Extracts from the diaries of this Hindi author describing his daily routine and discussing Hindi literature of his times; includes notes from his travelogue.
A well-known name in Hindi literature, Nirmal Verma is known mainly for his fictional works. Born on April 3, 1929, he obtained a M.A. in history from Delhi University. He studied Czech at the Oriental Institute in Prague, and has been a Fellow with the International Institute for Asian Studies. Nirmal Verma is a recipient of India's highest literary award, the Jnanpith, and his short stories Kavve aur kala pani won the Sahitya Akademi Award in 1985. Some of his more popular novels are Antim aranya, Rat ka riportar, Ek Chithra Sukh, and Lal tin ki chat.
Vedina, his first novel, is set in Prague, Czechoslavakia. Like all his works, it is rich in symbolism with a style that is simple yet sophisticated. As one of the most important prose Hindi writers of our times, Nirmal Verma's creativity extends to the description and travel to places in Europe especially on Czechoslovakia and literary criticism. Among his nonfiction writings is Kal ka jokhim an investigation of the Indic arts in the 20th century. His diary, Dhundh se uthati dhun, describes his life in detail while addressing issues related to Hindi literature. His works have been widely translated into English and Gujarati.
धुन्ध से उठती धुन निर्मल वर्मा जी के डायरी के अंश और यात्रा वृतांत की मिली जुली रचना है। मैं उपन्यास प्रेमी जीव हूँ, लंबी लंबी कहानियाँ जो कई कई दिनों तक चले मुझे पसंद है। गाहे बगाहे मैं छोटी कहानी भी पढ़ लेता हूँ किन्तु नॉन फिक्शन बहुत कम या यूँ कहिए नहीं के बराबर पढ़ता हूँ। #शील के कहने पर पहले जयशंकर जी की गोधूलि की इबारतें पढ़ी और फिर उनके द्वारा उपहारस्वरूप प्राप्त धुन्ध से उठती धुन पढ़ी। इन दोनों नॉन फिक्शनल किताबों को पढ़ना मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। मुझे दोनों किताबें बहुत पसंद आई। ढेर सारी किताबों के अध्ययन से जो ज्ञान नहीं प्राप्त होता है वो इन दोनों किताबों के पढ़ने से पता चला।
मेरे लिए साहित्य अध्ययन एक ऐसे बेचैनी से भरे प्रश्न का उत्तर ढूंढना है, या यूँ कहिए कि साहित्य मेरे लिए यह प्रश्नों की तलाश है। अक्सर किताबें पढ़ते हुए एक आलोक सा महसूस होता है, बिजली सी कौंध जाती है, ऐसा महसूस होता है कि हमने उन प्रश्नों की झलक सी पाई है किंतु कुछ पलों में वह हाथ से रेत की तरह फिसल जाती है। हाथ में राह जाता है एक घना अंधकार, एक अजीब सा सूनापन और कुछ खो जाने का एहसास जो प्यास और बेचैनी को और बढ़ा देता है। इन दोनों किताबों में उस शाश्वत प्रश्न का इतनी बार जिक्र है कि आप महसूस कर सकते है यही तो वो प्रश्न था और यही रूह की बेचैनी थी। यह कितना सीधा, आसान, स्पष्ट और सामने था पर कस्तूरी मिर्ग की तरह हम उसे पूरे जंगल में ढूंढते रहे जब कि वो सुगन्ध नाभि में था।
#शील द्वारा बताई और दी गयी किताबें किसी खजाने से कम नहीं निकली। मेरे द्वारा किसी भी नॉन फिक्शन किताब पढ़ने का सबसे अच्छा अनुभव रहा। संजोग की बात है कि जयशंकर जी और निर्मल वर्मा जी दोनों मित्र थे और उन दोनों के बीच 30 सालों का पत्राचार था। इसलिए उनकी डायरी में बहुत साम्य है। जयशंकर जी के पूरे जीवन पर निर्मल वर्मा जी की अमिट छाप है।
अब आते है उस प्रश्न के ऊपर जिसकी खोज हर साहित्यप्रेमी, जीवन में आस्था रखने वाला, नास्तिक, घोर निराशावादी, सत्य को खोजने वाला, सन्यासी या कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने कभी किसी छण में सत्य के किसी भी रूप की कैसी भी झलक देखी है, करता है।
9 अप्रेल 1993 को वर्मा जी अपनी डायरी में लिखते है कि " एक बार मुझे अपनी पुरानी डायरी हाथ लगी मेरी 25वीं या 26वां जन्मदिन रहा होगा - कितना विषाद और पछतावा था उस दिन, की इतने वर्ष बीत गए और मैंने कुछ नहीं किया! और अब जब सचमुच सब बीत गया है, लगता है, कोई असली सत्य पाना अब भी शेष है। वह एक संयमित, सात्विक जीने में उपलब्ध हो सकेगा, जिसकी झलक कभी विटगेन्शटाइन, कभी सिमोन वेल, कभी फ्लाबे में पाकर इतना अभिभूत हो जाता था। या रिनपोचे के व्यक्तित्व में ....
