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एक सड़क सत्तावन गलियां

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कमलेश्वर का यह उपन्यास मानवता के दरवाजे पर इतिहास और समय की एक दस्तक है... इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद एक दूसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परम्परा अब खत्म हो...

First published February 14, 1996

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About the author

Kamleshwar

97 books55 followers
Kamleshwar (कमलेश्वर) was a prominent 20th-century Hindi writer, and scriptwriter for Hindi cinema and television. Among his most well- known work are the films Aandhi, Mausam, Chhoti Si Baat and Rang Birangi. He was awarded the 2003 Sahitya Akademi Award for his cult Hindi novel Kitne Pakistan (translated in English as Partitions), and also the Padma Bhushan in 2005.

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Displaying 1 - 5 of 5 reviews
Profile Image for Tanuj Solanki.
Author 6 books447 followers
June 29, 2014
पात्रों के तरल आंतरिक एकालापों और साथ ही ठोस सामाजिक यथार्थों को खखोलते इस उपन्यास से श्रेष्ठ रचना मैंने तो हिंदी में अभी तक नहीं देखी. कमलेश्वर के इस उपन्यास में हिंदी उपन्यासों की कमजोरियां नहीं हैं. न तो व्यंग्य की इच्छा सर चढ़ बोलती है, न ही सामाजिक सुधर की. चालीस के दशक के इतिहास की उथल पुथल और विचारधाराओं की कश्मकश में एक साधारण असाधारण ढूंढती ये कहानी उन लोगों की कहानी है जो समाज का हिस्सा है भी और नहीं भी. यहाँ अच्छे डकैत हैं, यहाँ पवित्र वैश्याएँ हैं, यहाँ समलैंगिकों की जद्दोजहद है, यहाँ अलंटाप्प मसखरों की करी गयी साजिशें है. शहर में एक सड़क से कटती सत्तावन गलियां हैं, पर हमारे पात्र सड़क के एक कोने में बसे हैं. गलियों से उनका कारोबार इच्छाओं की पूर्ती या फिर इच्छाओं के दमन के लिए ही होता है. और ये उपमा जीवन के बारे में भी बहुत कुछ कह जाती है. "सीढ़ी सड़क है एक! पर… हर गली में आदमी घूमता है."
Profile Image for Tarun Pandey.
41 reviews1 follower
January 27, 2024
उपन्यास : एक सड़क सत्तावन गलियां
रचनाकार : कमलेश्वर

कमलेश्वर जी का पहला उपन्यास "एक सड़क सत्तावन गलियां" 5 प्रमुख किरदारों के जीवन के इर्दगिर्द घूमता है और अंधेरों में बसर कर रहे उनके जीवन को अलंकृत करता है। इस उपन्यास में सरनाम जैसा एक डैकैत है जो पहले मिलिट्री में काम करता था। बंसिरी नामक एक वेश्या है जिसकी पवित्रता पर कोई संदेह नहीं कर सकता। शिवराज जैसा एक अत्यंत भावुक इंसान है जिसे उसके पिता जी ने गुणानंद जी के चरणों में अर्पित कर दिया था सिर्फ़ तेरह साल की छोटी उम्र में। रंगीला जैसा एक मनमौजी व्यक्ति है जिसने ब्रह्मचारी शिवराज में भगवान का अंश देखा, जो सरनाम के करीबियों में गिना जाता रहा है और एक बाजामास्टर है जिन्हें संगीत से प्रेम है और जिनकी हाथों की लकीरों में भटकना ही लिखा है।

कहानी का सारांश :- कमलेश्वर जी ने अपने पहले ही उपन्यास में अपनी सशक्त लेखनी का लोहा मनवाया। इनका नाम नई कहानी आंदोलन से जुड़े अगुआ कथाकारों में आता है और उनकी कहानियों में अमूमन आपको आर्थिक, समाजिक और राजनीतिक समस्याओं से झुझते हुए मध्यमवर्गीय परिवारों का चित्रण देखने को मिल जाएगा और इस उपन्यास में भी उसका अंश है।

कहानी है मयन देवता की बसाई हुई एक बस्ती की, वहाँ के अड्डे की जहाँ से एक सड़क निकलती थी और उससे आकर मिलती सत्तावन गलियों की जैसे रीढ़ से जुड़ीं हो पसलियाँ।
बदलते हालातों की और उस अड्डे के मोटर ड्राइवरों के विलुप्त हो जाने की। बंसिरी और सरनाम के बीज पनपते प्रेम और कुंठा की। शिवराज और हेम के बीच पनपते प्यार की। शिवराज और सरनाम के दोस्त बनने की और फिर सरनाम द्वारा उसे सहारा देने की । रंगीले द्वारा बंसिरी को घर में लाने की और अंततः बाजमास्टर के पागल हो जाने की, लीला के मर जाने के उपरांत नाटक के असफल हो जाने की।

