ऑक्सीजन ऑफ लाइफलेखक – मिथिलेश गुप्ताइंदौर से हैदराबाद पहुंचना जितना आसान लग रहा था उतना था नहीं। हिंदी मीडियम की पढ़ाई ने कस के कान गर्म कर दिए थे। अँग्रेज़ी दिलरूबा की तरह नचा रही थी। दो दर्जन इंटरव्यूज़ के बाद आखिरकार जब एक नई मंजिल की तलाश में निकला तभी वह मिली, झील की शान्त लहरों जैसी गुमसुम और एकांत सी। और जैसे सब कुछ बदल गया। वो यानी ‘पूर्वी’, जिसने एक झटके में जीवन में उस ऑक्सीजन का मतलब ही बदल दिया जिसका आज तक मैं जीने के लिए इस्तेमाल कर रहा था।फार्मा में केमिकल्स और मेडिसिन्स के फॉर्मूलों के बीच लैब में चार साल बिताने वाला मैं, आखिर ये कहानी कैसे लिखता ? पूर्वी- जिसने मान लिया था ज़िंदगी को जीने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत उतनी नहीं होती, जितनी एक उम्मीद की। आदित्य, पायल और पूर्वी की ऐसी कहानी जहाँ से सवाल तो कई उठते हैं पर जवाब की कोई “उम्मीद” नहीं उठती। जहाँ किसी की ज़िन्दगी की ऑक्सीजन उस मुट्ठी में बंद है जिसे हम चाहकर भी नहीं खोल पाते।‘जस्ट लाइक दैट’ और ‘तेरी इश्क़ वाली खुशबू’ के लेखक मिथिलेश गुप्ता लेकर आएं है एक ऐसा उपन्यास जिसे पढ़ना आज के युवाओं और समाज के सभी लोगों के लिए बहुत जरुरी है।
ऑक्सीजन of life", इस किताब को मैंने पढ़ा तो ऐसा लगा कि इस उपन्यास के पात्र पन्नों से निकलकर ना जाने कितनी बार मेरे आस पास आकर खड़े हो गए हैं मिथिलेश की लेखन शैली ने हमेशा ही मुझे प्रभावित किया है उनके लेखन की ख़ासियत है कि उनकी कहानियाँ, संवेदनाओं को व्यक्त करने के साथ साथ पाठक के मन को भी, पात्रों से बातचीत करने का पूरा समय देती हैं चेहरे की बनावट से लेकर पात्रों का चरित्र चित्रण जिस तरह से लेखक ने किया है, वह काबिले तारीफ़ है
ऑक्सीजन, जैसा कि किताब का नाम है पहली बार में ही कुछ अलग सी लगी और साथ ही किताब के कवर ने भी उत्सुकता बढ़ा दी । कहानी ऐसी जो आपको खुद से बांध ले और अपने साथ ही आगे बढ़ाती रहे । यहां तारीफ लेखक की भी होगी, जिस प्रकार उन्होंने आदित्य का किरदार गढ़ा है वह काबिले तारीफ है ।
इस उपन्यास में कहीं भी ऐसा नहीं लगता है कि पात्र कहीं भी ठहर गए हैं या वे रूक गए हैं, बल्कि हर नया पात्र अपनी एक अलग ही नई कहानी लेकर आता है जो पाठक को अपने साथ-साथ, अपने शहर, अपने ऑफ़िस और अपने घर लेकर घूमता रहता है, जहाँ से पाठक को लौटकर आने की कोई जल्दी नहीं होती बल्कि वह चाय की चुस्की लेते हुए हर उस रिश्ते की गर्माहट को महसूस करता है जो मिथिलेश का पात्र जीता है
एक किताब एक ऐसे संजीदा टॉपिक के बारे में बात करती है, जिसके बारे में चर्चा तो हर कोई करता है, लेकिन उसके निदान के लिए कोई ठोस या बदलाव के लिए अग्रणी कदम नहीं उठाना चाहता। यह मुद्दा है सुसाइड का। सुसाइड करना एक कायरता है। आप कभी भी जब किसी को ऐसी हालातों से दो-चार होता देखे तो हर सम्भव कोशिश करें.. हो सकता है कि शायद आपकी एक कोशिश उसके भीतर खो चुकी उस ऑक्सीजन को वापस ला दे। जो वह उम्मीद के तौर पर कभी हार गया था। आप भी किसी का ऑक्सीजन बनिये और जितना हो सकें खुशियों को बांटने की कोशिश कीजिये, शायद एक पहल किसी की जान बचाने के काम आ जाये, और उसकी उम्मीद फिर से उसके जीवन का ऑक्सीजन बन जाये।
क्योंकि यह कहानी भी उसी उम्मीद के नाम है। यह कहानी पूर्वी की है, जिसने मान लिया था, जिंदगी जीने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत उतनी नहीं होती, जितनी एक उम्मीद की।
बस आप भी पढ़े इस उम्मीद को, और हँसते-हँसते, जज्बात को पढ़ते-पढ़ते, खुद को संभालते, और इमोशन को महसूसते हुए, खो जाइये-ऑक्सीजन ऑफ लाइफ के इस दुनिया में।
लेखक के लिए बस इतना ही कहूँगा- आप ने अपने जज्बात इसमें डाल दिया है, आपकी मेहनत आपका काम संपूर्ण रूप से इस पुस्तक में दिखाई देता है। बस इसी तरह से आप मेहनत करते रहे
एक बेहतरीन उपन्यास के लिए मिथलेश को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ..
I decided to read it after seeing its good reviews from a trusted source. Although the message was positive and much-needed in today's era, I still felt that something was missing. I found the story and the preface to be confusing. It begins as a love story or something similar. You may enjoy reading it if you have a fondness for Hindi books.