एक मगरूर राजकुमारी से ‘गगनमहल’ की खातिर उसके ऐसे भाई के टकराव की कहानी जो ‘गगनमहल’ को महज एक प्रॉपर्टी नहीं, महज एक इमारत नहीं, अपने वंश की आन बान शान का प्रतीक समझता था और सिर्फ खुद को उस आन बान शान का झंडाबरदार मानता था ।
Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित यह १९२वां उपन्यास है और सुनील सीरीज में १०१वां| सुनील सीरीज के कई उपन्यासों में यह देखने को मिलता है की सुनील न्यूज़ हाउंड या खबर खोजी बनकर किसी के भी फटे में टांग अड़ा देता है| जिसका खामियाजा उसे इंस्पेक्टर प्रभुदयाल के तीखे शब्दों और व्यवहारों से मिलता है| सुनील को हमेशा कानून को चैलेंज देते हुए दिखाया जाता है और उससे जीतते हुए भी| कहते हैं की सुनील जिस भी साधारण से साधारण केस में हाथ डाल देता है तो वह केस एक सेंसेशनल न्यूज़ बन जाती है| जिस केस में क़त्ल-ब्लैकमैलिंग का कोई दखल नहीं होता वहां भी कुछ न कुछ ऐसा जरूर घटित हो जाता है जो पुरे राजनगर शहर, उसकी मीडिया और पुलिस तंत्र को झकझोर कर रख देता है| ये माना जा सकता है की अगर कहानी का मुख्य किरदार सुनील है तो वह केस तो हल कर ही लेगा| जबकि पुलिस तंत्र को बिलकुल ही नकारा और कम-अक्ल दिखाया जाता है| लेकिन सुनील के उपन्यासों का मुख्य बात यह होती है की “क़त्ल कैसे हुआ”| जिस प्रकार से उपन्यास के अंत में सुनील तथ्यों के द्वारा परत दर परत केस की घुंडी खोलता जाता है वह बहुत ही सुन्दर और दिलचस्प है|
“पापी परिवार” भी एक ऐसा ही उपन्यास है जिसमे सुनील का दखल छोटी सी बात के लिए होता है क्यूंकि ब्लास्ट अखबार को बहुत दिनों से कोई सेंसेशनल खबर नहीं मिली| ब्लास्ट के एडिटर राय के तथ्यों पर सुनील तहकीकात के लिए गगन-महल पहुँचता है| गगन-महल, कभी स्वर्गीय राणा तेजप्रताप सिंह की जागीर हुआ करती थी, कभी उनके जीवन काल में यह महल सुख-सुविधा और प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र बना हुआ था| लेकिन राणा साहब के स्वर्गवास के पश्चात यह गगन-महल उनकी वसीयत के अनुसार छोटी बेटी रूपकुंवर और उनके जुड़वाँ भाई भानुप्रताप के आधीन हो गयी| रूपकुंवर अभी तक अविवाहित हैं और भानुप्रताप मानसिक रूप से कमजोर हैं| इनके आय का साधन भी बिलकुल समाप्त सा हो रहा था| और चूँकि ये राणा थे इसलिए कोई काम करना इन्हें गंवारा नहीं था| गगन-प्रताप सिंह, एक सफल व्यवसायी, राजनगर में जिनकी बड़ी पूछ है, राणा साहब के सबसे बड़े बेटे हैं| चन्द्रप्रताप सिंह, गगनप्रताप से छोटे, एक सफल व्यवसायी हैं| सूर्यप्रताप सिंह, रूपकुंवर बड़े चंद्रप्रताप से छोटे भाई हैं, जो घुमक्कड़ प्रवृति के हैं| एडिटर राय ने सुनील को काम दिया था की पता करे की क्या रूपकुंवर महल बेचना चाहती थी और क्यूँ ऐसा हो पाया की राणा ने महल रूपकुंवर और भानुप्रताप के नाम किया था| इन्ही प्रश्नों के जवाब के लिए सुनील गगन-महल पहुंचा था| सुनील गगन-महल में तब कदम रखता है जब महल में सनसनी का माहौल था| इसी माहौल में सुनील उस कमरे के बाहर पहुँचता है जहाँ से ऐसी सनसनी की बू आ रही थी| सुनील ने देखा की दरवाजा तोड़ने की कोशिश की जा रही है जिसमे साथ प्रभुदयाल भी दे रहा था| दरवाजा टूट गया तो वहां चीख पुकार मचने लगी, एक व्यक्ति की लाश कुर्सी पर पड़ी है और उसकी ठोड़ी से एक शॉटगन की नाल लगी हुई है| व्यक्ति का चेहरा बुरी तरह से चीथड़े चीथड़े हो चूका था और पहचाने लायक नहीं था| रूपकुंवर के अनुसार लाश उसके बड़े भाई चन्द्रप्रताप की थी| प्रभुदयाल ने बताया की चंद्रप्रताप के खिलाफ गबन करने के आरोप में वारंट थे इसलिए वह चंद्रप्रताप को गिरफ्तार करने आया था| रूपकुंवर के अनुसार, गगनप्रताप, चंद्रप्रताप, सूर्यप्रताप, भानुप्रताप, मंजरी और स्वयं रूपकुंवर बीते कल को यहाँ मौजूद थे| गगनप्रताप विदेश यात्रा पर जा रहा था इसलिए सभी भाई एक बार इकट्ठे मिल रहे थे| गगनप्रताप घटना वाले दिन ही सुबह सुबह अपनी फ्लाइट पकड़ने