डकैती का एक चित्र उभर आता है सरनाम के मस्तिष्क में जब उसे एक नई योजना के बारे में बताता है मगन और इसी दौरान उसे धोखा मिलता है। हर तरफ़ उसकी खोजबीन शुरू हो जाती है। इस दौरान 5 किरदारों की ज़िंदगी के उतार चढ़ाव की दास्तां है "एक सड़क सत्तावन गलिया"

उपन्यास की विशेषता :-

1- इस उपन्यास के द्वारा सामाजिक ढकोसलों पर बहुत करारा वार किया है कमलेश्वर जी ने। बुराई के विरुद्ध आवाज़ उठाने की बात और आत्ममंथन की क्रिया का बेजोड़ नमूना पेश किया है सरनाम के किरदार द्वारा।

उदाहरण -[ 'ठाकुर साहब ! असल में लड़ाई की बात...' बीच ही में डॉ. लालचन्द की बात सरनाम ने काट दी, 'इन धर्म-मंडलियों से लड़िए डाक्टर साहब जो यहाँ के मेहनतकश लोगों को सोचने-समझने का मौका नहीं देतीं, इन ओझा और पाखण्डियों से लड़िए जो मजदूर के पसीने की कमाई चाट जाते हैं-इन ऊंची जात के कहे जाने वाले लोगों से लड़िए जो आदमी को आदमी
नहीं बनने देते। इन मंडी वालों से लड़िए जो मुनाफे के लिए बरसात में गल्ले को गोदामों में बन्द करके बाहर भेजने के लिए रोक रखते हैं। जिला बोर्ड के उन अमलाओं से लड़िए जो स्कूल के बनने के नाम पर पैसा खा जाते हैं। चुंगी के अफसरों से लड़िए जो हैजे की रोक-थाम के लिए नालियों पर सिर्फ चूना डलवाकर दवाइयों का पैसा हजम कर जाते हैं-अस्पताल के डाक्टरों से लड़िए जो गरीबों के लिए मिलने वाले इंजेक्शनों को बेच लेते हैं, दवाओं में पानी मिलाकर रोग का इलाज करते हैं !' इससे पहले कि डॉ. लालचन्द कुछ बोलें, कुछ रुककर सरनाम कहता ही गया-'उन सप्लाई अफसरों से पूछिए जो सीमेंट की बोरियाँ बनियों को
बांटकर खत्म कर देते हैं। उन ठाकुरों से लड़िए जो अहिंसा और गाँधीजी के नाम पर जिला कमेटी के सभापति पद के लिए दस-बीस के सर तुड़वा देते
हैं....उन नेताओं से लडिए जो जातिवाद के नाम पर वोट बटोरते हैं...भूदान कमेटी के अधिकारियों से लड़िए जो रिश्वत ले-लेकर जमीनें बाँटते हैं ! 】

2- मानवी संवेदनाओं को इतनी बारीकियों के साथ पाठक के सामने पेश करना तथा अंत तक कहानी से जोड़े रखना लेखक की रचनात्मक शैली और लेखन की परिपक्वता की और इशारा करता है। इस उपन्यास में हालातों के अनुरूप ढले पाँच किरदारों की कहानी है और एक अड्डे का बन्द हो जाना और वहाँ से जुड़ी चीज़ों को खो देने का दुःख है। यहाँ रिश्तों में पवित्रता है, समर्पण है, नेह है। समाज में हो रहीं गतिविधियों के प्रति जागरूकता है, संगीत की पूजा और रिश्तों को संजोने का प्रयास है। यहाँ समलैंगिकों की जद्दोजहद है और षड्यंत्र की दुर्गंद भी है। एक छोटे से अड्डे की दास्ताँ और इतनी विभन्नता शायद कमलेश्वर जी से अच्छा कोई और पेश भी न कर पाए। जीवन में जीने के लिए बहुत कुछ दाव पर लगाना पड़ता है। उदाहरण :-【 "बन नहीं सकती बनाना है...बनाऊँगा ! उस नरक से एक यही वरदान या शाप लाया हूँ शिवराज ! लीला कहती थी-मैं ठीक हो जाऊँ तब हम दोनों मिलकर चला लेंगे नाटक कम्पनी ! वह जानती थी कि मेरा यह सपना
है...पर तब वह लाचार हो चुकी थी ! कहने को तो लीला वेश्या थी पर मेरे हारमोनियम को दोनों बाँहों में समेटकर, माया टिका देती थी...उसके बाल ढक लेते थे कुँजियों को ! लीला कहती थी-'तुम इतना अच्छा बजाते
हो फिर कोई नहीं आता !' और मैं उसकी हताश प्रशंसा का जवाब देता था-'तुम इतना अच्छा गाती हो, फिर भी कोई नहीं आता !' तब वह दूर अंधेरे आकाश को ताकती हुई कहती थी, “यह गाना-बजाना ढोंग है सब,
सीधा व्यौपार करना चाहिए..., तभी उसने सोचा था, हम नाटक कम्पनी भी तो खोल सकते हैं...रूखा-सूखा खा लूँगी पर यह व्यौपार नहीं करूंगी, और कौन-सा धंधा है हमारे लिए...लेकिन वह हार गई-एक तरफ भूख और मौत खड़ी थी, दूसरी तरफ जिन्दगी और खुशहाली ! उसने तन का सौदा करके जिन्दगी को ही चुनना मंजूर किया ! क्या बुरा किया उसने शिवराज ! कितनी
बड़ी सौगात होती है, जिन्दगी ! पर खुशहाले की जगह भयंकर रोग ने उसे डस लिया ! अपनी भरी जवानी के आखिरी-खोखले दिनों में वह मुझसे भजन सुना करती थी...मीरा और सूरदास के भजन ! घबराकर पूछा करती थी-"मैंने गलती तो नहीं की, जिन्दा रहने के लिए किया था यह सब ! तुम तो गवाह हो ! कम्पनी बन सकती तो मैं सिर्फ तुम्हारी होकर रहती..बोलो, मुझ पर विश्वास करते हो...बोलो, चुप क्यों हो...?" कौड़ी की तरह निकली हुई उसकी आँखें मुझे हमेशा घूरती हैं। बार-बार कहती हैं-कम्पनी बन सकती तो मैं सिर्फ...कहते-कहते बाजामास्टर चुप हो गया-"सिर्फ..एक नाटक कम्पनी !" फिर एक गहरी साँस खींचकर उसने बताया-“इसीलिए इस रामलीला मण्डली में चला आया...वह सूरदास और मीरा के भजन सुनते-सुनते मरी थी। मेरी मीरा मर गई थी शिवराज ! मेरी मीरा विष नहीं झेल पाई-हँसते-हँसते उसने विष का प्याला पिया था। मन नहीं लगता शिवराज ! मीरा लीला..." 】

