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महाविद्यालय [Mahavidyalaya]

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विनोद कुमार शुक्ल ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने कम कहानियाँ लिखकर भी इस विधा पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। साधारण आय वाले मामूली लोग, उनके छोटे-छोटे जीवन संघर्ष और स्मृतियों का संसार उनकी कहानियों का निर्माण करते हैं। ‘रुपये’ और ‘बोझ’ जैसी उनकी कहानियाँ मामूली लोगों के जीवन में कठिन परिश्रम से कमाए गए रुपयों के मूल्य की कहानियाँ हैं जिनमें ख़ास ढंग का परिवेश और पात्रों का मिज़ाज कहानियों को अविस्मरणीय बनाता है। ‘पेड़ पर कमरा’ प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य की कथा है तो ‘गोष्ठी’ साहित्य में तानाशाही का विरल चित्र है। ‘महाविद्यालय’ को शुक्ल जी की प्रतिनिधि कहानी माना जाता है जहाँ मनुष्य और बाज़ार का द्वन्द्व हमारे समय के विद्रूप का बखान करता है। ‘आदमी की औरत’ और ‘मछली’ शुक्ल के कथा-संसार का स्त्री पक्ष ही नहीं हैं, बल्कि यहाँ पितृसत्तात्मक विचार के विरुद्ध कथाकार की अपनी अर्जित की हुई दृष्टि है। ‘महाविद्यालय’ संग्रह की कहानियों की भंगिमाएँ कहानी के ख़ास शुक्ल-शिल्प का उदाहरण बन गई हैं। अपनी तरह के कथा रस से भरी इन कहानियों को पढ़ना स्मृति और जीवन के संसार में प्रवेश करना है जहाँ कहानीकार आशा और उजास की तमाम सम्भावनाएँ बचाए रखता है।

112 pages, Paperback

Published January 1, 2022

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About the author

Vinod Kumar Shukla

64 books172 followers
Vinod Kumar Shukla (born 1 January 1937) is a modern Hindi writer known for his surreal style that often borders on magic-realism and sometimes move beyond it. His works include the novels Naukar ki Kameez and Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi (A Window lived in a Wall), which won the Sahitya Akademi Award for the best Hindi work in 1999.

His first collection of poems Lagbhag Jai Hind was published in 1971. Vah Aadmi Chala Gaya Naya Garam Coat Pehankar Vichar Ki Tarah was his second collection of poems, published in 1981 by Sambhavna Prakashan. Naukar Ki Kameez (The Servant's Shirt) was his first novel, brought out in 1979 by the same publisher. Per Par Kamra (Room on the Tree), a collection of short stories, was brought out in 1988, and another collection of poems in 1992, Sab Kuch Hona Bacha Rahega.

Vinod Kumar Shukla was a guest littérateur at the Nirala Srijanpeeth in AGRA from 1994 to 1996 during which he wrote two novels Khilega To Dekhenge and the refreshing Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi. The latter has been translated into English by Prof. Satti Khanna of Duke University as A Window Lived in a Wall.

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Profile Image for Avinash Jain.
32 reviews3 followers
June 27, 2024
शुक्ल जी को पढ़कर सबसे पहला ख़्याल यह आया कि अब तक कैसे मैंने ऐसे शुद्ध लेखन के स्वाद को नहीं चखा। सचमुच ये वैसे ही है जैसे कोई बंगाल में रहकर छैना और संदेश से अछूता रह जाये।
इतनी सूक्ष्मता से शुक्ल जी ने अपनी कहानियों में जीवन पिरोया है कि बस लगता है आप 144P की वीडियो क्वालिटी से सीधा 4K क्वालिटी पर पहुंच गये हों।
जिन भावों की कसमसाहट हम सचित्र नहीं देख पाते शुक्ल जी ने उन भावों को प्रतीकात्मकता में उतार लिया है। जैसे पानी से निकाली गई मछली की छटपटाहट किसी किशोरी के हृदय की छटपटाहट बन जाती है, जिसके प्रेमी को उस लड़की का परिवार दुत्कार देना चाहता है। (कहानी-मछली)
"झुंड" को पढ़कर लगता है मानो किसी ने मन को मग्गे-सरी का पकड़ा और उलटकर रिक्त कर दिया।
"पेड़ पर कमरा" पढ़ा तो जाना कि जीवन से हम उतना ही चाहते हैं जितना हमें पसंद है पर जीवन देता वो है जी उसके पास होता है। इसमें आप की पसंद नापसंद का सवाल नहीं। हो सकता है जीवन के दिये में बहुत कुछ आपके पसंद का हो पर कुछ छूट भी जाये।

