आषाढ़ का एक दिन- मोहन राकेश
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आषाढ़ का महीना जाते-जाते "आषाढ़ का एक दिन" पढ़ डाला। पढ़ने का समय बड़ा अनुकूल मिला, बाहर पानी बरस रहा था, बादल घुमड़-घुमड़ कर गरज रहे थे-और बिल्कुल ऐसे ही वर्णन के साथ नाटक का पहला अंक शुरू होता।
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मल्लिका(नायिका) और अम्बिका( नायिका की माँ) का वार्तालाप होता है, जिससे ज्ञात होता है कि मल्लिका के विवाह हेतु अम्बिका काफी चिंतित है,किन्तु मल्लिका प्रख्यात नाटककार-शिरोमणि कालिदास (नायक) से एक प्रकार का आत्मिक-भावनात्मक-स्नेह रखती है। वैसे तो इस स्नेह को प्रकट रूप से कोई नाम नही दिया गया है, लेकिन क्योंकि मल्लिका विवाह से मना करती है, इसलिए इस भावना को प्रेम समझना ही सहज है। कालिदास की कीर्ति चहूँओर है, वे मेघदूतम नाटक की रचना कर चुके,एवम अपने बाल्यकाल की संगिनी मल्लिका के साथ उज्जयिनी राज्य के एक पर्वतीय ग्राम्य-प्रदेश में निवसित है। एक अन्य पात्र है- विलोम, जिसको खलनायक के रूप में लिया जा सकता है, परन्तु जैसे जैसे नाटक की प्रगति होती है, विलोम यथार्थवाद का प्रेरणाश्रोत लगता है। विलोम वास्तव में कालिदास के व्यक्तित्व का विलोम है-वह एक असफल कालिदास है- उसने भी छंदों की रचना का अभ्यास किया था, पर वह कोई काव्य लिखने में सफल न हो सका। कालिदास से उसे ईर्ष्या है, क्योंकि वह मल्लिका को अपनी प्रेयसी एवम पत्नी बनाना चाहता है, जबकि मल्लिका उसकी सूरत से भी घृणा करती है। एक अन्य मुख्य पात्र है मातुल (पशुपालक एवम नायक ���ा बड़ा भाई)।
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एक दिवस, उज्जयिनी से कुछ राज्याधिकारी उस ग्राम्य-प्रदेश में आते है और विदित होता है कि उज्जयिनी-नरेश कालिदास को राजकवि की पदवी से विभूषित करना चाहते है। कालिदास का मन अपने सुरभित, सुरम्य, हरित ग्राम्य-प्रदेश को छोड़कर चले जाने का नही होता है, किन्तु मल्लिका सच्चे प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करते हुए, निस्वार्थ होकर, कालिदास को मनाती है, कालिदास मान जाते है, पर एक बात यहाँ समझ में नहीं आती-विलोम एवम अम्बिका प्रकट रूप से कहते है कि यदि कालिदास एवम मल्लिका का आत्मिक स्नेह वास्तव में इतना प्रगाढ़ है, तो वह उसको साथ लेकर उज्जयिनी लेकर क्यों नही जाते- इस हेतु मल्लिका स्वयम प्रकट रूप से मना करती है, परन्तु कालिदास उसे ले जाने के लिए उद्धत नही होते है।
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कालिदास उज्जयिनी के राजकवि हो जाते, उनकी ख्याति और प्रसारित होती है, अन्य नाटकों की रचना भी वहीं करते है। एक राज-दुहिता प्रियंगुमंजरी से उनका पाणिग्रहण हो जाता है, राजा उन्हें कश्मीर के राज्य का शाषन सौंप दे देते है। इधर मल्लिका विरह-वेदना में घुली जाती है, दिन-रात कालिदास की याद करते हुए गुजारती रहती है। उज्जयिनी जाने वाले व्यापारियों से निवेदन करके कालिदास के नए प्रकाशित नाटकों की प्रतियां मँगवाती है, भोजपत्रों को सीकर, सहेजकर रखती है,कि यदि कभी कालिदास यहाँ आते हैं तो वह उन्हें भेंट स्वरूप उन्हें अर्पित करेगी। सच ही कहा गया है - प्रथम बार किया गया सच्चा प्रेम स्वयम के अस्तित्व को मिटाने वाला होता, आप किसी भी प्रकार का बलिदान करने से पीछे नहीं हटते चाहे बदले कुछ न प्राप्त हो। मल्लिका कहती है-
"सोचती थी तुम्हें मेघदूत की पंक्तियां गा-गाकर सुनाऊंगी। पर्वत शिखर से घण्टा-ध्वनियां गूंज उठेंगी और मैं अपनी यह भेंट तुम्हे हाथों में रख दूंगी।...कहूंगी देखो यह तुम्हारी नयी रचना के लिए है। ये कोरे पृष्ठ मैंने अपने हाथों से बनाकर सिये है। इन पर जब तुम जो भी लिखोगे, उसमे मुझे अनुभव होगा कि मैं भी कहीं हूँ, मेरा भी कुछ है।"
वास्तव में संवाद बहुत ही प्रभावशाली है। कालिदास कश्मीर प्रस्थान करते हुए अपने ग्राम्य-प्रदेश से गुजरते है, इच्छा भी होती है कि मल्लिका से भेंट कर लें, पर न जाने किस ग्लानिवश नही आ पाते है। किंतु उनकी पत्नी प्रियंगुमंजरी मल्लिका के जीर्ण-शीर्ण प्रकोष्ठ में उससे मिलने आती है। प्रियंगुमंजरी अपने राजत्व के अभिमान का प्रदर्शन करती है और मल्लिका की निर्धनता का उपहास करती है। वह कहती है-
"...देख रही हूं तुम्हारा घर बहुत जर्जर स्थिति में है। इसका परिसंस्कार आवश्यक है। तुम चाहो तो मैं इस कार्य के लिए आदेश दे जाऊंगी...।"
