जगतगुरु श्री शंकराचार्य द्वारा लिखे गए इस किताब का अनुवाद और व्याख्या श्री नंदलाल दसोरा द्वारा की गई है। सृष्टि के आरंभ में एक ही मूल तत्व ब्रह्म था। ब्रह्म की चेतना शक्ति ही अपनी माया शक्ति की सहायता से सृष्टि के विभिन्न रूपों की रचना करती है। इसको जानना ही तत्वबोध है।
आत्मबोध की प्राप्ति के लिए सत्य और मिथ्या का ज्ञान आवश्यक है जिसे जानना ही तत्वबोध है। तत्व को जानकर मिथ्या का त्याग कर सत्य को उपलब्ध होना ही आत्मबोध है। आत्मबोध होने पर ही जीव और ब्रह्म की एकता का भान होता है। वही मोक्ष की स्थिति है। इसलिए प्रत्येक मुमुक्षु के लिए यह दोनों ग्रंथ सच्चे मार्गदर्शक हैं। 143 पृष्ठों की इस पुस्तक में संस्कृत श्लोकों की सप्रसंग व्याख्या की गई है ताकि सरलता से श्लोक के भाव को समझा जा सके।