बस कुछ चिट्ठियाँ हैं, किसी बहुत अपने को लिखी हुईं । ऐसा कोई बहुत अपना, जो है भी और नहीं भी है । जिसके होने और न होने में 'महज़ इतना ही फ़र्क है', जितना कि कल्पनाओं और वास्तविकता में ! पहली चिट्ठी में उसके-मेरे रिश्ते का परिचय है । और बाकी की सारी चिट्ठियों में: कुछ किस्से हैं, कुछ कविताएँ हैं कुछ भाव हैं, कुछ विचार हैं कुछ उलझनें हैं, कुछ सवाल हैं । मानो उस से डायलॉग की चाह में बस केवल एक मोनोलॉग है ! कहीं कोई प्रकृतिजन्य होने वाले आघात के शायद पूर्वाभास हैं । कोई एक अबूझ सी खोज है अबूझ सी कोई एक सीखने की चाह है । लिखने वालों की बिरादरी में से कुछ दिग्गज पूर्वजों के, श्रेष्ठिजनों के, वरिष्ठजनों के उद्धरण हैं । कुछ स्नेहीजनों की सोशल मीडिया वॉल पर से लिए हुए उक्तियों के उद्धरण हैं । कुछ दृश्य, कुछ अदृश्य सी प्रेरणाएँ हैं । और इस तरह मन की बेचैनी से, शब्दों में निकल पड़ी ये कलाकृतियाँ हैं । उम्मीद है आप इस सब में से कहीं न कहीं, कोई न कोई तादातम्य ज़रूर स्थापित कर पाएंगे और इन चिट्ठियों को पढ़ना रुचिकर पाएंगे!