यह असली सत्य क्या है जिसे वर्मा जी पाना चाहते थे ? क्या यह असली सत्य उस सत्य से भिन्न कोई सत्य था जिसे गौतम बुद्ध ने बोधिवृक्ष के तले के सदियों पहले प्राप्त किया था ? क्या यह सत्य टॉलस्टॉय को प्राप्त हुआ था ? क्या यह गांधी के सत्य के प्रयोग वाला सत्य था ? क्या हर किसी का अपना अलग सत्य होता है जो हर किसी को अपनी झलक तो दिखाता है पर सामने नहीं आता है और मनुष्य का पूरा जीवन इस भ्रम में जी रहा है कि वो असली सत्य आस पास है और हम उसे प्राप्त करने के करीब है।
तो मेरे अपने निजी सत्य का क्या ? क्या कोई सत्य है भी की बस करोड़ो लोग यूँ की किताबें पढ़ पढ़ कर, कलम घिस घिस कर अपना समय ऊर्जा और जीवन यूँ ही नष्ट कर रहे है, सत्य की तलाश में या फिर खुद की तलाश में।
वर्मा जी ने असली सत्य क्यों कहा, कोई नकली सत्य भी होता है क्या ?
हजारों प्रश्न और उत्तर.....
इन प्रश्नों के उत्तर में वर्मा जी नोवोलिस को कोट करते हुए लिखते है-
" हम सत्य नहीं पा सकते। केवल अपने भ्रमों के आईने से उसकी उपस्थिति का आभाष पा सकते है। "
इस सत्य का आभाष इस किताब में आपको हर पन्ने पर मिलता है, ऐसा लगता है कि कुछ प्राप्त होने वाला है पर वास्तव में यह खाली करने की प्रक्रिया है आप जितना पढ़ते है आप खुद को उतना खाली महसूस करते है, ठीक समाधि की तरह आप जितना अंदर जाते है उतना हल्का, खाली, सुना और रिक्त महसूस करते है।
वर्मा जी 6 फरवरी 1993 को लिखते है -
" हम जो सोचते है, कुछ पढ़ते हुए अपने जीने- मरने के इतिहास का निर्भय परीक्षण करते है, वह हमारे दैनिक आचरण में छनकर क्यों नहीं आता ? "
इस प्रश्न का सामना मुझे हमेशा करना पड़ता है। क्यों इतना पढ़ने के बाद भी कोई अंतर नजर नहीं आता, कहाँ ये कड़ी टूट जाए रही है, क्या कोई बदलाव हो रहा है या फिर हम जैसे के तैसे बने हुए है, या पहले से बदतर होते जा रहे है।
2003- 04 की बात होगी मेरे हाथों में पहली बार सेल्फ डेवलपमेंट की किताब आयी थी,स्वेट मॉर्डन की किताब, मैं उन दिनों बहुत उत्साहित हुआ करता था। उनकी किसी किताब में पढ़ा था की हम जो भी सोचते है, बोलते है, पढ़ते है, सुनते है और करते है उनका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है, चाहे यह प्रभाव कितना छोटा या महत्वहीन ही क्यों न जान पड़ता हो। मुझे अपने अनुभव से लगा कि इस बात में सत्यता है इसलिए लगातार पढ़ता रहा की कुछ न कुछ, महत्वहीन सा ही सही पर सकारात्मक बदलाव तो जरूर आएगा। किन्तु कभी इसका लेखा जोखा नहीं रखा। अब वर्मा जी की उपरोक्त पंक्तियाँ पढ़ कर ऐसा लगता है कि यह एक महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न है।
This book is a collection of extracts from Nirmal Verma's diaries, including short travelogue snippets from when he traveled to Nagaland, Bastar, the Kumbh Mela, etc. There is a whole bunch of things he talks about in this book - spiritualism, existentialism, life, death, travel, literature, loneliness, solitude, the need to write, governement, poverty, culture... This book is a wide spectrum of his thoughts compiled into a couple hundred pages, and it gives a glimpse of who Nirmal Verma was. Reading this book is like looking at Nirmal Verma through a crack in the window where he's visible for an instant while moving constantly from here to there and back.
