। निर्धनता और अभाव दिखते हैं, लेकिन बच्चों का बचपन उनसे प्रभावित नहीं होता। वे जितना है, उतने में ही जीते हैं।
कभी चीनी की सब्ज़ी जैसी चीज़ सुनी है? नहीं ना? लेकिन ये बच्चे वो भी बनाते हैं! लेखक की शैली रोचक है, भाषा में प्रवाह है और आंचलिकता भरपूर। यह छोटे शहर की कहानी है, जहाँ ये लपूझन्ने रहते हैं।
संक्षेप में, लपुझन्ना बचपन की मासूमियत, दोस्ती, शरारतों और उस दौर की सादगी का ऐसा चित्रण है, जो पढ़ते समय आपको हँसाएगा भी और भावुक भी करेगा।
कहानी की शुरुआत लेखक के पिता के अल्मोड़ा से रामनगर ट्रांसफर होने से होती है। परिवार खेताड़ी मोहल्ले में एक किराए के मकान में रहने लगता है। यह मोहल्ला हिंदू और मुस्लिम बस्तियों के बीच है, जिसे लेखक मज़ाक में “हिंदुस्तान-पाकिस्तान” कहता है। यहाँ मंदिर, मस्जिद, अज़ान, आरती और शहर का शोर, सब कुछ है।
लेखक का सबसे करीबी दोस्त है लफत्तू,एक तोतला लड़का, जिसे एक नंबर का चोर माना जाता है और पढ़ाई में इतना कमजोर कि घर वाले उसे “बौड़म” कहते हैं। लेकिन उसके पास किस्सों और सामान्य ज्ञान का खज़ाना है, जिससे वह लेखक को रोज़ समृद्ध करता है।
कहानी में एक ऐसा स्कूल है, जहाँ पढ़ाई से ज़्यादा बाकी सब होता है। बच्चे अपने शिक्षकों को मज़ेदार उपनाम देते हैं, जैसे अंग्रेज़ी मास्साब को “टोड” (क्योंकि उनकी गर्दन नहीं दिखती), पिचकी नाक वाले को “पिच्चु”, और एक तो “टट्टी मास्साब” भी हैं। लेखक ने बड़े रोचक ढंग से बताया है कि कैसे इन नामों का जन्म हुआ और ये मास्साब क्या-क्या पढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, थ्योरी मास्साब कोयले जैसे रंग के हैं और चित्रकला को “ऑल्ट” तथा भूगोल को “भिगोल” कहते हैं।
अशोक का ज़्यादातर समय लफत्तू के साथ बीतता है, लेकिन उसके अन्य दोस्त भी कहानी में रंग भरते हैं। लाल सिंह, जो पिता की चाय की दुकान संभालता है, थोड़ा बड़ा है, इसलिए उसमें वात्सल्य और संवेदनशीलता है। बंटू, जो थोड़ा लीचड़पन लिए हुए है, लेकिन मज़ेदार है। और एक बौना, जो पकोड़े बेचता है। उसके पकोड़े “बमपकौड़े” कहलाते हैं और ये दोस्तों की जान हैं। कभी घुच्ची में जीते पैसों से, कभी चोरी किए पैसों से, तो कभी घर से मिले इनाम से ये बमपकौड़े खाते हैं।
पास ही एक सिनेमा घर है, जहाँ बौना कम पैसे में फ़िल्म दिखाने का जुगाड़ करता है। कपड़ों में धूल-मिट्टी लग जाती है तो उसके भी मज़ेदार बहाने बनते हैं।
रामनगर का फुटबॉल क्लब, जिसमें स्टार खिलाड़ी मुसलमान हैं, पूरे शहर का चहेता है। सांप्रदायिकता और पूर्वाग्रह हैं, लेकिन बच्चों पर कोई असर नहीं। मोहर्रम के ताज़िये की मिठाई, उर्स का मेला, रामलीला और दशहरा, सब कुछ कहानी में है।
साइकिल के टायर दौड़ाना, आम तोड़ना, नदी में खेलना, छत पर क्रिकेट खेलना, रेल की पटरी पर पैसे रखकर चुंबक बनाने की कोशिश, पेंसिल के छिलकों से सुगंधित रबर बनाने का प्रयोग, ये सब बचपन की यादें ताज़ा कर देते हैं।
एक मज़ेदार प्रसंग है बोर्डिंग स्कूल की परीक्षा का, जहाँ अशोक को टट्टी मास्साब पढ़ाने आते हैं। वहाँ एक होशियार और बातूनी लड़की भी पढ़ती है, जो इस कहानी के मुख्य पात्र यानी अशोक का चौथा प्रेम है। मास्साब का परिवार जब लेखक के घर आता है, तो बच्चे की शरारतें और गंदगी का वर्णन इतना जीवंत है कि आपको सचमुच सफाई करने का मन हो जाए।
