शिक्षा : इनके मामा ने हस्तिनापुर में एक गुरुकुल की स्थापना की थी । वहीं जैनेन्द्र की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा हुई । सन् 1912 में उन्होंने गुरुकुल छोड़ दिया । प्राइवेट रूप से मैट्रिक परीक्षा में बैठने की तैयारी के लिए वह बिजनौर आ गये । 1919 में उन्होंने यह परीक्षा बिजनौर से न देकर पंजाब से उत्तीर्ण की । जैनेन्द्र की उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई । गतिविधियाँ : सन् 1921 से 23 के बीच जैनेन्द्र ने अपनी माता की सहायता से व्यापार किया, जिसमें इन्हें सफलता भी मिली । परन्तु सन् 23 में वे नागपुर चले गये और वहाँ राजनीतिक पत्रों में संवाददाता के रूप में कार्य करने लगे । जीविका की खोज में ये कलकत्ता भी गये, परन्तु वहाँ से भी इन्हें निराश होकर लौटना पड़ा । इसके बाद इन्होंने लेखन कार्य आरम्भ किया । प्रकाशित कृतियाँ : उपन्यास : परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, विवर्त, सुखदा, व्यतीत तथा जयवर्धन । कहानी संग्रह : फाँसी, वातायन, नीलम देश की राजकन्या, एक रात, दो चिड़ियाँ, पाजेब, जयसन्धि तथा जैनेन्द्र की कहानियाँ (सात भाग); निबन्ध संग्रह : प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, मंथन, सोच विचार, काम, प्रेम और परिवार, तथा ये और वे; अनुवादित ग्रंथ-मन्दालिनी, प्रेम में भगवान तथा पाप अरि प्रकाश ।