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Punarnava

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Hardcover

First published January 1, 1973

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Hazari Prasad Dwivedi

29 books3 followers

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Profile Image for Indra  Vijay Singh.
148 reviews7 followers
July 24, 2021
#65 पुनर्नवा - हजारी प्रसाद द्विवेदी

मुझे हमेशा से लगता है की जैसे कुछ तो है जो गलत है, पर वो क्या है और कहाँ है मन के अंदर है या फिर संसार में है यह पता नहीं चलता है। मैं उसके करीब नहीं पहुच पाता हूँ। सामान्य जीवन जीते हुए कई बार यह अनुभूति होती है कि यह सामान्य नहीं है। जैसे कोई अदृश्य बंधन हो जिसे हम न काट सकते है ना तोड़ सकते है। चौथी शताब्दी पर आधारित इस उपन्यास का हर किरदार इसी तरह की नैतिक, धार्मिक, मानसिक और आधारभूत प्रश्नों से जूझता है और उसके उत्तर खोजने का प्रयास करता है। कई बार यह पलायन का रूप ले लेता है। लोग क्या सोचेंगे यह इसका मूल कारण होता है।

क्या होता है जब उच्च श्रेणी के मनुष्य इस तरह के लोकपवादों की स्थिति में पड़ते है? इसी मूल प्रश्न पर आधारित कहानी है पुनर्नवा।

मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने द्विवेदी जी के चारो उपन्यास पढ़े है। चारु चंद्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा , अनामदास का पोथा और अब पुनर्नवा। हर किताब में धर्म, सत्य और मन की खोज इतनी गहरी है कि मेरे जैसे सामान्य पाठक के लिए बहुत सारी बातें समझना कठिन है। किंतु इस कठिनाई के बाबजूद किताब मंत्रमुग्ध कर देती है। पुनर्नवा मुझे बाकी तीनो उपन्यासों की जगह पाठक से ज्यादा जुड़ता हुआ लगा। यह समुंद्रगुप्त के समय की कहानी है। उनके महान सेनापति गोपाल आर्यक और उनका परिवार मुख्य पात्र है। हर किरदार जीवन के कठिन परीक्षाओं से गुजरता है और परीक्षाओं से तात्पर्य बाहरी परिस्थितियों से ज्यादा आंतरिक मनोभावों में चल रहे संघर्षों से है।

इस किताब में सोचने के लिए इतना मेटेरियल है कि मनुष्य चाहे तो सारा जीवन इसपर चिंतन कर सकता है। निःसंदेह पुर्ननवा हिंदी साहित्य के चंद कोहिनुरों में से एक है।
1 review2 followers
September 22, 2019
अप्रतिम रचना , नाम को चरितार्थ करती पुस्तक, अब तक दसों बार पढ़ चुका हूं मगर हर बार नई सी लगती है .. भारत के नेपोलियन समुद्रगुप्त के सेनानी गोपाल आर्यक, उनके भाई श्यामरूप , गुरु देवव्रत और पत्नी मृणाल मंजिरी का चरित्र रेखांकन करती हुई रचना
15 reviews
February 8, 2026
This book perfectly showcases the author’s remarkable depth and range. By weaving a vivid narrative set in the 4th-century Gupta period, it masterfully explores complex social stigmas and follows the lead characters as they navigate the challenges of their era
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