कोहबर की शर्त एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो गाँवों-बलिहार और चौबेछपरा-का जनजीवन गहन संवेदना और आत्मीयता के साथ चित्रित हुआ है-एक रेखांकन की तरह, यथार्थ की आड़ी-तिरछी रेखाओं के बीच झांकती-सी कोई छवि या आकृति | यह आकृति एक स्वप्न है | इसे दो युवा हृदयों ने सिरजा था | लेकिन एक पिछड़े हुए समाज और मूल्य-विरोधी व्यवस्था में ऐसा स्वप्न कैसे साकार हो ? चन्दन के सामने ही उसके स्वप्न के चार टुकड़े-कुंवारी गुंजा, सुहागिन गुंजा, विधवा गुंजा और कफ़न ओढ़े गुंजा-हो जाते हैं | इतना सब झेलकर भी चन्दन यथार्थ की कठोर धरती पर पूरी दृढ़ता और विश्वास से खड़ा रहता है |
केशव प्रसाद मिश्रा की कृति आपको एक छोटे से गांव के खूबसूरत जीवन में ले जाती है। यह किताब आपको बेहद संवेदनशील और भावुक कर देगी। मैंने यह भी सुना है कि हम आपके हैं कौन और नदिया के पार इस किताब से प्रेरित हैं। मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोलियाँ विशेष रूप से पसंद आयी।
"नदिया के पार" फिल्म तो मैंने कई बार देखी है लेकीन मुझे ये न मालूम था कि इसकी कहानी एक किताब से ली गई है।फिल्म तो काफी अच्छी है ही इसमें कोई संदेह नही।लेकिन फिल्म के गुंजा और चंदन की कहानी का एक सुखद अंत होता है वहीं किताब के गुंजा और चंदन के प्रेम का अंत बहुत दुखद और मार्मिक है। प्रत्येक किताब पढ़ने वाले को किताब के अंत में एक अजीब सा खालीपन,एक अजीब सी बेचैनी होती है,मन में बहुत सारे सवाल उठते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था ,आखिर क्यों उसने समय पर निर्णय नहीं लिया।ऐसी ही बेचैनी पहली बार "सुधा और चंदर" को पढ़ने के बाद हुआ था जिसने अपने प्रेमी को देवता माना लेकीन उसी देवता के गुनाहों की सजा सुधा को भुगतना पड़ा। ये कहानियों वाले पुरुष एक जैसे ही होते हैं चंदर के गुनाहों की सजा सुधा ने भुगता तो वहीं चंदन के सही समय पर सही निर्णय न लेने के कारण गुंजा को दुख झेलने पड़े। पढ़ते-पढ़ते किताबों के पात्रों से इतना जुड़ाव हो जाता है कि पात्रों के सुख और दुख को भी महसूस कर लेते हैं।जब वो खुश होते हैं तो हमारे होंठों पर भी मुस्कुराहट आती है और जब वो दुखी होते हैं तो हमारे भी आँसू गिरते हैं। मन करता है कि काश मैं लेखक होता तो कहानी पलट देता। मुझे भी चंदन पर बहुत क्रोध आया कि तुमने समाज के कारण ,लोग क्या कहेंगे,मान , मर्यादा,कुल की इज्जत के लिए अपने प्रेम का त्याग कर दिया !लोग,समाज तो खुश हो गए ,कुल की इज्जत भी बच गई लेकीन उस बेचारी गुंजा का क्या दोष है जो तुम्हारे कारण इतना दुख झेली। चंदन भी क्या करता अपने बड़े भाई के सम्मान के आगे कुछ बोल न पाया।काश बोल देता बस एक बार कह देता की हाँ, मैं गुंजा से प्रेम करता हूं तो क्या ओमकार भैया मना कर देते? आखिर कैसा लगता होगा आप जिस लड़की से प्रेम करते हैं उसका विवाह आप से न होकर आप ही के बड़े भाई से हो जाए? आखिर कैसा लगता होगा अपनी प्रेमिका को अपने ही घर में चार अलग-अलग रुपों में देखना? ये कहानी है गुंजा के चार रुपों की कुंवारी गुंजा सुहागन गुंजा विधवा गुंजा कफ़न ओढ़ी गुंजा