लेखक ने उपन्यास को गंभीर नहीं होने दिया। इसमें भावुकता है, कोमलता है, उद्दंडता है, लेकिन सब कहानी को आगे बढ़ाते हैं। लफत्तू की तोतली आवाज़ में गालियाँ भी हैं, जो हँसी ला देती हैं। कहीं ज़ोर से हँसी आती है, तो कहीं मासूमियत मन मोह लेती है। निर्धनता और अभाव दिखते हैं, लेकिन बच्चों का बचपन उनसे प्रभावित नहीं होता। वे जितना है, उतने में ही जीते हैं।
कभी चीनी की सब्ज़ी जैसी चीज़ सुनी है? नहीं ना? लेकिन ये बच्चे वो भी बनाते हैं! लेखक की शैली रोचक है, भाषा में प्रवाह है और आंचलिकता भरपूर। यह छोटे शहर की कहानी है, जहाँ ये लपूझन्ने रहते हैं।
संक्षेप में, लपुझन्ना बचपन की मासूमियत, दोस्ती, शरारतों और उस दौर की सादगी का ऐसा चित्रण है, जो पढ़ते समय आपको हँसाएगा भी और भावुक भी करेगा।
March 28, 2022
आज के दौर में हमारे पास अपने पुराने दिनों को याद करने का वक्त बहुत कम होता है, खासकर महानगरों में। लपूझन्ना जैसी कहानी लगभग हर कस्बे, गांवों और छोटे शहरों में होती है। बचपन के कुछ ऐसे दोस्त होते हैं जो ताउम्र याद रहते हैं। अशोक पांडे जी ने लफत्तू के बोलने के अंदाज़ को बखूबी बयां किया है, किताब पढ़ते हुए लफत्तू की आवाज़ कानों में गूंजती महसूस होती है और मुंह उसी तोतली बोली में कुछ बोलने का अभ्यास करने लगता है। लपूझन्ना में बचपन की कहानी के ज़रिए आप 70-80 के दशक के रामनगर के सामाजिक ताने-बाने को जान पाते हैं। साथ ही वहां के भूगोल और इतिहास को भी जानते हैं।
मेरा निजी अनुभव ये रहा है कि इस किताब को पढ़ते वक्त आप अपने बचपन की सैर कर आते हैं और छोटी-छोटी बातों को याद करते हैं। अपने बचपन के साथी, गली-मोहल्ले, स्कूल और टीचर, खेल के मैदान और दुकानें चलचित्र की भांति चलते जाते हैं। कई बार ऐसा हुआ कि एक-दो पृष्ठ पढ़ने में घंटे-दो घंटे लग गए। बचपन की धुंधली स्मृतियों के आधार पर दिमाग अपनी कहानी बनाने लगा। इसके साथ ही भाषा की सरलता कहानी को अलग ही प्रवाह देती है।
अशोक पांडे जी को सोशल मीडिया पर पढ़ता रहता हूं और उनकी लेखन शैली का प्रशंसक हूं। उनकी पहली किताब पढ़ी है। उम्मीद है जल्द ही कुछ और किताबें पढ़ूंगा।
मेरा निजी अनुभव ये रहा है कि इस किताब को पढ़ते वक्त आप अपने बचपन की सैर कर आते हैं और छोटी-छोटी बातों को याद करते हैं। अपने बचपन के साथी, गली-मोहल्ले, स्कूल और टीचर, खेल के मैदान और दुकानें चलचित्र की भांति चलते जाते हैं। कई बार ऐसा हुआ कि एक-दो पृष्ठ पढ़ने में घंटे-दो घंटे लग गए। बचपन की धुंधली स्मृतियों के आधार पर दिमाग अपनी कहानी बनाने लगा। इसके साथ ही भाषा की सरलता कहानी को अलग ही प्रवाह देती है।
अशोक पांडे जी को सोशल मीडिया पर पढ़ता रहता हूं और उनकी लेखन शैली का प्रशंसक हूं। उनकी पहली किताब पढ़ी है। उम्मीद है जल्द ही कुछ और किताबें पढ़ूंगा।
September 19, 2025
Highly recommend the Hindi audiobook version - the regional dialect comes alive beautifully in audio format.
Fair warning: you'll need to bear with the first few chapters while you adjust to the style. But then it starts flowing, and you'll enjoy every character. If you grew up in a small town before the 2000s, you'll relate to everything!