के लिए राजनगर एअरपोर्ट चला गया था| घटना के समय सूर्यप्रताप, रूपकुंवर एक साथ थे| मंजरी भी घटना से पहले ही चली गयी थी| भानुप्रताप कहीं बाहर गया हुआ था| दोस्तों, यह मर्डर-मिस्ट्री ऐसी बनी जिसमे की क़त्ल एक बंद कमरे में हुआ जो पुर्णतः एक आत्महत्या लग रही थी| पहले तो इसे आत्महत्या का केस करार दिया गया क्यूंकि घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ था| लेकिन सुनील की फटे में टांग अडाने की आदत ने इस केस को एक अलग ही मोड़ दिया| और इसका खुलासा मैं इस लेख में कर के इस पुस्तक का मजा खराब नहीं करना चाहता| इस पुस्तक की कहानी इस परिवार, सुनील, प्रभुदयाल और रमाकांत के इर्द गिर्द लिखी गयी है जिसकी बुनियाद लिखी एक आत्महत्या ने| जिसको सुनील ने आगे बढाया अपने खोजपूर्ण गतिविधियों से यह स्थापित करने के लिए अमुक व्यक्ति ने आत्महत्या नहीं की थी और उसकी हत्या हुई है| वारदात के बाद की कई घटनाएं आपको इस कहानी से बंधे रहने पर मजबूर करेंगी| पाठक साहब ने कहानी के आरम्भ में हीं सुनील को सबसे परिचित कराया लेकिन सुनील का मुख्य हस्तक्षेप गगन-महल में घटी, चंद्रप्रताप के मृत्यु के बाद हुआ| इसके बीच के वक्फे में पाठक साहब ने गगन-महल का इतिहास, गगन-महल के परिवार से जुड़े सभी कथन हमारे सामने खोल दिए| इसी वक्फे में पाठक साहब ने उस घटना को हमारे समाने प्रस्तुत किया है| इस पुस्तक में पाठक साहब ने पारिवारिक रिश्तों को आधुनिक पृष्ठभूमि से दर्शाया| भाई-बहन के रिश्तों के तानो-बानो पर बुनी हुई कहानी में पाठक साहब ने उस नुक्ते को इस्तेमाल किया जिसे हम कहावतों में इस्तेमाल करते हैं – भाई भाई का गला काटता है| परिवार के तीनों बड़े भाई रूपकुंवर पर भावनात्मक रूप से या कहूँ साम, दान, दंड, भेद का प्रयोग करके दबाव डालने की कोशिश करते हैं की वह गगन-महल को बेच दे| वहीँ पाठक साहब ने रूपकुंवर और भानुप्रताप के बीच निश्छल प्यार के बने समुद्र को भी बड़ी ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया है| जहाँ पूरा जहाँ भानूप्रताप को पागल कहने से नहीं चुकता वहीँ रूपकुंवर अपने भाई के बारे में ऐसा सुनते ही उस पक्षी की तरह बिफर उठती है जिसके बच्चे पर कोई जीव नज़र भर डाल लेता है| पापी परिवार एक बेहतरीन मर्डर-मिस्ट्री है जिसमे कई ऐसे पड़ाव आते हैं जो आपको चकित कर बैठते हैं| कई ऐसे मोड़ हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं| पल भर आप किसी संदिग्ध के प्रति शक के मूल्य को बढ़ा लेते हैं तो पर भर बाद उसे शक से बरी ही कर देते हैं| इस उपन्यास में पुलिस की भूमिका के बारे में कहूँगा की पुलिस ने बहुत ही नाकारेपन का परिचय दिया है| प्रभुदयाल को केस से चिपका हुआ दिखाते तो हैं लेकिन एक बार केस को आत्महत्या मान लेने के बाद केस को बिलकुल ही बंद कर दिया जाता है| लेकिन कोई तो बात होगी जिससे प्रभुदयाल इस केस से अभी तक बंधा हुआ है| दोस्तों चूंकि इस उपन्यास को छपे हुए ९ साल बीत चुके हैं लेकिन इस कहानी का कलेवर, मजा, रहस्य और रोमांच कम नहीं हुआ है| पाठक साहब के उपन्यासों की खासियत ऐसी होती है की वक़्त के थपेड़ों का इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता है| मेरी सलाह होगी आप सभी के लिए आप सभी इसे दोबारा पढ़ें|
भानुप्रताप की शायरी और पागलपन बहुत पसंद आया, यहाँ कहानी गगनमहल निवास और उसके 5 भाई बहनो को लेकर चलती हैं... पांचो भाई बहन अविवाहित होते हैं. धीरे धीरे कहानी एक मर्डर उपन्यास में तब्दील हो जाती हैं.
लेखन और भाषा शैली बहुत अच्छी हैं लेकिन बेफालतू की लम्बाई बोरियत का एहसास करवाती हैं, इस उपन्यास के 100 pages कम होते तो यकीनन 5/5 stars होती. Overall, its an average novel.
सुरेन्द्र मोहन पाठक की ये पहली क़िताब पढ़ी,कहानी रोचक है,मर्डर मिस्ट्री से ज़्यादा ख़ोजबीन पर आधारित लगी,लेकिन लिखने का तरीका रोचक है,जो पढ़ने में अच्छा लगता है।