जाँ निसार अख्तर और उनकी शरीके-हयात सफिया अख्तर को साथ रहने का मौक़ा बहुत कम मिला। उस जमाने में जब औरतों के लिए घर से बाहर जाकर काम करना बहुत आम बात नहीं थी, वे स्कूल में अपनी नौकरी करती रहीं और न सिर्फ अपनी और अपने बच्चों, बल्कि मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जमीन तलाश रहे जाँ निसार साहब के लिए भी हिम्मत जुटाती रहीं।
ये खत उन्होंने इसी संघर्ष के दौरान लिखे। इन खतों में उनकी मुहब्बत और हिम्मत के साथ-साथ उनकी और बेशक जाँ निसार अख़्तर की जिन्दगी खुलती जाती है, साथ ही उनका अपना दौर भी अपने तमाम स्याह-सफ़ेद के साथ रौशन होता जाता है। ये ख़त प्यार और हौसले से भरे एक दिल की अक्काशी करते हैं। ये जादू की तरह असर करते हैं; इनका बेहद ताक़तवर और सधा हुआ 'प्रोज' कहीं आपको रुकने नहीं देता, और इनकी तुर्श मिठास में डूबे डूबे बारहा आपकी आँखें भर आती हैं। बीच में जावेद और सलमान अख्तर, मजाज और इस्मत चुगताई का भी जिक्र है।
सन 1942 से 1953 तक के खत यहां हैं जो ज्यादातर लखनऊ, अलीगढ़, भोपाल से सफिया द्वारा लिखे गए हैं। हैरत है कि जनाब जाँ निसार साहब का कोई भी खत यहां नहीं है। होता तो और रोचक होती यह कलेक्शन। कैंसर से मौत के बाद जाँ निसार साहब ने सफिया के इन खतों को दो जिल्दों में प्रकाशित कराया 'हर्फे आश्ना' और 'जेरे-लब'। इस किताब में इन दोनों जिल्दों में संकलित खतों को दे दिया गया है।