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“उत्तंक मुनि अधिकतर समय तपस्यालीन रहते थे, इसलिए उन्हें खाने-पीने का समय कम ही मिलता था। एक दिन प्यास लगी तो उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण कर अमृत-सा जल पिलाने को कहा। तभी घड़ा हाथ में लिये एक चांडाल आता दिखाई दिया। उसे चारों ओर से कुत्तों ने घेर रखा था। वह निकट आकर बोला, ‘‘मुनिवर! आप प्यासे हैं। कृपया अमृत के समान जल ग्रहण कीजिए।’’ उतंक मुनि क्रोधपूर्वक बोले, ‘‘अधम! मैं एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हूँ। तेरे हाथों जल तो क्या, अमृत भी ग्रहण नहीं कर सकता। कृष्ण ने मेरे साथ छल किया है।’’ लेकिन चांडाल विनीत भाव से जल पीने का आग्रह करता रहा। इससे क्रुद्ध होकर मुनि बोले, ‘‘तुच्छ प्राणी ठहर, मैं अभी तुझे शाप देता हूँ।’’ यह कहकर उत्तंक मुनि जैसे ही शाप देने को हुए, चांडाल और कुत्ते अदृश्य हो गए और वहाँ भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए। यह देख उत्तंक मुनि स्तब्ध रह गए।”
Harish Sharma, Vedon Ki Kathayen: Rediscovering the Timeless Tales and Teachings of the Vedas
“अदिति बोलीं, ‘‘प्रभु! देवों के साथ-साथ दैत्य भी मेरे पुत्रों के समान हैं। अतः आप इनकी ऐसे रक्षा करें कि किसी का भी अहित न हो।”
Harish Sharma, Vedon Ki Kathayen: Rediscovering the Timeless Tales and Teachings of the Vedas
“श्रीकृष्ण शांत भाव से युद्ध कर रहे थे, इससे राक्षस का न बल बढ़ रहा था और न आकार। मल्लयुद्ध करते हुए श्रीकृष्ण राक्षस को देखकर मुसकरा रहे थे। इससे राक्षस का बल और आकार घटता गया। धीरे-धीरे वह बिलकुल छोटा हो गया।”
Harish Sharma, Vedon Ki Kathayen: Rediscovering the Timeless Tales and Teachings of the Vedas
“कालांतर में ‘वारा’ और ‘असि’ नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा। वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम ‘वाराणसी’ पड़ गया। इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म”
Harish Sharma, Vedon Ki Kathayen: Rediscovering the Timeless Tales and Teachings of the Vedas
“त्रिदेव उन्हें इच्छित वर देकर चले गए। नियत समय पर अनसूया ने ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा, विष्णुजी के अंश से दत्तात्रेय तथा शिवजी के अंश से दुर्वासा को जन्म दिया।”
Harish Sharma, Vedon Ki Kathayen: Rediscovering the Timeless Tales and Teachings of the Vedas

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