सबसे पहले यह की इस पुस्तक पर, नदिया के पार और हम आपके है कौन नाम की दो सुंदर फिल्में बन चुकी है । सौभाग्य से मैने दोनो ही नहीं देख रखी थी ,शायद इसीलिए इस पुस्तक को पढ़कर आनंद आया,, यहां कथानक अच्छा था । पुस्तक की कहानी प्रेम, त्याग और परिवार के लिए समर्पण जैसे कुछ भावों पर आधारित है । चंदन, गुंजा, ओंकार, और रूपा इस कहानी के प्रमुख पात्र है । मेरे ख्याल से सुधि हिंदी पाठकों में से अधिकांशतः ने यह पुस्तक या ये फिल्में देख ही रखी होंगी। परिस्थितियों के दबाव में प्रेम और स्वार्थ का त्याग ही इस कहानी का ध्येय है । कहानी का बैकग्राउंड पूर्ण रूप से गांव देहात पर आधारित है, भाषा भी तत्सम तद्भव शब्दो से लबरेज है,,, भाषा और बैकग्राउंड ये दोनो ही इस कहानी की शोभा बढ़ाते है । कहानी पाठक के अंतर्मन तक उतरती है, और ठहरती भी है । अगर आपको हिंदी उपन्यास पढ़ना पसंद है, तो जल्द ही पढ़ लीजिए, यह पुस्तक आपको अच्छी लगेगी ।
“बलिहार” और “चौबेछपरा” के जनजीवन को आप उपन्यास में ही साक्षात जी सकते हैं। जहाँ फिल्म सिर्फ “चन्दन” और “गुंजा” के प्रेम और बलिदान पर आधारित थी वहीँ उपन्यास “चन्दन”, गुंजा और बलिहार के लोगों की कहानी है। लेकिन कोई अगर उपन्यास पढ़े तो उसे पता चल जाएगा की उपन्यास का केंद्र बिंदु सिर्फ – “गुंजा” और “बलिहार” है। उत्तरप्रदेश और बिहार से बीच स्थित जिले बलिया के एक गाँव बलिहार और चौबेछपरा में तब एक सम्बन्ध कायम हो जाता है जब बलिहार के अंजोर तिवारी जो पुरे गाँव के काका थे और चन्दन के माँ-बाप भी के बड़े भतीजे ओंकार के लिए चौबेछपरा के वैद्द की लड़की रूपा का रिश्ता जुड़ा। चन्दन ओंकार का छोटा भाई था तो गुंजा रूपा की छोटी बहन। विवाह की रात कोहबर की रस्म में गुंजा और चन्दन की बीच चलने भी नोक-झोंक दोनों को एक ऐसे रास्ते पर लाकर खड़ा कर देती है जो जाकर उस सागर में गिरता जिसे लोग प्रेम, मोहब्बत, इश्क और चाहत कहते हैं। रूपा जब पहली बार गर्भवती हुई तो गुंजा चौबेछपरा से बलिहार आई जहाँ गुंजा और चन्दन के बीच के प्रेम ने आग पकडनी शुरू कर दी
Just finished... 02.07.2021 amazing experience .... kabhi lga hi nhi ki novel padh rha hun... lga ki isme khud ko dekh rha hun.. isko padhne ke baad ek ajib se bechaini hui...ki kash!! Jab chandan se puch gya ki onkar ke liye gunja kaisi rahegi.... usi samay , wo apne dil ki baat bol deta. Onkar uski baat ko samajhta bhi.... CHANDAN ke ek galti ke karna GUNJA ko mrityu tak kya kya sahna pada..
