परशुराम की प्रतीक्षा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित खंडकाव्य की पुस्तक है। इस खंडकाव्य की रचना का काल 1962-63 के आसपास का है, जब चीनी आक्रमण के फलस्वरूप भारत को जिस पराजय का सामना करना पड़ा, उससे राष्ट्रकवि दिनकर अत्यंत व्यथित हुये और इस खंडकाव्य की रचना की।
Ramdhari Singh 'Dinkar' (September 23, 1908 – April 24, 1974) was an Indian Hindi poet, essayist, patriot and academic,[1][2] who is considered as one of the most important modern Hindi poets. He remerged as a poet of rebellion as a consequence of his nationalist poetry written in the days before Indian independence. His poetry exuded veer rasa, and he has been hailed as a Rashtrakavi ("National poet") on account of his inspiring patriotic compositions.[3]
As a mark of respect for him, his portrait was unveiled in the Central Hall of Parliament of India by the Prime Minister of India, Dr. Manmohan Singh on his centenary year, 2008.[4][5] On 23 November 2012, the President of India, Pranab Mukherjee gave away Rashtrakavi Ramdhari Singh 'Dinkar' Sahitya Ratna Samman to 21 prominent writers and social workers at a function organized in Rashtrapati Bhavan.[6] On the occasion, the President recalled the contribution of Ramdhari Singh 'Dinkar' in the freedom struggle and his service to Hindi literature.[6] Poet and former Prime Minister of India, Atal Bihari Vajpayee spoke of Dinkarji in high esteem.[7] Others who have praised his literary genius include Shivraj Patil, Lal Krishna Advani, Somnath Chatterjee, Gulab Khandelwal, Bhawani Prasad Mishra, and Seth Govind Das.[8]
Dinkar initially supported the revolutionary movement during the Indian independence struggle, but later became a Gandhian. However, he used to call himself a 'Bad Gandhian' because he supported the feelings of indignation and revenge among the youth.[9] In Kurukshetra, he accepted that war is destructive but argued that it is necessary for the protection of freedom. He was close to prominent nationalists of the time such as Rajendra Prasad, Anugrah Narayan Sinha, Sri Krishna Sinha, Rambriksh Benipuri and Braj Kishore Prasad.
Dinkar was elected three times to the Rajya Sabha, and he was the member of this house from April 3, 1952 CE to January 26, 1964 CE,[9] and was awarded the Padma Bhushan in 1959.[9] He was also the Vice Chancellor of Bhagalpur University (Bhagalpur, Bihar) in the early 1960s.
During The Emergency, Jayaprakash Narayan had attracted a gathering of one lakh people at the Ramlila grounds and recited Dinkar's famous poem: Singhasan Khaali Karo Ke Janata Aaati Hai (Devanagari: सिंहासन खाली करो कि जनता आती है; "Vacate the throne, for the people come").[10]
"है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ? किस पर जिम्मा है नहीं तुम्हारे वध का ? जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है, दैहिक बल को कहता यह देश गलत है।
नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में, कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में। यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है, पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ? अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो। वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है, जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।
जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है; है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं। वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है, वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है, लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है। असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है, पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।
तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में, किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में। बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं, सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।
पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ? यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ? तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा, है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।
जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा, शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा। हम पर अपने पापों का बोझ न डालें, कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें।
कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से, आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से, सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें, हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।
हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो, दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो। हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में, है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?
हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे ! जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !
जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में, या आग सुलगती रही प्रजा के मन में; तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को, निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा, अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।"
समकालीन पर लिखी गयी बहुत सुंदर अभिव्यक्ति , सबको जीवन का नया पाठ पड़ाती ये काव्यसंकलन निश्चित रूप से पड़ने योग्य है ।
“रोष, घोष, स्वर नहीं, मौन शूरता मनुज का धन है। और शूरता नहीं मात्र अंगार, शूरता नहीं मात्र रण में प्रकोप से धुँधुआती तलवार; शूरता स्वस्थ जाति का चिर-अनिद्र, जाग्रत स्वभाव, शूरत्व मृत्यु के वरने का निर्भीक भाव; शूरत्व त्याग; शूरता बुद्धि की प्रखर आग; शूरत्व मनुज का द्विधा-मुक्त चिन्तन है। विजय-केतु गाड़ते वीर जिस गगनजयी चोटी पर, पहले वह मन की उमंग के बीच चढ़ी जाती है, विद्युत् बन छूटती समर में जो कृपाण लोहे की, भट्ठी में पीछे, विचार में प्रथम गढ़ी जाती है। आँख खोलकर देख, बड़ी-से-बड़ी सिद्धि का कारण केवल एक अंग तलवार है; तीन अंश उसका निमित्त संकल्प-शुद्धि है, आशा है, साहस है, शुद्ध विचार है।”
"जीवन गति है, वह नित अरूद्य चलता है, पहला प्रमाण पावक का, वह जलता है । सिखला निरोध-निर्ज्वलन धर्म छलता है, जीवन तरंग-गर्जन है, चंचलता है । धधको अभंग, पल-विपल अरूद्य जलो रे ! धारा रोके यदि राह, विरुद्ध चलो रे !"
******************************** "उच्च मनुजता को ठुकराने से तो वह डरता है । किन्तु, उच्च गुण के कारण जो रण में हार गए हैं, उन पराजितों की किस्मत पर रोता है इतिहास, पर, अपाहिजों का कलंक वह क्षमा नहीं करता है । "
A pro-Gandhian through and through, Dinkar ji presents a stark contrast in his poems which are predominantly in ‘वीर रस’. He proudly supports, in blazing words, the virtue of counter-offence and violence in the face of oppression. Every line in his many creations is worthy of becoming a national war-cry. Highly recommended for all patriots and nationalists.
A great read. Seems relevant even after half a century of it being penned.
उठा शस्त्र लड़ना है तुझको न केवल बाहर के दुश्मन से। चित्त चीर कर अहंकार को भीतर से तुझको हरना होगा। लेकर हाथ कुठार तुझको मैं को काट गिराना होगा। दीप जलाकर मन में तुझको स्वयं को सूर्य बनाना होगा।
मैं दिनकर जी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। वो मेरे प्रियतम कवि हैं, जयशंकर जी के साथ। इस काव्य संग्रह में भी उनकी लेखनी का उत्कृष्ट नमूना मिलेगा। ये काव्य संग्रह भारत की चीन से पराजय के बाद लिखा गया है। प्रायः यह माना ही जाता है की दिनकर ओजस्वी कवि हैं। इस संग्रह में यह खुलकर सामने आया है। इसके अतिरिक्त इस संग्रह में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री का भी स्पष्ट विरोध किया है। इस संग्रह से १९७२ के पराजय के उपरांत एक कवि और जन मानस पर क्या बीती होगी इसका अर्थ लगाया जा सकता है। अंततः यह प्रश्न स्वभाविक है की मैंने पांच के स्थान पर चार सितारे क्यों चुने। इसका कारण है की यह दिनकर द्वारा रचित है। किसी और कवि के लिए संभवतः यह एक उत्कृ��्टम् रचना हो सकती थी। किंतु कुरुक्षेत्र, रश्मि रथि एवं उर्वशी लिखने वाले कवि के लिए यही उचित है।
1962 के युद्ध के परिप्रेक्ष्य में दिनकर जी द्वारा रचित वीर रस के इस संग्रह में कुल 18 कविताएं हैं। इन कविताओं में कवि ने शांति और संयम को त्याग आत्मरक्षा में तलवार उठाने के लिए युवावर्ग का आह्वान किया है। कवि ने चीन से निपटने के लिए गांधी और गौतम को त्यज, परशुराम की तरह गरलयुक्त और सामर्थ्यवान बनने को श्रेयस्कर माना है।
पर्वत पर से उतर रहा है महा भयानक काल मधुसूदन को टेर, नहीं यह सुगत बुद्ध का काल
तांडवी तेज फिर से हुंकार उठा है, लोहित में था जो गिरा, कुठार उठा है।
कुल मिलाकर इस संग्रह में युद्ध को आवश्यक बतलाया गया है। जो युद्ध में तटस्थ रहते हैं उन्हें भी कवि ने आड़े हाथों लिया है।
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।
ज्वलंत ! चीन युद्ध के बाद लिखी गयी ये कविताये आज के सामरिक स्थिति में सार्थक है । दिनकर जी का लेखन शरीर मे ऊर्जा उत्पन्न कर देता है की बस उठो और डट जाओ अपने लक्ष्य पर ।