पिछले कुछ वर्षों में अपनी कहानियों से एक विलक्षण पहचान अर्जित कर चुके युवा कहानीकार मिथिलेश प्रियदर्शी हिन्दी की कहानी की एक बड़ी उम्मीद और आश्वस्ति हैं। इनकी बहुप्रशंसित, महानगरीय जीवन से वाबस्ता कहानी, 'हत्या की कहानियों का कोई शीर्षक नहीं होता' का विन्यास और कथा-भाषा कहानी कला के ओल्ड मास्टर एडगर एलन पो की याद दिलाती है। इसके ठीक दूसरे छोर पर हमारी शहरी सभ्यता के सीमान्त पर, एक दूरस्थ, अँधेरे में डूबे आदिवासी इलाके में घटित कहानी 'सहिया', कहानी के दूसरे उस्ताद जैकलंदन की याद दिलाती है। मिथिलेश की कहानियों में समकालीन यथार्थ की कितनी ही तहें और परतें हैं। इन कहानियों का एक कठोर तरीके से कसा हुआ सघन विन्यास, तीव्र, तन्मय कथा-भाषा और तनाव भरा काँपता-सा स्वर हिन्दी कहानी के लिए नए हैं और उम्मीद जगाते हैं कि कहानी के नए वातायन खुल रहे हैं।
छः कहानियों का यह संग्रह मुझे बहुत पसंद आया। अगर कहानियों के क्रम में खोजें तो शायद शहर से कस्बा, कस्बे से गांव, और गांव से जंगल तक की हल्की लकीर खिंची दिख जाए। शहर और कस्बे तो कहीं भी हो सकते हैं, पर जिन गाँवों और जंगलों की बातें हैं, वह झारखंड के हैं। नकली या मनगढ़ंत ‘नक्सलवादी’ (और झलक के लिए कुछ असली भी) किताब में आते जाते रहते हैं।
मेरी मनपसंद कहानी ‘सहिया’ रही, जिसमें जोआकिम लिंडा नाम के दो क़िरदार हैं: एक तेरह साल का बालक, जो अपने सामने बैठे बेसुध पत्रकार को डींगे हाँक रहा है, और एक नक्सली कमांडर, जो पहाड़ पार जंगल में बसा है। पहला लिंडा जैसे तैसे नाम बदल जीता है, बड़ा होता है। फिर उसकी शादी होती है। पर शादी के बाद उसका असली नाम फिर उसे दबोच लेता है। जोआकिम लिंडा अपनी ही कहानी में सेंटर की जगह नहीं ले पाता। ‘सहिया’ में फिर भी यह बात पाठक के लिए थोड़ी हल्की बनी रहती है।
एमानुएल और मारकुश भी अपनी–अपनी कहानियों में सेंटर की जगह नहीं ले पाते। और उनकी कहानियों का स्याह यथार्थ कॉमिक रिलीफ की कोई संभावना भी नहीं छोड़ता। मारकुश की कहानी (शीर्षक कहानी) में तो नैतिकता, व्यवस्था, उम्मीद — सब कुछ पिस जाता है।
क्राफ्ट के नज़रिए से शायद पहली कहानी — ‘हत्या की कहानियों का कोई शीर्षक नहीं होता’ — सबसे अच्छी मानी जाए। घर में पड़ी लाश को ठिकाने लगाने की गुत्थी से शुरू हुई ये कहानी अपने नैरेटर के भूत में जाने के ज़रिए सहजता से पा जाती है। दूसरी कहानियां इवेंट से शुरू हो आख्यान का सहारा लेती प्रतीत हो सकती हैं।
पर क्राफ्ट गया तेल लेने। वैसे भी तेल लेना एक ऐसा काम है जो क्राफ्ट को बार–बार कर लेना चाहिए। मिथिलेश की कहानियां ज़रूरी भी हैं और दिलचस्प भी। आशा है उनका लिखा और पढ़ने को मिलता रहेगा।
I was recommended this book by a friend of a friend. It was not an easy book to read. Not because of the language, the Hindi of this book is not too sophisticated and, perhaps for good reason. This is a book that touches on very sensitive topics. The stories are from Jharkhand, a lesser known state in India, erstwhile part of Bihar, now riddled with Maoist insurgency (funded by China and Pakistan but, fueled by India's own administrative failure, corruption and disregard of tribal communities. While, the stories are fiction, it almost feel like they are real because they closely follow the turn of events in these areas especially in the past few decades. The author manages to hit a nerve with his raw emotive dialogues and contradictions. This is not for everyone. This is not for mystery lovers or those looking to read for pleasure. There is absolutely no joy one might feel reading this book. But, I would still encourage Hindi literature enthusiasts to give this book a chance regardless of their political and ideological inclinations.
This is a collection of short stories, primarily revolving around village-life in naxal areas. Each story is told from a different point of view but has the same core - condition or life of a common villager who is born in an area which has significant naxalite-activities.
The rating is 3 since I dove in with much more expectations, given the importance and intensity that the movement has had on the political and social narrative of our country.