काका की बीमारी ने जब उनको छोड़ने से इंकार कर दिया तो हारकर चंदन को चौबे छपरा जाना ही पड़ा। बैध जी की दो बेटियां थी बड़ी वाली रूपा - सुंदर, सुशील और सुहड़ और छोटी वाली गूंजा - बेहद अल्हड़ और बेवाक। पहली मुलाकात कुछ ऐसी हुई चंदन की गूंजा से की लड़ पड़े दोनों। वैद्य जी ने यूं तो काका को भला कर दिया कुछ महीने में ही और कंजूस काका की चिंता बढ़ गई कि न जाने कितने पैसे ले लेंगे वैद्य जी इलाज का पर हैरत तो तब हुई जब वैद्य जी ने इलाज करने के लिए पैसे के बदले उनसे ओंकार को मांग लिया रूपा के लिए। फिर क्या था जो धूम धाम से काका ने ओंकार का ब्याह किया की सारा बलिहार बड़ाई करते ना थकता था। उधर चंदन और गूंजा की नोकझोक जो थी की बस थमने का नाम ना लेती। कोहबर में जब चंदन गूंजा से शर्त हार गया तो गूंजा ने शर्त को बाद में कहकर टाल दिया। बारात के संग रूपा ससुराल बलिहार आ गई और अपनी कुछ ही वक़्त में रूपा ने गृहस्थी को संभाल लिया। काका का परिवार संपन्न हो गया। लेकिन जब रूपा गर्भ से हुई तब कोई काम करते ना बनता था। रूपा ने काका की सहमति से गूंजा को मदद के लिए बुला लिया। वक़्त के साथ में गूंजा और चंदन की लड़ाई प्रेम में तब्दील होने लगी। सब कुशल मंगल चल रहा था लेकिन ना जाने किसकी नज़र लगी कि काका चल बसे और फिर रूपा ने भी संसार त्याग दिया। घर की हालत देख वैद्य जी ने बड़ी बेटी के उजड़े घर को बसाने के लिए छोटी बेटी का ब्याह भी उसी घर में करने की ठान ली। गूंजा ने इस वहम में की चंदन से उसका ब्याह होगा खुशी से फूले ना समा रही थी लेकिन जब सगुन के वक़्त ओंकार को देखा तो पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस च��दन की पत्नी बन घर में आना चाहती थी उसी चंदन की भौज़ाई बन घर में आ गई तो गूंजा की ज़िंदगी से सारा उमंग खत्म हो गया। .
कहने को तो कहानी के ऊपर फिल्मों का निर्माण हुआ है लेकिन कहानी फिल्म से कहीं ज्यादा है और बेहतर भी। कहानी की शुरूआत तो वैसे ही होती है जैसे 'नदिया के पार' फिल्म में देखी है लेकिन अंत बहुत ही अलग है। लेखन बेहद आकर्षक है। गांव के पृष्टभूमि पर लिखी गई कहानी में देहाती शब्दों का इस्तेमाल है जो इसे ख़ास बनाती है। लेकिन जिनको देहाती शब्दों का ज्ञान नहीं है उन्हें पढ़ने में परेशानी होगी। इस किताब को पढ़ते वक़्त वह गांव और परिवेश आंखों के आगे घूमने लगता है जिसे एक वक़्त को हमने देखा और जिया था। एक खूबसूरत एहसास के संग संग एक मार्मिक अंत है।
उत्तर प्रदेश के गाँव बलिहार और चोबेछपरा, सोना नदी के बढ़ते-घटते पानी, दीपासत्ती का मन्दिर, खेत-खलिहानों के बीच मानव जीवन और प्रेम को उद्भासित करती एक सुन्दर अपितु मार्मिक कथा।
When I started reading I had already seen the movie and did not know this book even existed ago. This is fastest book I ever read. Once started this book only gets more and more interesting. Story based in a small village in Eastern Uttar Pradesh instantly makes you miss your village. Story of a typical village family how life takes turns when Gunja falls in love with her sister's brother-in-law Chandan and wants to marry him. Gunja does make it to Chandan's home, but not as she had wished for. This book has an excellent depiction of village life and their day-to-day problems and difficulties. Book has a lot of words that are used in villages and that works as jewel in the crown. Words like Goru, Banihar, Pagaha, Ankwar, etc. just connect you to their daily lives and the characters feels like you have known them for ages.
The story deals with the truths of life and life does not always have a happy ending. A must read for all hindi lovers.
