राहुल रवैल की फिल्म डकैत मैंने बचपन में देखी थी और मुझे अच्छी लगी थी l उनके नाम से मै सदा से परिचित रहा हूँ l लेकिन मुझे कभी ये पता नहीं था की वो राज कपूर के साथ काम किये हैं या कहें की उनके गुरु राज कपूर थे l पुराने नायकों में जो तीन सबसे बड़े नाम थे वो थे देव आनंद , दिलीप कुमार और राज कपूर l इनमे से मेरे फेवरिट थे राज कपूर l मुझे लगता है जब मै दस वर्ष का रहा होऊंगा तो मेरे घर भी सी आर आया था , और वो हमारे घर दो या तीन रोज रहा था l उसपे हमने जो फिल्में देखि थी वो थी आह , बरसात , चोरी चोरी , श्री 420 और यहूदी l शायद कुछ फिल्में और आई हों लेकिन जो नाम मुझे याद आये मैंने उनका जिक्र कर दिया l इन फिल्मों में श्री 420 ने मुझपे जादू कर दिया l उसका गाना मेरा जूता है जापानी , प्यार हुआ इर हुआ मेरे होठों पे हमेशा ही रहने लगा l मै राज कपूर का सही मायने में फैन हो गया l मै फिल्म सिर्फ इसलिए देख सकता था या देखता हूँ क्योंकि इसमें राज कपूर हैं l मुझे अक्सर ये कमी लगती रही की राज कपूर के ऊपर किताबें क्यों नहीं लिखी गयी l मैंने गुरुदत्त की दो बायोग्राफी पढ़ी है और दोनों को अच्छा लिखा गया है l देव आनंद और दिलीप कुमार ने अपनी अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखी है , लेकिन राज कपूर पे न के बराबर लिखा गया है l राहुल रवैल ने ये किताब लिख कर उस कमी को पूरा किया है l राहुल रवैल ने उनके काम करने के जूनून और उनके सिनेमा बनाने के प्यार को अच्छी तरह से बताया है l कई घटना ऐसे आते हैं जब हम पाते हैं की राज कपूर इतने महान फिल्म मेकर कैसे थे l बॉबी मूवी पे राहुल रवैल ने सबसे ज्यादा लिखा है l शायद इस वजह से भी की उनकी ऋषि कपूर से अच्छी दोस्ती थी और उस वक़्त उनका फ़िल्मी अनुभव भी बढ़ चूका था l इस बुक की मुझे ये कमी लगी की राहुल रवैल किताब लिखते वक़्त शायद ये भूल गए की इस किताब को आम व्यक्ति के द्वारा भी पढ़ा जायेगा l कई जगह वो कैमरे के बारे में या फिल्म बनाने की टेक्नीकल बातें इतना अधिक लिख दिए हैं की वो बोर करने लगती हैं l फिल्म बनाने से जुड़े लोगो को तो ये बातें समझ आ सकती है , आम आदमी को ये किताब से दूर करती हैं l एक वक़्त मै नाराज हो कर इस किताब को दो स्टार देने की सोच रहा था l लेकिन बाद में उन्होंने मामला संभाल लिया और पढ़ना रोचक हो गया l एक शिकायत जो मुझे इन फिल्म वालों से रहती है की ये अपनी फिल्में तो हिंदी में बनाते हैं लेकिन बोलने और लिखने वक़्त अंग्रेज हो जाते हैं l क्या हिंदी सिर्फ इनके लिए एक बाजार है l इसके साथ इनका व्यवहार उसी तरह का है जैसे अंग्रेजो का हिंदुस्तान से था l मेरे डैडी जैसे लोग जो इन पुरानी फिल्मों को देखते हुए बड़े हुए हैं और इन्हे पढ़ना पसंद करते हैं, वो अंग्रेजी न पढ़ने से इन किताबों को पढ़ने से वंचित रह जाते हैं l अंत में बस इतना ही लिखूंगा की ये काफी कम लिखा गया है l राज कपूर की कई घटनाये तो हमने इधर उधर की किताबों में पढ़ा है l राज कपूर की शख्सियत को पूरी तरह से बताने और लिखने के लिए ऐसी कुछ और किताबों की जरुरत पड़ेगी l अफ़सोस ये है की उसे जानने वाले अधिकांश लोग ऊपर जा चुके हैं l