"एमिनेंट हिस्टोरियन्स" के धूर्ततापूर्ण विमर्श रूपी दुर्ग की दीवारों पर कर्णभेदी कुठाराघात
This review is for the Hindi edition of Maharana, translated superlatively by Shri Diwakar Acharya.
७५ वर्षों के स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति किस सीमा तक परतंत्र रही है, इसका ज्वलंत प्रमाण है डॉ ओमेंद्र रत्नू की पुस्तक "महाराणा" से उजागर होने वाले सत्य। इस पाठक एवं समीक्षक की दृष्टि में पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठ है: पृष्ठ संख्या ३३५, जहाँ डॉ रत्नू केवल काल खंड के पैमाने से, जो समझने में अत्यंत सरल है, इस मिथ्या विमर्श का प्रमाणबद्ध तथा तर्कसंगत खंडन करते हैं कि भारत १००० वर्षो तक (या ८०० वर्षों तक) इस्लामी आक्रमणकारियों के आधीन रहा।
ये अंकगणित इतनी सरल है कि पुस्तकें देखकर जम्हाई लेने वाले पाठक भी इस पृष्ठ को पढ़कर समझ सकते हैं कि "इस्लामी शासन की एक सहस्त्राब्दी " कितना सोचा-समझा तथा पूर्वनियोजित षडयंत्र है।
यदि पुस्तक के गठन एवं संघटन में जाँय, तो वीर रस से ओत-प्रोत यह गद्य पृष्ठ-प्रति-पृष्ठ यह अनवरत अनुभूति कराता है कि यदि इतिहास के कुछ समरों में हिन्दू समाज ने पराजय से संतोष किया, तो कई संघर्षों में अद्वित्तीय विजयरस का सुरापान भी किया है। दिवेर का युद्ध, जो लेखक के अनुसार उनके लिए इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा बना, इस निष्कर्ष का प्रासंगिक उदाहरण है। सन ७१२ CE से १७०७ (औरंगज़ेब की मृत्यु) तक के काल में मेवाड़ के योद्धाओं ने (मुख्यतः) और शेष भारत के भी कई सेनापतियों ने (गौणतः, क्योंकि इस पुस्तक की विषयवस्तु मेवाड़ है) विभिन्न अवसरों पर आक्रमणकारियों को धूल चटाई। वस्तुतः यही इस पुस्तक का उद्देश्य प्रतीत होता है। विदित रहे कि "महाराणा" इतिहास की पुस्तक नहीं है (हम भाग्यशाली हैं कि ये इतिहास की पुस्तक नहीं है, क्योंकि "एमिनेंट हिस्टोरियन्स" के छल के बाद इतिहास से विश्वास उठना एक तार्किक परिणति है।)
"महाराणा" को "इतिहास पर आधारित वीरगाथाएं" कहना श्रेयस्कर होगा। बप्पा रावल से लेकर राजा खुमान प्र.; तुग़लक़ को बंदी बनाने वाले हम्मीर से लेकर महाराणाओं (सर्वश्री कुम्भा, सांगा, प्रताप, अमर, करण, जगत तथा राज सिंह) की वीरता के कल्पनातीत, चकित कर देने वाले, बरबस ही पाठक को नतमस्तक करा देने वाले प्रकरण पुस्तक का मुख्य आकर्षण हैं। रानी पद्मिनी के जौहर तथा चित्तौड़ के जौहर का भी सजीव, लोमहर्षक चित्रण किया गया है। हालांकि लेखक की "एमिनेंट हिस्टोरियन्स" द्वारा गढ़े गए प्रचंड असत्य को तार-तार करने की प्रतिबद्धता इतनी सत्यनिष्ठ है कि कुछ स्थानों पर वह अलिखित श्रुतियों अथवा शासकों के सम्मान में लिखी गयी काव्य रचनाओं को उसी तुला से तौलते हैं जिससे कि पूर्ण-प्रामाणिक, लिखित, तर्क की कसौटी पर अकाट्य इतिहास प्रमाणों को। इससे उनके विमर्श का पैनापन तो लेशमात्र भी कम नहीं होता, किन्तु "महाराणा" को इतिहास कहने के स्थान पर "इतिहास-आधारित वीरगाथाएं" कहने का निर्णय सही अवश्य पतीत होता है। उस दृष्टि से देखा जाय, तो डॉ रत्नू अपने पाठकों की धमनियों में वीर रस का संचार करने में सफल रहे हैं।
