अखिलेश की कहानियों में चरित्र भी हैं। ये चरित्र कुछ कहानियों में एक हद तक कुछ धारणाओं के 'पझेनिफिकेशन' तो लग सकते हैं, लेकिन कहानी पढ़ते हुए वे धीरे-धीरे रोचकता और जीवन्तता से भर उठते हैं। 'बड़ी अम्मा' कहानी पढ़ते हुए गोर्की की 'मदर' की हल्की-सी याद आती है और कहानी का अन्त एक तरह से नियन्त्रित अन्त लगता है लेकिन अपने समूचे प्रभाव में यह कहानी इधर की दर्जनों चर्चित कहानियों से ज्यादा सशक्त कहानी सिद्ध होती है। इस संग्रह की कहानियों का उल्लेख एक और वजह से भी किया जाना चाहिए। अखिलेश की कहानियों में 'प्रेम' किसी रुग्ण मानसिक विलासिता या टटपुंजिया रोमांटिकता से भिन्न ठोस सामाजिक ज़मीन पर खड़ा हुआ एक वास्तविक मानवीय सामाजिक सम्बन्ध है। किसी मामूली क्लर्क के बेरोज़गार बेटे द्वारा एक बड़े इंजीनियर की बेटी से किया जाने वाला प्रेम अपने मार्मिक, हास्यास्पद और विडम्बनामूलक अन्त के लिए अभिशप्त है। यहाँ न तो प्रेम को लेकर किसी भोगवादी-आनन्दवादी 'चटखारिता' का गद्गद प्रस्तुतीकरण है, न एक मामूली औसत प्रेम का अपार गौरवान्वीकरण। अखिलेश की कहानियों में प्रेम नयी कहानी, अकहानी और प्रगतिवादी कहानी की रूढ़ धारणाओं से मुक्त है। यहाँ प्रेम उतना ही वास्तविक, आलोच्य और वर्गाश्रित है, जितनी कोई भी और चीज़। 'मुहब्बत' और 'घालमेल' जैसी कहानियाँ इसका उदाहरण हैं। 'मुक्ति' पिछले दिनों आया एक ऐसा कहानी संग्रह है जो समकालीन कहानी में अन्धकार देखने वाले आलोचकों की आँखों में 'आर्क लाइट' की तेज़ रोशनी डाल सकता है। भले ही उस चकाचौंध में उन्हें कुछ देर फिर से कुछ न दिखाई पड़े।