“कमलेश्वर का ये उपन्यास मानवता के दरवाज़े पर इतिहास और समय की एक दस्तक है .....इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नही ,दुनिया भर में एक के बाद दुसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परंपरा अब खत्म हो.....”(पृष्ठ कवर पे दिया गया विवरण).
कुछ दिन पहले एक मलयालम फिल्म देख रहा था...’मरियान’,जिसमे हीरो को कुछ कबीले बंधक बना लेते हैं.रोज जीने के लिए संघर्ष करने वाले जिन कबीलों के पास खाने और रहने का भी ठिकाना नही है उनके हाथों में बाजारवाद ने बंदूके और मिसाइलें थमा दी हैं.नाइजीरिया,युगांडा,रवांडा,तिमोर और ऐसे ही अनेकों अविकसित देश जहाँ जीवन की मूलभूत सुविधाएँ भी मयस्सर नही,वहाँ भी वो अत्याधुनिक हथियार रखते हैं,गृह युद्ध जारी है...वहशत और हिंसा का नाच जारी है.जिंदगी मौत मांग रही है.कौन किसे मार रहा है और क्यों? इसमें गलत कौन है...सही कौन....हर कौम अपनों के खून से ही सरोबार है...असली दुश्मन कौन है?किसी के पास इस मूल प्रश्न के लिए वक्त नही है.या उन्हें सोचने की मोहलत ही नही दी जाती.
’कितने पाकिस्तान’ इन्ही सवालों के जवाब तलाशता हुआ एक उपन्यास है. उपन्यास की बनी बनाई परिपाटी को तोड़ता हुई ‘कितने पाकिस्तान’ एक प्रयोगवादी विचार से लिखा गया है.लेखन का एक अनूठा प्रयोग.कोई कहानी नही ,कोई नायक-खलनायक नही.सिर्फ वक़्त और इतिहास.अदीब और उसकी अदालत.जहाँ सभ्यताएँ,इतिहास,वक़्त,पाकिस्तानों के जनक अपनी गवाही दर्ज कराते हैं.वैश्विक भूगोल,इतिहास,परम्पराओं,मान्यताओं,वेदों,मिथकों को खंगालता हुआ लेखक देवताओं,महाभारत,माया,इंका,मिस्र की सभ्यताओं,उनके देवताओं,मोहम्मद,ख़ुदा,मुगलों,बाबर,विश्व युद्ध से लेकर अंग्रेजों और पाकिस्तान के बनने तक का सफ़र तय करता है.
ऐसे उपन्यास छः महीने,एक या 2 वर्ष में नही लिखे जाते.इसके लिए एक गहन अध्यन,खोज,मानसिक उद्वेलन की जरुरत होती है.जितने किरदारों को लेखक ने याद किया है,सिर्फ उनका विस्तृत अध्यन ही विश्व की लगभग सभी सभ्यताओं,उनके इतिहास और भूगोल को समझने के लिए पर्याप्त होगा.
चन्द बाजारवादी ताकतों और षड्यंत्रों से विश्व को कब्रिस्तान बना देने के लिए संयुक्त संघ,नाटो और उपनिवेशी देशों के लिए कमलेश्वर लिखते हैं.“नियंत्रण द्वारा आत्माओं को तोड़ा जाता है....फिर उन्हें विभाजित किया जाता है...उनमे सांस्कृतिक प्रतिरोध की शक्ति विखंडित की जाती है और तब बाजारवादी जोंके उस विभाजित कौम का सारा रक्त चूस लेती हैं.खंडित संस्कृति के श्मशानों में तब उत्सव के बाज़ार स्थापित होते हैं....धर्म और इतिहास शोषकों के हाथों में खिलौना बन कर नाचते-गाते,जश्न मनाते अपने ही विभाजित अंग के शत्रु और विनाश का कारण बन जाते हैं...इन बड़ी संस्कृतियों को तोड़कर उन्हें बंदी बनाने के लिए विभाजन का यही रास्ता उन असभ्य अपसंस्कृतियों ने चुना है....जिनके खेतों में सिर्फ बारूद और बंदूकें उगती है”
“बाजारों के लिए बनते हैं साम्राज्य ! और साम्राज्यों को जीवित रखने के लिए बनाये जाते हैं बाज़ार ! साम्राज्यों की नाभि बाज़ार से जुड़ी है . साम्राज्यों के रूप बदल सकते हैं.....वे प्रजातान्त्रिक आर्थिक साम्राज्य का रूप ले सकते हैं परन्तु,इन पूंजीवादी प्रजातंत्रों को जीने के लिए मुनाफे के बाजारों की जरुरत है.....बाज़ार ! बाज़ार !! बाज़ार! यही है औद्योगिक क्रांति का सतत जीवित रहने की मजबूरी का सिद्धांत ! यही है पूंजीवाद .इसी का दूसरा नाम है साम्राज्यवाद.तीसरा नाम है उपनिवेशवाद...और आज दस्तक देती हुई इस नई सदी में इसका नाम है बाजारवाद.यह व्यवस्था कच्चे माल की प्राप्ति और नित नए बाजारों के निर्माण के बिना जी नही सकती .यातना,विषमता और अवसाद के बीच यह देते हैं कृतिम उत्सव और उल्लास.सडती लाशों के अम्बार पे ये छिडकते है क्रिश्चियन डिओर,शैनल और अमुआगे क्रिस्टल के इत्र .कटी हुई लहूलुहान गर्दनों में पहनते हैं लंविन की नेकटाइयाँ और मेजोरिका के नेकलेस.टूटी हुई कलाइयों में ये बांधते हैं राडो और रेमण्डवील की घड़ियाँ और चकनाचूर उँगलियों को ये पकड़ाते हैं मोंटब्लांक और वाटरमैन के कलम!”आज भी इंडिया के हज़ारों गाँव में जहाँ पीने का साफ पानी नही पहुँच पाया है,वहाँ पेप्सी और कोक पहुँच चुका है.....”
सिर्फ कथानक और प्रस्तुतीकरण ही आपको बांधे रखने के लिए काफी है.कहीं कहीं आप शायद शब्दों की अतिरेकता,दोहराव और भारीपन से बोझिल हो सकते हैं.पर प्रभाव और प्रवाह में दोहराव भी अलग नही जान पड़ता.
कमलेश्वर का ये उपन्यास कालजयी है,और अपने में अद्भुत,बार बार पढने योग्य.हाँ हलके-फुल्के मनोरंजन तलाशने वाले कुछ निराश हो सकते है....