3- ये कमलेश्वर जी के लिए दुर्गम समय था और आत्महत्या क्यों न करें वो सोचते रहते थे। उस मजबूरी में उन्हें ये उपन्यास बेचना पड़ा और श्री अमरनाथ ने 80 रुपये में इसके सारे अधिकार खरीद लिए। इस उपन्यास को इन्होंने बदनाम बस्ती के नाम से छापा मगर 20 साल बाद कमलेश्वर जी के दोस्त जवाहर चौधरी ने कमलेश्वर जी की तकलीफ़ समझी और श्री अमरनाथ से बात की और उन्होंने उपन्यास के सर्वाधिकार कमलेश्वर जी को लौटा दिए।

/ तरुण पाण्डेय
Profile Image for Mohammad Sabbir  Shaikh.
271 reviews39 followers
June 26, 2020
This book wasn't on my TBR list. But when I saw it the first time, I was quickly drawn towards it. It was the title that pulled me in, made me read at least its beginning. And the next thing I know I was already half way through, walking in those 57 lanes. It's a brilliant novel. Kamleshwar's writing is simple. His characterisation is great. Each character in it seems more real than imagined. I am so very glad that I picked this book. It's my favourite now. And so is Kamleshwar.
Profile Image for Saurabh Sharma.
133 reviews30 followers
July 25, 2021
I wrote a longform piece on queer fiction from India for The Chakkar: This review is borrowed from the same.‘In fiction, one finds the opportunity to utter the unsayable’ – An exploration of Queer Literature from India.

A brilliant first book

Ek Sadak Sattavan Galiyaan (A Street with 57 Lanes) by Kamleshwar Prasad Saxena. Sarnamsingh, a truck driver and a dacoit, is shown showering rather dubious affection on a Brahmin boy Shivraj. At the same time, he is also involved with the nautanki dancer Bansari. “A symbolic depiction of low-life in India’s heartland of Uttar Pradesh,” Hoshang Merchant, who writes about the book in his anthology Forbidden Sex/Texts: New India’s Gay Poets, says that “these [characters] are not freaks but ordinary Indians.”

This ordinariness must be duly credited to the pioneering writer Kamleshwar. It was his first novel. The ease with which he presents Shivraj’s conundrum, who is disgusted living with his ustaad and at the same time feels sympathetic towards him, makes this story a non-judgemental portrayal of nonnormative desires. A giant leap, I would say, from the earlier mentions of homosexuality and bisexuality in the Indian literature, in the Hindi language. (The book was adapted into a movie—Badnaam Basti directed by Prem Kapoor—in 1971. Its print has been recovered recently after 49 years of ‘mysterious disappearance’.)
Profile Image for Chandra Mohan Thakur.
3 reviews9 followers
October 14, 2013
("एक सड़क सत्तावन गलियाँ" by कमलेश्वर) A novel that stays in your mind for long and you keep meeting the characters again and again in your dreams. An intense writing by Kamleshwar
Displaying 1 - 5 of 5 reviews

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