कोहबर की शर्त एक ऐसा उपन्यास है जो आपको प्रेम और मजबूरी में बंधे इंसान के बारे में बताता है । इस उपन्यास में ग्रामीण परिवेश का चित्रण बहुत ही रोचक तरीक़े से किया गया है । चार किरदारों के इर्द-गिर्द लिखा यह उपन्यास शुरू से अंत तक आपको अपनी कहानी में बांधे रखेगा और आप हर किरदार के जीवन से जुड़ पाएंगे । इस उपन्यास पर आधारित 2 फिल्मों को बनाया गया है " नदिया के पार " और " हम आपके हैं कौन " मगर वहाँ अंत अलग रखा गया है । हर किरदार यहाँ अपने अपने भाग्य से लड़ता और हारता नज़र आता है मगर ध्यान से देखो तो समझ आएगा इस तरह का बलिदान और त्याग देना मुमकिन ही नहीं आज के माहौल में । और सबसे दुःख मयी जीवन तो उसे जीना होता है जिसने खो दिया होता है अपना भाई और अपनी प्रेमिका को जिसे उसको अपने भाभी के रूप में स्वीकार करना पड़ता है । ये पढ़ते हुए आप किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायेंगे कि दोष क्या बड़े भाई का है जिसने समय रहते आवाज़ नहीं उठाई या छोटे भाई का जो चाहता तो सच से सबको अवगत करा सकता था । रिश्तों के दरमियाँ उलझी बहुत ही सरल भाषा में लिखी एक उपन्यास जो दिलों में घर कर जाती है " कोहबर की शर्त " । कोहबर की प्रथा उत्तरप्रदेश में होती है शादी के दौरान ।
कोहबर की शर्त उपन्यास में गाँव का चित्रण, दो परिवारों के ऊपर आई आपदा और चंदन का जीवन उकेरा गया है । कहानी में गुंजा, ओमकार, बैदजी, काका और एक नदी का ज़िक्र लगातार होता रहता है परंतु चंदन के जीवन में आये दुःखों का गंतव्य पाठकों को द्रवित कर देता है । मैं तो ये समझता हूँ कि लेखक ने चंदन को ज़िंदा रख कर बहुत बड़ी सज़ा दी है । इस उपन्यास में एक किरदार " चंदन " एक लड़की से प्यार करता है और उसी लड़की को 4 तरह से देखता है १- कुंवारी गुंजा २- सुहागिन गुंजा ३- विधवा गुंजा ४- कफ़न ओढ़े हुए गुंजा इस दर्द को महसूस करिए और जानिए क्यों और किस परिस्थितियों में ऐसा हुआ और चंदन ने किस तरह इस दर्द को झेला या चंदन के साथ क्या हुआ । चंदन के जीवन में आये आँधी को जानने के लिए आप इस उपन्यास को जरूर पढ़ें । ⠀ / तरुण पाण्डेय
“कोहबर की शर्त” एक बहुत ही भावुक और दर्द भरी कहानी है जो पढ़ने के बाद दिल को गहराई से छू जाती है। इसकी कहानी इतनी मार्मिक है कि यह किसी को भी अंदर तक हिला देती है और इसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इस उपन्यास के पात्रों का प्रभाव इतना गहरा है कि यह मन की सारी नकारात्मकता को साफ कर देता है और कुछ समय के लिए मन शुद्ध और पवित्र हो जाता है।
केशव प्रसाद मिश्रा की कृति आपको एक छोटे से गांव के सुंदर जीवन में ले जाती है, जहां गांव की सादगी और चंदन-गुंजा का प्यार आपको आकर्षित करता है। हालांकि अंत में दुख होता है, लेकिन उनके प्यार की गहराई उसे भी कम कर देती है। लेखक ने इतनी खूबसूरती से लिखा है कि समझ नहीं आता कि कैसे बयां करूं। मन में सवाल भी उठता है कि लेखक ने ऐसा कहानी का अंत क्यों चुना।