While reading the book I often forgot that it was a diary whose extracts I was reading, since Nirmal Verma seemed so much like a character out of his own books. It's difficult to draw a line when a writer is merely writing a character or writing himself on the pages. This blurry boundary is very clearly understandable when you read this book after having read some of his prior works.
A book one shouldn't miss at any cost, highly recommended!
"साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह सिर्फ हमें अपनी प्यास का बोध कराता है। जब तुम स्वप्न में पानी पीते हो, तो जागने पर सहसा एहसास होता है कि तुम सचमुच कितने प्यासे थे।"
इसी पुस्तक से उद्धरित ऊपर की पंक्तियाँ निर्मल वर्मा की लेखनी के लिए सटीक है ― पढ़ते हुए एक स्वप्नलोक में जाना और फिर यथार्थ के धरातल पर आते ही उस प्यास का बोध होना।
इस पुस्तक में उनकी डायरी के अंश हैं। 'चीड़ों पर चाँदनी' (ये पुस्तक भी साथ-साथ पढ़ी गई) में वे प्राग, जर्मनी, आइसलैंड, पेरिस, वियेना घुम रहे हैं और विदेश से सम्मोहित हैं तो इसमें अपने देश की धुंध के भीतर उठती धुन को सुन रहे हैं। हाँ, 1992-93 में उनके हार्वर्ड के दिनों की डायरी भी इसमें है।इसके अलावा दो रिपोर्ताज़ जो अपने में दो विपरीत स्थितियो�� का खाका खिंचती है ― सदियों से अक्षुण्ण रूप से चली आ रही और हमारी संस्कृति का प्रतीक कुम्भ मेला और आधुनिकरण के दौड़ में लोक-संस्कृति और प्रकृति को रौंदते हुए एक नए सिंगरौली के उदय का रिपोर्ताज़।
और as usual आप कई सारे लेखकों और पुस्तकों के नाम से परिचित होंगे।
निर्मल वर्मा की डायरी के ये अंश हर पन्ने पर एक नई पुस्तक का सार नज़र आते है। यह एक आराम से पढ़ी जाने वाली किताब है क्योंकि हर पन्ने पर कुछ न कुछ ऐसा लिखा हुआ है जिसे इंसान एक दिन में एक बार ही पढ़ने की क्षमता रखता है। यह किताब पढ़ते हुए लगता है कि निर्मल वर्मा सामने बैठे अपनी जिन्दगी की निजी भावनाओं को आपके सामने रख रहे हैं।
पढ़ते हुए यकीन नहीं होता कि एक इंसान इस तरह कैसे सोच सकता है। इसमें कुंभ से लेकर हार्वर्ड तक सब कुछ है। जिसने निर्मल वर्मा को पहले पढ़ रखा हो वही इसे पढ़ सकता है।
निर्मल वर्मा एक ऐसे लेखक है जो अकेलेपन की गहराइयों में कूद कर जिंदगी के मोती निकलकर , अक्षरों के सहारे किताबों में पिरोते है। ये एक ऐसी ही किताब है या यूं कह सकते है एक डायरी है। छोटी से छोटी लाइनों में उन्होंने इतना रस भरा है की आपको दो बार पढ़ कर उसको निचोड़ना होगा। उनके शब्दों को पढ़ कर शायद आप दुनिया को नए सिरे से देखना शुरू करेंगे । उनकी पंकित्यों में बहने के अलावा पाठक के पास और कोई चारा नहीं है। ठीक धुंध में उठती धुन की तरह ये डायरी निराशा, अकेलेपन और उद्गम समय में आपको रास्ता दिखाएगी
निर्मल वर्मा के बारे में जितना लिखा जाए उतना कम है। एक ऐसे लेखक जो जिंदगी की गहराईयों में डूब कर मोती निकाल के लाते है। ये किताब एक डायरी है जिसकी हर पंक्ति जिंदगी जीने का कोई नया पहलू दिखाता है। उनके द्वारा पिरोया हुआ हर शब्द सोने की तरह कीमती है। निर्मल वर्मा एक futuristic सोच के लेखक थे । आप उनकी कहानी पढ़ते हुए अपने आप को उसी कहानी का किरदार समझेंगे । I can't get enough of him.