Loved Lafattu and his dialogues! His stammering speech and hilarious lines like "apne paitte kato uncle aur apna taam talo", or "lool is lool" had me cracking up. What a character!
Ashok Pande captures 1970s small-town life perfectly through a child's eyes. The nostalgia, the friendships, the mischief - it all feels incredibly authentic.
Completely enjoyed it and can definitely listen to it again and again. Pure comfort reading that brings back childhood memories.
Fair warning: you'll need to bear with the first few chapters while you adjust to the style. But then it starts flowing, and you'll enjoy every character. If you grew up in a small town before the 2000s, you'll relate to everything!
Loved Lafattu and his dialogues! His stammering speech and hilarious lines like "apne paitte kato uncle aur apna taam talo", or "lool is lool" had me cracking up. What a character!
Ashok Pande captures 1970s small-town life perfectly through a child's eyes. The nostalgia, the friendships, the mischief - it all feels incredibly authentic.
Completely enjoyed it and can definitely listen to it again and again. Pure comfort reading that brings back childhood memories.
Read
January 14, 2024अगर बचपन के दिनों को याद करे तो हमें याद आएगा हमारे मौज मस्ती, बेफिक्री और लड़कपन के दिन और सबसे महत्वपूर्ण चीज जो याद आयेगी वो हैं हमारे बचपन के दोस्त जिनके बिना मौज मस्ती, बेफिक्री और लड़कपन सिर्फ एक शब्द हैं, दोस्ती इन शब्दों को एक नया आयाम देती है और लपूझन्ना कहानी भी इन्ही आयामों पे आधारित है जहां लेखक अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए लिखते है , कहानियों में जिक्र होती है रामपुर में बिताए गए दिनों की, सामाजिक कुरीतियों की और सबसे महत्पूर्ण किरदार और लेखक के अजीज दोस्त लफ्तू की।
कहानी आपको आपके बचपन के दिनों में ले जाती है, ऐसा लगता है आप कहानी के पात्र बनकर उसे जी रहे हैं। अशोक जी की लेखन में एक सादापन झलकता है। कुछ कहानियां आपको मनोरंजक लगेगी, कुछ ज्ञान से परिपूर्ण। मैं इस किताब को पढ़कर बहुत प्रभावित हूं और चाहूंगा कि आपलोग भी इसे जल्द से जल्द पढ़े।
कहानी आपको आपके बचपन के दिनों में ले जाती है, ऐसा लगता है आप कहानी के पात्र बनकर उसे जी रहे हैं। अशोक जी की लेखन में एक सादापन झलकता है। कुछ कहानियां आपको मनोरंजक लगेगी, कुछ ज्ञान से परिपूर्ण। मैं इस किताब को पढ़कर बहुत प्रभावित हूं और चाहूंगा कि आपलोग भी इसे जल्द से जल्द पढ़े।
November 29, 2025
Big picture:
Set in the 1970s, the book paints a vivid portrait of India in that era
The book recounts daily routine of kids in a small town, community gossips, school idiosyncrasies and simple joy of only outdoors to while away time
Review
Nostalgic book, takes you back in time when life was much simpler, no electronics, no social media, limited circle of influence and carefree life
Personally, can relate to playing with kids on the street, eagerly wait for going to a restaurant, wait for guests to eat special food, look at people coming from abroad with awe
Not a book for everyone but enjoyable for the kids of 70s/80s, for a delightful journey back in time
June 25, 2026
हिंदुस्तान के बच्चों का बचपन शब्दों में निचोड़कर ऐसे परोसी गई जैसे लगा कि ये तो मेरी यादें हैं इन तक कैसे पहुँची। मैं उस दौर में पल बढ़ा जब मोबाइल जैसी चीजें नहीं हुआ करती थी कलर का ज़माना था लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में ही बच्चों बीता। और ये शैतानियां, कहानियाँ कुछ कुछ हमारे साथ भी घटी जब हमारे लिए मोहल्ला पार करना बड़ी बात थी। मैं 90 के दशक में पला वो पढ़ाकू बच्चा जो पढ़ाई के साथ साथ इन शैतानियों से, आशिक़ी से खुद को बचा नहीं पाया। ऐसी कुछ यादें ताज़ा कर दी जबकि लपूझन्ना मेरे दौर से भी 2 दशक पहले की कहानी है। एक लेखक होते हुए इस पुस्तक को पढ़कर मुझे बहुत प्रेरणा मिली और शायद मैं कभी अपने बचपन को भी इसी मासूमियत से काग़ज़ पर उतार पाऊं।
September 30, 2022
हल्की-फुल्की और ७० के दशक के बचपने को याद करती हुई।
१९७० के दशक की कहानी, पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की आंखों और उसकी दुनिया को देखने और सीखने के नजरिए से लिखी हुई। थोड़ा आर के नारायणन की 'मालगुडी डेज' या 'स्वामी एंड हिज फ्रेंड्स' से मिलती जुलती। हल्का और मनोरंजक पढ़ने के लिए ठीक-ठाक किताब।