कहानी में गुंजा और चंदन दो पड़ोसी गांवों के मध्यम वर्गीय ब्राह्मण परिवारों से हैं। गुंजा की बड़ी बहन रूपा की शादी चंदन के बड़े भाई ओंकार से होती है, जिससे गुंजा और चंदन एक-दूसरे से परिचित होते हैं। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। लेकिन जब रूपा की मृत्यु हो जाती है, तो गुंजा की शादी ओंकार से कर दी जाती है। गुंजा और चंदन का संघर्ष शुरू होता है, क्योंकि वे एक ही घर में रहते हुए अपने प्यार और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने की कोशिश करते हैं।
उपन्यास में चंदन और गुंजा का प्रेम एक दर्दनाक और घुटन भरी कहानी है। इसमें उनकी पीड़ा, संत्रास और बेचैनी को बहुत ही मार्मिक तरीके से दिखाया गया है। “नदिया के पार” और “हम आपके है कौन” इस उपन्यास पर आधारित प्रसिद्ध फ़िल्में है।
यह कहानी जीवन की सच्चाई से जुड़ी है और जीवन का अंत हमेशा सुखद नहीं होता। यह सभी हिंदी प्रेमियों के लिए अवश्य पढ़ी जाने वाली कहानी है। ज़रूर पढ़े!❤️
TIL Nadiya ke paar was based on this book. This book is much more than what Nadiya ke paar had offered in terms of story, emotional depth, and character development. The novel explores complex relationships, cultural nuances, and family dynamics with greater intensity, making it a richer, more immersive experience overall
Very beautiful story of aeastern up nice loketion .netural scean emotions inevry part.beautifull carrecter in each.village. Life is Very fascinating of place
उपन्यास - कोहबर की शर्त लेखक - केशव प्रसाद मिश्र प्रकाशन वर्ष - १९६५
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव बलिहार और चौबेछपरा इस उपन्यास की कथा भूमि है। काका (राम अंजोर तिवारी) के मुंहबोले लड़के ओंकार का विवाह बैद्य जी की लड़की रूपा से होता हैं । ओंकार का छोटा भाई चंदन और रूपा की छोटी बहन गूंजा के बीच प्यारी नोक झोक का वर्णन कोहबर से शुरू होती हैं जिसका वर्णन काफी सादगी और प्यारे ढंग से किया हैं। कहानी इन्हीं चार मुख्य किरदार के आस पास बुनी गई हैं इनके अलावा वैद्य जी, बीहंसी, बाला, पचीसा, दशरथ जैसे सहायक पात्र उपन्यास में नए रंग भर देते हैं। एक परिवार में स्त्री की उपस्थिति की आवश्यकता का सुन्दर चित्रण किया हैं। कोहबर की शर्त एक विवाह की रस्म हैं कहानी इसके इर्द गिर्द घूमती हैं और एक चक्र में चलती हैं जब भी ये क्रम पूर्ण घटित होता हैं कहानी एक मोड़ लेती हैं। विवाह का वर्णन शुद्ध ग्रामीण रस्मों रिवाज और मार्मिकता के साथ किया हैं।लेखक विवाह और पारस्परिक संबंधों के भावुकता के रस को प्रेम के तट पर उकेरा हैं ।गांव का प्राकृतिक और समाजिक वर्णन काफी समृद्ध एवं विस्तृत तरीके से किया गया हैं। बाढ़ का वर्णन करते हुए लेखक कहते हैं बाढ़ के दिनों में बलिहार के चारों ओर तीन चार कोस में पानी फैल जाता हैं और इस हद के सारे गाँव के बीच में नदी के द्वीप बन जाते हैं। ऋतु और फसलों का ज़िक्र कहानी के हर हिस्से से जुड़ा हुआ हैं जो रचना में मर्म को स्थापित करते हैं । कोहबर" शब्द एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संदर्भ है, जो विवाह के बाद नवविवाहित जोड़े के लिए एक विशेष कमरे को संदर्भित करता है। उपन्यास में, यह स्थान प्रेम, सपनों और सामाजिक अपेक्षाओं के प्रतीक के रूप में कार्य करता है। उपन्यास की भाषा आंचलिक और हिंदी मिश्रित हैं आंचलिक( भोजपुरी)शब्दों का खूब उपयोग किया गया हैं जैसे कि छारा, नाउन, चोनहा, टिकुली, बयाल्ला, बतिया , पितिया, बुलाहट , बोर बोर, पहुना, दुआर, भिनसार , बिहान, बचवा, निखहरे, पतियाती इत्यादि। छोटे छोटे वैवाहिक लोक गीत,लोकतिया और मुहावरों का अच्छा प्रयोग किया गया हैं । यह सभी रचना को सजीवता प्रदान करते हैं। इस उपन्यास से राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म "नदिया के पार" और "हम आपके हैं कौन" को भी प्रेरणा मिली है।
