आईये! स्वागत है आपका मानव के संसार में। मानव दरवाज़े पर खड़े हैं, न्यौता दे रहे हैं आप को उनके संसार में जीने का। आप उनके कमरे में उनकी कुर्सी-मेज़ पर बैठ जाईऐ, वह चाय बना रहे हैं। आप चाहें तो उनकी किताबों की अलमारी टटोल सकते हैं।
'तितली' को पढ़कर समझ आया, जब आप लेखन की पराकाष्ठा पर खड़े होते होंगे तो, जीने और लिखने का अंतर, शायद ध्वस्त हो जाता होगा। एक विशुद्ध लेखक के अंतस् से, निजी कोनों से जो कविता उठती वह 'तितली' के जैसी होती होगी।
लेखक होने का अर्थ क्या है? हर गुज़रते लम्हे को रोककर, उसका हाल पूछने की जुर्रत! क्या यथार्थ की धारा से कुछ अलग होकर एक दूसरे फ्रेम से, आप घट रहे क्षणों को देख सकते हैं?! देख भी सकते हैं तो क्या यह जोखिम उठाएंगे?! क्योंकि जो घटित हो रहा है उसके साक्षी तो आप हैं ही, उसके पूर्ण होने में हिस्सेदार भी हैं। फिर अलग हटकर देखना इतना सरल हो नहीं सकता।
लेखन, कल्पना और वास्तविकता के मध्य कोहरे की दीवार है। कोहरे की खास बात होती है कि जितनी दूर तक देखो, वह घना होता जाता है। पर जैसे ही पास देखो वह नहीं होता! 'तितली' में कल्पना और वास्तविकता बरसों बाद मिली सहेलियों जैसी गले में लग रही हैं! कोहरा है पर इस निकटता में उससे फर्क़ नहीं पड़ता।
मेरे लिए 'तितली' एक अंडरवाॅटर अनुभव जैसी है। सब कुछ मद्धम पड़ चुका है। साँसे गहरी और लंबी हो चलीं हैं। दृश्य धुंधले हैं और सारी इंद्रियां बस इस क्षण को जी लेना चाहती हैं। बस, मैं हूंँ, शब्द हैं और यह क्षण है! इससे सुखद अनुभव कुछ नहीं। समय रबर की तरह खिंचकर लंबा हो गया है।
ये उस तरह की किताब कतई नहीं जहां आप फटाफट पन्ने पलट-पलट कर दो-ढाई घंटे में किताब खत्म कर देते हैं। यह उस तरह का लेखन है जहांँ हर कुछ पन्नों के अंतराल के बाद, आप छाती पर किताब को औंध रख, आंँखें मूंदे, शब्द, घटना ख़्वाब, यह सब जज़्ब करने लग जाते हैं। ऐसे लेखन को पढ़ते समय महज़ आपकी बुद्धि संलग्न नहीं रहती, आपका समग्र अस्तित्व, समय, जगह, कल्पना सब संलग्न हो जाते हैं।
'तितली' उन किताबों में से है जो दरवाज़ों की तरह होती हैं। दरवाज़े के इस तरफ और उस तरफ की दुनिया में क्या फर्क़ होगा, आप यह कह नहीं सकते। अक्सर पढ़ते-पढ़ते आपका यह अंदाज़ा धूमिल हो जाता है कि आप किस तरफ से किस तरफ आए हैं।आप अचानक समझ नहीं पाते इसमें से आपके हिस्से की वास्तविकता वाली तरफ कौन सी है।
कितना सुखद है कि जिनसे हम कभी मिले नहीं, जिन्हें कभी वास्तव में देखा नहीं, बस उनका लिखा कुछ पढ़ लिया है और इतने से पढ़े का जुड़ाव ऐसा लगता है मानो हमेशा से उन्हें जानते हैं। वार्तालापों में उनका जिक़्र आ जाए तो हम बड़े हक़ के साथ उनके लिए बोलना शुरू कर देते हैं। यह कोई fan होने वाली बात की वजह से नहीं। Fan होना तो शायद दूरी को और ज्यादा ही स्थापित कर देता है। यह तो इंसान की किसी दूसरे इंसान के प्रति सहज प्रतिध्वनि है। मिले बिना, बात किए बिना, आप उनको जानते हैं। यह कोई बहुत अचंभित करने वाली बात नहीं, बड़ी सुकून देने वाली बात है
जैसे मानव नाय्या को जानते हैं वैसे हम मानव को।