"चाँदपुर की चंदा" को पढ़ने के बाद जो सबसे पहला विचार आता है वह यह, "शब्द अतुल जी की कलम से निकले हैं और कागज़ पर स्याही की खुशबू रेणु-जी की सी है।"
शायद इससे बेहतर तरीके से मैं "चाँदपुर की चंदा" को परिभाषित नहीं कर सकता था।
लेकिन यह तो हुई बात थोड़े परिष्कृत शब्दों में। पर अगर अतुल जी को दिल से कुछ कहना हो तो कहूँगा-
"भैया जी, गर्दा उड़ा दिये!!"
किसी भी लेखन की उत्कृष्टता की पराकाष्ठा का एक आयाम यह भी है कि कहानी में समय, स्थान और समाज को कैसे निरूपित किया गया है। प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने समय, स्थान और समाज को पन्नों पर उतार दिया। और अतुल जी के लिखे में समय, स्थान और समाज, तीनों ही, कहानी में समाकलित चरित्रों की भाँति उभरते दिखते हैं।
आप भारत में किसी भी कोने चले जाईये, यहाँ कस्बों, अंचलों का अपना एक किरदार होता है जो वहाँ रहने वालों की आँखों से लेकर रहने बतियाने के ढ़ंग में, पुरजोर छलक मारता है।
और ह्यूमर तो इन कस्बों की मानो बपौती है। हर कहीं का अपना अलग फ्लेवर है पर भाव वही है। बिना फ़िल्टर, बेधड़क। शायद इसलिए क्योंकि ह्यूमर से जीवन सरल, सरस बना रहता है। हँसी-ठट्ठे में बड़ी-बड़ी मुसीबतें भी खेल लगने लगती हैं। अक्सर जब लोग अपने भाग्य और दुखों पर फूटकर रो नहीं पाते तो हँसने लग जाते हैं। ये यहाँ का डिफेंस-मेकेनिज़्म है।
चाँदपुर भी ऐसा ही है। अपनी तमाम विषमताओं और सामाजिक उधेड़-बुन में उलझे हुए भी, खुली बाहों से आपका स्वागत करता है। आप चाहें तो फूँकन की दुकान पर कुमार सानू या मनोज तिवारी जी के गाने सुनते हुये चाँदपुर से दुनिया-ज़माने की बतकही कर सकते हैं।
"चाँदपुर.." की कहानी को चार चाँद लगाते हैं चाँदपुर के चार चाँद (ये तो चिंगारी जी की कविता सा कुछ हो गया, ख़ैर..)।
पहला तो चाँद, चाँदपुर खुद्दे है। दूसरा वो, जो सांझ ढले सरयू जी की सतह पर चित्रकारी करता-मिटाता रहता है। तीसरा, गोल चेहरे वाला मंटू। बबुआ इस्क हो तो मंटू जैसा हो। पूरब टोले के मंटू के ऑडियो प्लेयर से जो धाराप्रवाह प्रेम का राग उमड़ता है वह सुनामी से कम नहीं। और चौथा चाँद है, उत्तर टोला वाली चंदा। यही वो भूकंप हैं जो सुनामी का कारण हैं।
पर चंदा सिर्फ किसी कैशोर्य से गुज़रती लड़की से कहीं बढ़कर है। एक तूफान संभाले बैठी है भीतर। यह तूफान हर उस लड़की का है जो समर्थ भी है और प्रतिभाशाली भी, पर समाज के सदियों पुराने रिवाज़ एक ना दिखने वाले पिंजरे की तरह उसे क़ैद किये हुए हैं। अंग्रेज़ी में कहते हैं, 'ग्लास सीलिंग।'
अतुल जी ने उपन्यास भर नहीं लिखा, पूरी झांकी लगा दी है अंचल की। निहायती खूबसूरत। आप अपने हिस्से की कहानी ढूंढ़ कर जी लीजिए। सब है यहाँ, परीक्षा में होने वाली नकल के रॅकेट, पाॅलिटिक्स, गांव की रामलीला, दहेज प्रथा, हौसले तोड़ डालने वाली बाढ़ और प्रेम.. निश्छल, नैसर्गिक प्रेम। यहाँ टिंडर और बंबल की इंस्टेंट सैटिंग नहीं है। दिल को कागज़ पर रख देने वाले पत्रों का पत्राचार है।
प्रेम, जिसमें महीनों सिर्फ़ एक उत्तर की प्रतीक्षा में बीत जाते हैं। जिन्होंने प्रेम किया है(सचमुच का), उन्हें पता है पिया मिलन की आस प्रेम में सबसे खूबसूरत होती है। शायद, पिया और पिया मिलन से भी ज़्यादा।
दृश्यों की तुरपाई भी बड़ी कारीगरी से की गई है। गानों के द्वारा समय और मनोस्थिति का चित्रण कमाल है। और है निपट, शुद्ध, हंसी, ठहाके और आँसू। पढ़िये, बहुत कुछ दे जायेगा, चाँदपुर आपको।