यह कोहबर का दुआर है पहुना, इसे ऐसे नहीं लाँघने पाओगे। यहाँ दुआर पढ़ना पड़ता है। केशव प्रसाद मिश्र जी द्वारा रचित कोहबर की शर्त एक ऐसा ही उपन्यास है जो प्रेम कहानी को कुछ इस तरह बयां करती है कि आप चाह के भी इससे अपने आप को अलग नहीं कर पायेंगे।
जब मुझे पता चला कि फिल्म ‘नदिया के पार’ इसी उपन्यास पर आधारित है तो मुझे लगा कि इसे तो अवश्य पढ़ना चाहिए, पर क्या पता था कि मैं यह पढ़ने के बाद कुछ कहने के हालत में भी नहीं रहूंगा। गला बैठा हुआ सा है, सोचने पे मजबूर हूं कि क्या कुछ निर्णय पहले नहीं लिए जा सकते थे। फिल्म की कहानी तो एक सुखद अंत पे खत्म होती है, और आप यकीन मानिये असल कहानी तो पुस्तक में उसके बाद शुरू होती है।
पूर्वांचल के दो गाँव चौबेछपरा और बलिहार का जीवन वैसा ही है जैसे अधिकतर गाँवों में होता है। आज भी पूरे पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार में प्रगति और विकास की रफ्तार इतनी तेज है मानो साइकिल से चाँद तक का सफर ।
दो युवा हृदय, चंदन और गुंजा की कहानी चंचलता से भरी हुई, तीखी नोक जोख और उतनी ही गहरी उमड़ती हुई प्यार से भी भरी है । फिर कहानी ऐसे मोड़ पे आती है जहाँ से निकल पाना न चंदन और गुंजा के लिए आसान था न ही इसे पढ़ते हुए मुझको।
केशव प्रसाद मिश्र जी की लेखनी बेहद ही सुन्दर हैं, आपको कहानी के अंत तक बांधे ही रहती है। केशव जी ने तो इस कहानी को चार शब्दों में ही बयां कर दिया है , कुंवारी गुंजा, सुहागिन गुंजा , विधवा गुंजा और कफ़न ओढ़े गुंजा।। आप सब भी पढ़िए। पढ़ना ही चाहिए। आप सब अपना ख्याल रखिए। धन्यवाद।
केशव प्रसाद मिश्र द्वारा रचित 'कोहबर की शर्त' नामक उपन्यास पढ़ने का मौका मिला और अपनी जादुई लेखनी से केशव जी मुझे बलिहार नामक एक गांव में ले चले. अच्छी लेखनी की शक्ति ही यही है कि वो आपको किसी और काल, किसी और स्थान तथा किसी और संसार का हिस्सा बना देती है. गांव का जो सरस वर्णन है वो प्रेमचंद और रेणु जी की लेखनी की याद दिलाता है. चार खण्डों के इस उपन्यास के दो खण्डों पर आधारित फिल्म थी- नदिया के पार और हम आपके हैं कौन. हालांकि कोहबर की शर्त इन दोनों फिल्मों से अलहदा है और अगले दो खण्डों की कहानी मेरे विचार से वास्तविकता के ज़्यादा क़रीब मालूम पड़ती है.
चन्दन और गुंजा इसके मुख्य पात्र हैं जिनके इर्द गिर्द ही पूरी कहानी घूमती है. बचपन का प्यार, शादी, गांव के रीति रिवाज, खेती किसानी, महामारी, अकाल मृत्यु और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम है ये उपन्यास. कहानी जानते हुए भी एक पल के लिए भी पढ़ते हुए मुझे बोरियत नहीं हुई बल्कि हर पल 'आगे क्या होगा' यही बात मन में चलती रही. लेखनी में इतनी सरसता है कि पाठक हर किरदार के साथ जुड़ा हुआ महसूस करता है और उसकी यात्रा में ख़ुद को शामिल पाता है.