• संभवतः संवाद के समय इस तथ्य को भांप कर कि मल्लिका अब भी कालिदास जो कि अब मातृगुप्त कहलाते है के प्रेम की आस लगाए है, उसके समक्ष अपने किसी भी राज्याधिकारी से उसके परिणयन की बात कहती है। यह दर्शाता है कि राजत्व स्वयम को जब जिसपे जो चाहे थोपने का अधिकारी समझता है। प्रियंगुमंजरी चली जाती है। कालिदास मिलने नही आते। दूसरा अंक समाप्त हो जाता है।
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तीसरे अंक में मल्लिका का प्रकोष्ठ और भी जर्जर अवस्था मे दिखाया गया है, मल्लिका अब सुंदरी के स्थान पर रोगिणी दिखाई देती है। उसकी माता अम्बिका की मृत्यु हो चुकी है। आषाढ़ की धारासार वर्षा वाली रात है। मातुल से उसे समाचार प्राप्त होता है कि कालिदास ने राज-पाट त्यागकर सन्यास ग्रहण करने के लिए कश्मीर छोड़ दिया है। प्रथमतः उसे विश्वास नहीं होता, किन्तु मातुल के चले जाने के बाद वह कालिदास की सोच में खो जाती है। बिजली कौंध रही होती है, मेघ गर्जन होता, ड्योढ़ी का द्वार धीरे-धीरे खुलता है। कालिदास राजकीय वस्त्रों में परंतु क्षत-विक्षत द्वार पर खड़ा होता है। कहता है-
• "संभवतः पहचानती नही हो।"
• सत्य ही है। न तो अब वो वही कालिदास है और न ही अब वो वही मल्लिका है। दोनों के संवाद शुरू हो जाता है। कालिदास उसे समझाता है कि प्रारम्भ से ही उसका मन राज-काज में नही लगा, वह अस्थिर था, कुछ निर्णय नही कर पाया-
"मैं तब तुमसे मिलने के लिए नहीं आया क्योंकि भय था तुम्हारी आँखें मेरे अस्थिर मन को औऱ अस्थिर कर देंगी। मैं उनसे बचना चाहता था। उसका कुछ भी परिणाम हो सकता था। मैं जानता था तुम पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, दूसरे तुमसे क्या कहेंगे। फिर भी इस संबंध में निश्चित था कि तुम्हारे मन मे विपरीत भाव न आएगा।"
वह पुनः अब तक न व्यक्त किये गए प्रेम को शब्दों का रूप देने की कोशिश करता है-
"मैंने जब-जब लिखने का प्रयत्न किया तुम्हारे औऱ अपने जीवन के इतिहास को फिर-फिर दोहराया है।"
कालिदास अपनी विवशता और मूर्खता की लंबी-चौड़ी व्याख्या प्रस्तुत करता है, परन्तु अब बहुत देर हो चुकी है। द्वार पर आहट होती है, विलोम वर्षा जल में पूर्णतया भीगा हुआ प्रवेश करता है, वह मदिरापान किये हुए उन्मत्त है। कालिदास उसे वहां से तुरंत जाने को कहता है, परंतु मल्लिका कुछ नही बोलती। विलोम अट्ठहास करता है, तभी अंदर के प्रकोष्ठ से बालिका-शिशु का करुण क्रंदन सुनाई देता है। कालिदास को भान हो जाता है कि मल्लिका अब विवाहित है और विलोम उसका पति है। विलोम जबकि कालिदास से घृणा करता है, फिर भी उसे अथिति के रूप में स्वीकार कर, उसकी बात मानकर प्रकोष्ठ से चला जाता है। मल्लिका अंदर के प्रकोष्ठ में नवजात बालिका को चुप कराने जाती है। कालिदास उसी घनघोर वर्षा में चुपचाप निकल जाता है। पर्दा गिरता है।
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मोहन राकेश जी का यह पहला त्रिखण्डिय नाटक है जो 1958 में प्रकाशित हुआ था। इसे आधुनिक युग के प्रथम नाटक की संज्ञा भी दी जाती है। वर्ष 1959 में मोहन राकेश जी को इसके लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नाटक कालिदास के निजी जीवन पर आधारित है। कई बार इसका मंचन किया जा चुका है। 1971 में निर्देशक मणिकौल ने इस पर आधारित एक मूवी भी बनाई जिसने सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीता।
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• कई मायनों अपने समय-काल को ध्यान में रखते हुए यह एक युगांतकारी नाटक है, जिसमे प्रेम की अभिव्यंजना तो है ही, साथ-साथ यथार्थवाद और आदर्शवाद का द्वंद भी दर्शाया गया। प्रेम कितना ही आदर्श, परिपूर्ण, प्रगाढ़ क्यो न हो वह यथार्थ के सामने दम तोड़ ही देता है। मल्लिका और कालिदास तत्कालिक आदर्शो से बंधे हुए पात्र है वहीं विलोम और अम्बिका यथार्थता को प्रदर्शित करते है। प्रेम कितना ही आत्मिक क्यों न हो, वह अनन्त नही है, उसका अंत है, उसकी भी एक सीमा है। जीवन जीने के लिए सदैव एक आधार की जरूरत होती है। अम्बिका की मृत्यु के बाद मल्लिका विवाह कर ही लेती, वो भी विलोम से जिससे वह सम्पूर्ण जीवन घृणा करती है, न करती तो सम्भवतः वह भी काल का ग्रास बन जाती। कुछ भी हो, मल्लिका का चरित्र कालिदास से अधिक आकर्षक बन पड़ा है। वास्तव में नाटक की नायक तो वही है।