अजीब अनुभूति है! मुझे शुक्ल जी के कहानियों में संगीत सुनाई देता है। ऐसा लगता है मानो कोई नृत्यात्मक नाटक, मंच पर चल रहा हो। ताल के साथ घटनाऐं होती हैं, थाप पर संवाद होते हैं और सम पर आकर सब ठिठक जाते हैं। अजीब है!

"आदमी की औरत" में उन्होंने एक खूँखार मंज़र को भी सामान्य रूप से सुना दिया है।किंतु किसी खूंँखार बात को साधारणता से कह देने से वो कहीं ज़्यादा खूँखार लगने लग जाती है।

कोई व्यक्ति इतना कल्पनाशील भी हो सकता है! यह आसामान्य प्रतिभा है। शुक्ल जी के पास कोई जादुई सीढ़ी है, जिस प्रयोग कर वे अक्सर किरदारों के अंत: में उतर जाते हैं। मैंने किरदारों को इतने नज़दीक से महसूस बहुत बिरले लेखन में ही किया है। ऐसा लग रहा है मानो मैं इन किरदारों की खाल में घुसा जा रहा हूं!
Profile Image for Harshita Pandey.
43 reviews
September 19, 2022
शुक्ल की सबसे सुंदर कहानियों का संग्रह!!! इतनी सरल दृष्टि से शुक्ल अपने आस पास के जीवन को उसकी मासूमियत, उसकी घिन, उसकी शर्म, उसके घिनौनेपन में सामने लिख देते हैं और ऐसा लगता है जैसे वो बहुत सहज रूप से बस अपनी पलकें झपका रहे हों।

शुक्ल की इन कहानियों को मिस नहीं किया जा सकता.... They are a treat!
18 reviews1 follower
January 18, 2024
इस किताब में कई छोटी छोटी कहानियां, किस्से या डायरी एंट्री जैसा कुछ है। इन्हे आप किसी एक वर्ग में नहीं डाल सकते। इन्हीं सब में से मेरी पसंदीदा पेड़ पर कमरा, आदमी की औरत और महाविद्यालय रहीं। आदमी की औरत कहानी ने मुझे कुछ बेचैन सा कर दिया। रात भर अपने बारे में सोचने को मजबूर किया।
अच्छा महसूस होता है जब कोई आपको यह महसूस करा दे कि बड़ी से बड़ी बात को प्रभाव के साथ आसानी से कहा जा सकता है।
May 5, 2025
इस पुस्तक की बाकी समीक्षाओं को पढ़ के यूँ लगा कि मानो मैं अकेला ही इस महासाहित्य के क्षीरसागर में गोते लगाते हुए भी इसके अमृत तत्व से वंचित हूँ। बाकी सभी तो अभूतपूर्व आनंद में कामोन्मत्त हो इस रचना के रस का पान कर रहे हैं।

मुझ से ही कुछ भूल हुई है यह सोच दोबारा पढ़ा पर फिर वही भूख, वही अतृप्ति। ऐसा क्या विशेष है जो मुझ हतभागे को नहीं दिख रहा। निष्कर्ष यही कि मैं मूर्ख हूँ जो इस पुस्तक को समझ नहीं पाया।

Profile Image for Madhav.
117 reviews6 followers
October 28, 2023
इन कहानियों को पढ़ना नितान्त अनूठा अनुभव है।
आसपास के संसार और विचार का विच्छिन्न और विद्रूप भरा अनुभव। न चाहते हुए भी सोचने को मजबूर करता हुआ - टटोलता और तीखा, कभी हल्की बेचैनी पैदा करता, कभी आसान और कभी जटिल, कविता की तरह छलांग लगाता और कभी थिर पानी में ठहरे हुए बिम्ब की तरह - जैसे भीतर बसे कई अनछुए भूले बिसरे गीतों की अलग-अलग पंक्तियां आपस में हिलोरें लेने लगें।
Displaying 1 - 5 of 5 reviews

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