मेरा मन कुछ ज्यादा नहीं लगा इसको पढ़ते हुए, वजह शायद फ्रीक्वेंसी या इम्पेडेंस मिसमैच रहा हो कह नहीं सकता। कुछ जगहों पर यह नौस्टाल्जिया दे गया और आँखों में आँसू भी! कुछेक जगहों पर हँसी और ठहाके भी। कुछ लाइट पढ़ने के इरादे से आप इसे पढ़ सकते हैं, शायद आपको मुझसे ज्यादा बेहतर लगे।
धन्यवाद 🙏🏻
१९७० के दशक की कहानी, पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की आंखों और उसकी दुनिया को देखने और सीखने के नजरिए से लिखी हुई। थोड़ा आर के नारायणन की 'मालगुडी डेज' या 'स्वामी एंड हिज फ्रेंड्स' से मिलती जुलती। हल्का और मनोरंजक पढ़ने के लिए ठीक-ठाक किताब।
मेरा मन कुछ ज्यादा नहीं लगा इसको पढ़ते हुए, वजह शायद फ्रीक्वेंसी या इम्पेडेंस मिसमैच रहा हो कह नहीं सकता। कुछ जगहों पर यह नौस्टाल्जिया दे गया और आँखों में आँसू भी! कुछेक जगहों पर हँसी और ठहाके भी। कुछ लाइट पढ़ने के इरादे से आप इसे पढ़ सकते हैं, शायद आपको मुझसे ज्यादा बेहतर लगे।
धन्यवाद 🙏🏻
April 23, 2025
just beautiful❤
this book was about friendship, school, games and all the things which we all have experienced in our childhood. this book will make you relive the childhood of the author in 70s. this book is based in a small town named Ramnagar and all the things which used to happen there and how there were so many unique and different things. I really enjoyed this book and will highly recommend it to everyone.
this book was about friendship, school, games and all the things which we all have experienced in our childhood. this book will make you relive the childhood of the author in 70s. this book is based in a small town named Ramnagar and all the things which used to happen there and how there were so many unique and different things. I really enjoyed this book and will highly recommend it to everyone.
October 28, 2022
Book was good in parts but at times it felt like extending a way more than needed. End chapter was saviour. May be things which didn't work for me is totle dialogues. I understand book is narrated from the eyes and perspective of a 11 year old but Atishyokti of totlapan caused breakge of flow for me.
September 2, 2024
If you grew up as a millennial and never wondered what it was like when your parents were growing up in a small town back in India, this book is your portal to transform you to that era.
The stories are simple but the whole different era makes it much more enjoyable reading. 3.5/5.
The stories are simple but the whole different era makes it much more enjoyable reading. 3.5/5.
September 29, 2024
यह पुस्तक हर उस इंसान को पढ़ना चाहिए जिन्होंने अपना बचपन किसी छोटे शहर में बिताया हो। इस उपन्यास को protagonist अशोक पांडे के दोस्त लफत्तू को केंद्र बिंदु बनाकर लिखा गया है। बचपन की यादों को ताजा कर देने वाली पुस्तक लपूझन्ना दोस्ती, प्यार, बचपन के खेल आदि को लेकर चलती है और दिल को छू जाती है।
March 23, 2025
The first half was interesting, but then it became repetitive.
But one big thought always came in whenever I was reading this book.
I also wished that I had a friend like Lapattu's character mentioned in the book.
P.S. You can read this book, especially for that character.a
But one big thought always came in whenever I was reading this book.
I also wished that I had a friend like Lapattu's character mentioned in the book.
P.S. You can read this book, especially for that character.a
July 21, 2022
A must read book. Hats off ashok pande ji
May 8, 2023
बेहतरीन।।।♥️♥️♥️
May 24, 2023
Childhood memories
This entire review has been hidden because of spoilers.
May 28, 2023
Only thing i want to say about this book is "i can relate".
March 4, 2024
Nostalgia....
Book will remind you of your childhood if you spent your childhood in small town or village. Really captivating narrative. Go for it.
Book will remind you of your childhood if you spent your childhood in small town or village. Really captivating narrative. Go for it.
September 25, 2024
Behtarin.
February 5, 2026
the book teaches the value of friendship
Displaying 1 - 30 of 39 reviews






















