Jump to ratings and reviews
Rate this book

मेरी प्रिय कहानियाँ

Rate this book
एक ही शैली या शिल्प में लिखना मुझे कभी प्रिय नहीं रहा। मेरा मस्तिष्क निहायत क्रियाशील और मेरा मन अत्यन्त चंचल है। ‘डाची' से पहले की कहानियों में तीन-चार रंग स्पष्टतः दिखाई दे जाएँगे। उसके बाद मैंने जो कहानियाँ लिखीं उनमें भी तीन रंगों की कहानियाँ हैं...कहानियाँ, जिनमें अनुभूति के संस्पर्श के साथ कल्पना की प्रचुरता और शिल्प का गठाव है...कहानियाँ, जिनमें शिल्प का बिखराव है, जो लघुतम उपन्यासों जैसी हैं। लेकिन जिनमें गहराई भी है...कहानियाँ, जो शुद्ध हास्य की सृष्टि के लिए लिखी गईं। इस संकलन के लिए कहानियाँ चुनते समय मैंने पिता की दृष्टि से अधिक काम लिया है और वे कहानियाँ भी चुनी हैं जिन्हें मैंने अन्यमनस्क ढंग से सृजा पर जो लोकप्रिय हो गई।

124 pages, Hardcover

Published January 1, 2014

Loading...
Loading...

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
2 (13%)
4 stars
6 (40%)
3 stars
7 (46%)
2 stars
0 (0%)
1 star
0 (0%)
Displaying 1 of 1 review
January 11, 2025
लेखक उपेंद्रनाथ अश्क की लघु कथाओं का संकलन।

पुस्तक की भूमिका में लेखक द्वारा अपनी जीवन यात्रा के बीच गूँथी गयी कहानियों का बड़ा रोचक विवरण है। कहानियों का चुनाव उपयुक्त है। हर कहानी विभिन्न विधा का प्रतिनिधित्व करती है। कुछ कहानियाँ हल्की फुल्की हैं तो कुछ व्यंजनापूर्ण और भारी भरकम ।

"एक उदासीन शाम" में लेखक ने अपने शब्दों से जूहु के तट, वहाँ के सुहावने माहौल और उसकी 'निवासी' का सुंदर खाँचा खींचा है तो "काकड़ा का तेली" के मौलू तेली की सपरिवार भरी गर्मी में जबरन पदयात्रा भी पाठक तो उस कष्टपद यात्रा में सहयात्री बना देती है। "मनुष्य - यह!" में पंडित परसराम के मानसिक पसोपेश, "डाची" की सुंदर सांडनी, सूरजीत और ईश्वर के अंदर की ओर बढ़ते हुए "नासूर" और लहना सिंह की "चारा काटने के मशीन" सभी कहानियाँ पठनीय हैं। "अजगर" के बचवा का जीवन चक्र और दमघोंटू वातावरण या फिर कहा जाए कायरतापूर्ण व्यवहार भी लीक से हटकर प्रस्तुत की गई कृति है।

"आकाशचारी" कुछ अजब ही कथा थी। मैं अभी भी पूर्णतः समझ नहीं पाया हूँ।

पहले सोचा कि यह लेखक का एक दुस्वप्न है जिसमें वो आकाशचारी हो उठता है। या कुछ और गहरा और जटिल मनोवैज्ञानिक परीक्षण? या शायद हिंदी साहित्य जगत की विभिन्न हस्तियों और आलोचकों (जो शायद एक ही हैं?) के व्यवहार पर कटाक्ष है? फिर लेखक का २३ अगस्त १९६६ को लेखक गंगा प्रसाद विमल को लिखा गया एक पत्र पढ़ा जिसमें इस कहानी पर चर्चा की गयी है। इस पृष्ठभूमि के उजागर होने के बाद इस बाद कहानी को मैंने दोबारा पढ़ा।

इस पत्र के उस हिस्से को नीचे उद्धृत कर रहा हूँ:
मुहावरे की भाषा में कहें तो यह कहानी मैंने “दून की लेने वालों” यानी डींग मारने अथवा आसमान में उड़ने वालों पर लिखी है (और डींग आदमी स्वयं अपने सामने भी मारता है और दूसरों के सामने भी) और यह आकाशचारीपन हम सब में किसी न किसी मात्रा में मौजूद है | उन डींगों के पीछे छिपा सत्य, संत्रास और खोखलापन भी मैंने कहानी में दिखाया हैं । कहानी का नायक लंच के बाद तकिये लगा कर जरा अखबार देख रहा है कि अपने शत्रु आचार्य का लेख पढ़ने के बाद उसके मन में क्रोध उभरने लगता हैं और आँखें बन्द कर वह मन-ही-मन डींग मारने (आसमानों में उड़ने) लगता है।दूसरे खण्ड में उसकी आँखें झपक जाती हैं और वह अर्धजागृतावस्था में उस आकाशचारीपन के पोछे छिपी यथार्थता को देखता है। इसी बीच वह सो जाता है और यथार्थ स्वप्न से मिल जाता है। तीसरे खण्ड में वह दुःस्वप्न देखता है, जिसके माध्यम से उसके अंतर का भय उसके सामने आ जाता है। चौथे में वह जग गया हैं और तत्काल उसने फिर महानता का खोल चढ़ा लिया है। मैं नहीं जानता किसी ने कहानी को इस तरह पढ़ा हैं कि नहीं, पर मैंने ऐसे ही लिखा है ।

Displaying 1 of 1 review