* उदासीनता में लिपटा हुआ मस्तिष्क भी साका-जौहर की दारुण कथाओं पर चक्षु अश्रुपूरित करने को बाध्य होगा;
* आलस्य के सागर में गोते लगाती चेतना भी प्रताप के विचारपूर्ण उद्यमों (दिवेर के युद्ध का अम्बुश फार्मेशन) से प्रेरित होगी;
* भीरुता के भंवर में डूबता हतोत्साही भी महाराणा अमर सिंह के भाले (जिसने सेरिमा खान को उसकी सवारी सहित शिला से ठोक मारा था) के तेज से एक पल को वीर शिरोमणि होने का आभास पा उठेगा;
* लोभ के अंतहीन आकाश में विचरता मोहपाशबंदी भी रावत चूँडा के त्याग पर, क्षण भर के लिए ही सही, अपनी तृष्णा पर खिन्न होने से बच न सकेगा। (लेखक का इन्हें "मेवाड़ का भीष्म" कहना एक सार्थक संज्ञा है। और ये तार्किक है कि संभावतः चूँडा का निर्णय, देवव्रत "भीष्म" की महाभारत कथा से प्रेरित हो)
मेवाड़ के प्रति अपने मातृ-तुल्य वात्सल्य (या पुत्र-तुल्य कर्त्तव्य, आपके दृष्टिकोण के अनुसार) के पश्चात भी, डॉ रत्नू यथा-आवश्यक मेवाड़ की रणनीतिक समालोचना भी करते हैं, जैसे बहुविवाह का गृहयुद्ध और राजपूतों में आतंरिक कलह में योगदान। अतः इस मापदण्ड पर, उनकी लेखनी बहुत सीमा तक वस्तुनिष्ठता केंद्रित है। किंचित स्थानों पर पुस्तक का संपादन कुछ और सुगढ़ होता, तो संभवतः इसका प्रवाह और सरस होकर उभरता। कालचक्र से भटक कर आगे-पीछे की घटनाओं को एक साथ संकलित करना और फिर बीते हुए कालखंड पर वापस आना, संपादन के क्षेत्र में आंशिक दुर्बलता का एक और परिचायक है। हालांकि इन बिंदुओं से पुस्तक के व्यापक आकर्षण पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता।
हिंदी अनुवादक श्री दिवाकर आचार्य (जिनका उल्लेख पृष्ठ २५ की एक पंक्ति में ओझल सा है, मुख पृष्ठ पर या प्रथम पर भी नहीं) डॉ रत्नू से कम प्रशंसा के पात्र नहीं हैं। इस समीक्षक ने अंग्रेज़ी की मूल प्रति के भी अंश पढ़े हैं (और हिंदी की तो पूरी पुस्तक ही पढ़ी है), और इसमें बाल बराबर भी संदेह नहीं है कि श्री आचार्य का अनुवाद मूल से बीस ही है, उन्नीस नहीं। भिन्न-भिन्न स्थानों पर पाठकों को ये अनुभव होगा कि मानो हिंदी संस्करण ही मूल हो।
डॉ रत्नू से निवेदन है कि अनुवादक के इस अर्द्ध-भगीरथ प्रयास को न्यायोचित सम्मान देते हुए अगले संस्करण में श्री दिवाकर आचार्य का नाम मुख पृष्ठ पर मुद्रित करवाकर हिंदी पाठकों का भी सम्म्मान बढ़ावें (यही मानक प्रचलन भी है, अर्थात अनुवादक का नाम रेखांकित करना)।
जो भी पाठक, मेवाड़ के (और भारत के) गौरवशाली, वंदनीय तथा प्रेरणादायक अतीत के प्रांगण में बैठकर इस वीरगाथा का रसपान करना चाहें, वो अवश्य इस पुस्तक को पढ़ें एवं पढ़ावें; तथा "एमिनेंट हिस्टोरियन्स" के अब तक असाध्य, असत्य-रूपी गढ़ को ढहाने में और सत्य से साक्षात्कार कराने के यज्ञ में अपना हव्य चढ़ावें।