यूँ तो मैंने नदिया के पार पिक्चर देखी है और इस कहानी के बारे में जानकारी था परंतु इसे पढ़ना अपने आप में एक अनुभव सा था। हर खंड अपना समय लेती है, किरदार पन्ने दर पन्ने और भी गहरे होते चले जाते हैं। इसी बीच पता नहीं चलता के कब इन किरदारों से आपको गहरा लगाव सा हो जाता है। वैसे तो यह उपन्यास चंदन की ज़िंदगी की उतार चढ़ाव पर आधारित है, मूझे किन्तु ओंकार का किरदार बेहद पसंद आया। जैसे धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का, ओंकार अपने ही घर में पीस गया। आखिर में मैं यह कहूँगा के यह उपन्यास सबके लिए नहीं बनी है। यदी आप कुछ ऐसा पढ़ना चाहते हैं जिसको पढ़ कर आप ज़िन्दगी और उसके मायनो के बारे में सोचने लगे, तो यह जरूर पढ़ें। इसे पढ़ कर आपको अच्छा लगेगा परंतु इस उमीद में ना रहे कि इसे पढ़ कर आपको खुशी मिलेगी। धन्यवाद।
इसे पढ़ के ऐसा लगा कि जैसे गुनाहों के देवता का कोई दूसरा संस्करण पढ़ रहा हूँ। वंहा चंदर और सुधा हैं और यंहा चंदन और गुंजा। दोनो कहानियां गंगा किनारे की हैं, वो इलाहाबाद मे घूमती हैं और ये पूर्वांचल के अंतिम छोर पर पर बसे बलिया मे। सोना की लहरों की तरह भावों की तरंग लिए बहती हैं कहानी, कभी सुहावने मौसम मे शांत जो मन को लुभाती है, कभी ऊँची ऊँची विकराल जो अपने साथ सब बहा ले जाती है। आंचलिक भाषा और इतनी सहजता से लिखी किताब पाठक को इसी सोना मे गोते खाने को मजबूर कर देगी।
3.5 स्टार कोहबर की शर्त........ क़्या थी? इस बुक को पढ़ने वालो का अमूमन यही सवाल आता हे आखिर शर्त थी क़्या? गांवी प्रवेश पर लिखी कहानियाँ हमने प्रेमचंद कि कई कहानियों में पढ़ा, इस कहानी के साथ ये अलग हुआ कि इसने फ़िल्म निर्माताओं को लुभाने में कामयाब रही. नदिया के पार और हम आपके हे कौन मुझे बहुत अचरज हुआ कि ये दोनों फिल्मो कि आधारशीला ये नॉवेल था जिसके नाम में कोहबर था. अब इस शब्द का मतलब वही समझेगा जो पूर्बीया होगा, यू पी, बिहार का होगा. मैंने तो इस शब्द पर नॉवेल पढ़ा पाता चला नॉवेल के आधी सामग्री को ही परदे पर दिखाया गया सच कहु तो उतना ही फ़िल्म का कलेवर ही था तो फ़िल्म के हिसाब से नॉवेल के साथ अन्याय नहीं हुआ हे नॉवेल सामाजिक उपन्यास को राइटर अपने चश्मे से देखता, उसे दुख दर्द देखने में मजा आता हे तो उसने वही देखा.... दिखाया.. एक प्रेम कहानि जो ट्रेजडी पर ख़तम होती हे....
गाला रूँध सा गया है पढ़कर। हाथ पाँव शिथिल से हो गये हैं। कोहबर की शर्त गुंजा जीत तो गई थी पर उसने कुछ माँगा या कहा क्यूँ नहीं!
अंत में वो कहती है कि “अच्छा हुवा उसने कुछ नहीं कहा वरना दोनों हार जाते” बस यहीं पर घूम रहा हूँ। समझ नहीं पा रहा हूँ। कहीं अँधेरे में खो गया हूँ और सोच रहा हूँ या तो गुंजा या फिर मिश्र जी ही आकर बता दें कि वो शर्त क्या थी? गुंजा क्या माँगना या कहना चाहती थी?
१९६५ में लिखी यह पुस्तक , दो चलचित्रों का आधार बनी परन्तु कहानी का प्रवाह और अंत वह नहीं है जो लोगो ने सोचा होगा , द्वितीय भाग में बहुत उतार चढाव है और अत्यंत मार्मिक है | कहानी अच्छी है, लेखन अच्छा है ,परंतु शर्त क्या थी ?
वैसे तो इस कहानी पर सूरज बड़जात्या जी ने दो फ़िल्में बनाई हैं जिसमें नदियाँ के पार काफ़ी करीब फ़िल्म है फिर भी जो कहानी में है उसे इतर फ़िल्म में दिखाया गया है क्यूंकि जानता को सुखद अंत पसंद है। अगर आपने यह पुस्तक नहीं पढ़ी है तो जरूर पढ़िए क्यूंकि हर कहानी का अंत सुखद नहीं होता।