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कैसी आगी लगाई
पिछले तीस साल से कहानियाँ और उपन्यासों के माध्यम से अपनी विशेष पहचान बना चुके असग़र वजाहत ने ‘कैसी आग लगाई’ में विविधताओं से भरा एक जीवन हमारे सामने रखा है। यह जीवन बिना किसी शर्त पाठक के सामने खुलता चला जाता है। कहीं-कहीं बहुत संवेदनशील और वर्जित माने जानेवाले क्षेत्रों में उपन्यासकार पाठक को बड़ी कलात्मकता और सतर्कता से ले जाता है और कुछ ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जो सम्भवतः हिन्दी उपन्यास में इससे पहले नहीं आए हैं।
उपन्यास का ढाँचा परम्परागत है लेकिन दर्शक के सामने विभिन्न प्रसंग जिस तरह खुलते हैं, वह अत्यन्त कलात्मक है, एक व्यापक जीवन में लेखक जिस प्रसंग को उठाता है उसे जीवन्त बना देता है।
उपन्यास का ढाँचा परम्परागत है लेकिन दर्शक के सामने विभिन्न प्रसंग जिस तरह खुलते हैं, वह अत्यन्त कलात्मक है, एक व्यापक जीवन में लेखक जिस प्रसंग को उठाता है उसे जीवन्त बना देता है।
Paperback
Published January 1, 2007
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