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“कौन-सी मछली पेड़ पर चढ़ जाती है?” “कबई मछली…काले रंग की होती है…बहुत देर तक बिना जल के ज़िंदा रहती है…”
Geetashree, Rajnatni
“कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो, चौंसठ योगिनियों में से कोई एक योगिनी प्रकट हो गई हो, कोई भटकी हुई यक्षिणी, यक्ष को खोजती हुई ठिठक गई हो, कोई गंधर्व-कन्या रास्ता भटक गई हो, जिसे वशीकरण मंत्र आता हो और जो सभी कलाओं में निपुण हो।”
Geetashree, Rajnatni
“मैं आपसे प्रेम नहीं करती हूँ सौमित्र…आपसे मैत्री संबंध स्थापित किया था, आपने उसके गलत अर्थ लगाए। मुझे क्षमा कर दें, मैं आपके उपकारों के बदले अपने मन का सौदा नहीं कर सकती। मैं उस पुरुष को नहीं वरूँगी जिसे मैं प्रेम नहीं करती।”
Geetashree, Rajnatni
“राजा बनकर सिर्फ़ शासन नहीं किया जाता, उसकी चिंताएँ अनेक प्रकार की होती हैं। उसके भीतर अनेक प्रकार की दुर्द्धर्ष लालसाएँ भी पलती हैं। पूरा करो तो मरो, न करो तो मरो। दोनों में मृत्यु है। ये शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की मृत्यु हो सकती है। यह कोई राजा ही बेहतर समझ सकता है।”
Geetashree, Rajnatni
“हँसती तो फूल झरते, रोती तो मोती। नृत्य करती तो मोरनी को मात देती; लास्य भंगिमा देख स्वर्ग की अप्सरा रम्भा, मेनका, शरमा जायें। बिजली-सी कौंधती इस बला पर सैकड़ों राजाओं का मुकुट धराशायी होता। परंतु यह अपने आप में अलग-सी थी। मातृभूमि के लिये हृदय में अतिशय प्रेम और जीवन के प्रति राग था।”
Geetashree, Rajnatni
“फल छीनने के बाद वृक्ष और फूल तोड़ लेने के बाद पौधे सूने ही हो जाते हैं। कोयल अचानक चुप हो जाती है। उसकी कूक कम सुनाई पड़ती है। जाने कहाँ चली जाती है। अपने को कैसे मौन कर लेती है। बरसात चली जाती है, किंतु सबको इतना गीला करके जाती है कि सबके ऊपर उसका असर काफ़ी समय तक रहता है। जैसे पत्तों पर इतना पानी छुप जाता है कि जब उसके पास से गुज़रो तो भिगो देते हैं। तेज़ हवा में वे झरझरा कर बूँदें बरसा देते हैं।”
Geetashree, Rajnatni
“रात में खिलने वाले फूलों में कितनी गंध, कितनी मादकता होती है। सारे सफ़ेद फूल रात में ही खिलते हैं, जाने क्यों। सोन चंपा बचा लिया, बल्लाल”
Geetashree, Rajnatni
“दूध में नहाई, नीली आँखों वाली सुंदर कन्या ने जन्म लिया। आँखें क्या, मीन के आकार की आँखें थीं, मानो दो मछलियाँ आँखें बन कर चेहरे से चिपक गई हों। सुग्गे के होंठ जैसे लाल-लाल होंठ। रजनी अपनी पुत्री का रूप निहारे और न्योछावर हुई जाए।”
Geetashree, Rajnatni
“क्या स्त्री अलग माटी की बनी होती है जो अभिसार से ठीक पहले वार्ता का प्रस्ताव रख दे। ठीक कहते हैं पंडित ज्ञानी…नारी का मन अबूझ है, दैव भी न पहुँच सकते वहाँ।”
Geetashree, Rajnatni
“क्षणिक आनंद, स्वर्ग से वंचित कर देगा। उसकी चेतना ने उसे चेताया। वह उन्माद को झटक कर दूर जा गिरी।”
Geetashree, Rajnatni
“मानो उसे फूलों की लहलहाती घाटी दीख गई हो। दोनों हाथ फैला कर वह गोल-गोल घूमने लगी थी। बहुत लय थी उसकी देह में। तनी हुई रस्सी पर चलने का बचपन से अभ्यास जो था। नाचते-नाचते देह को जिस मुद्रा में चाहे, मोड़ लेती थी।”
Geetashree, Rajnatni
“अपने साथ कई किस्म के फूलों के बीज लेकर आए थे। उन्हें उगाकर फूलों से वे खुशबू भर देना चाहते थे। उन्हें इतना मालूम था कि इस संसार में उनका कोई स्थायी घर नहीं है। वे डेरा बनाते हैं, डेरा लगाते हैं, डेरा उठाते हैं। अपने साथ अस्थायी डेरा लेकर चलते हैं। उनको एक स्थायी सुकून था कि उन्हें कोई उनके डेरे से तब तक नहीं उखाड़ सकता, जब तक उनका जी न चाहे। वे चलते रहे…चलते रहे…दूरियाँ लाँघते रहे…नाचते रहे, गाते रहे…कई मौसम देखे, बारिश झेली, ग्रीष्म की लू पचा गए, पतझड़ में उदास न हुए, वसंत पर भरोसा कर लिया। काफ़िला चलता रहा…चलता रहा…”
Geetashree, Rajnatni
“आप ऐसे न छेड़ा करें, किसी दिन तालाब में कूद जाऊँगी। बहुत गहरा है पानी। तैरने में कच्ची हूँ। अभ्यास नहीं रहा।”
Geetashree, Rajnatni
“वृक्ष हवा के आवेग झेलकर थक गए थे, इसीलिए पत्तियाँ हौले-हौले हिल रही थीं।”
Geetashree, Rajnatni
“तुम मेरे चरित में इतनी-सी बात अवश्य लिखना कि मुझे कुलीना स्त्रियाँ नहीं मोहती थीं। मुझे वनफूल पसंद हैं।”
Geetashree, Rajnatni
“आप युद्ध की तैयारी कर सकते हैं, आक्रमण कर सकते हैं, लूटपाट करवा सकते हैं, मैं स्वयं से युद्ध करती हुई हारती रही…”
Geetashree, Rajnatni
“रात ओस में गीली होती रही।”
Geetashree, Rajnatni
“ऊ माई कहती है, बस जल्दी से तेरी कोंपल फूटे, ब्याह लायक हो जाएगी…जाने कोंपल फूटना क्या होता है। माई आजकल मुझ पर नज़र गड़ाए रहती है, मानो कुछ ढूँढ रही हो, कुछ जानना चाहती हो…रिश्ता तो आया रखा है, मेरे औरत बनने का इंतज़ार हो रहा है…”
Geetashree, Rajnatni
“मैं आपको साथ लेकर जाऊँगा…या मैं मिथिला को छोड़ कर कभी नहीं जाऊँगा। मैं शैव धारा में जीता हूँ, बड़े हठी होते हैं”
Geetashree, Rajnatni
“काफ़िले से बिछड़ने का फ़र्क आपको पड़े। हम स्त्रियों को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। हम जो एक बार जिस काफ़िले से बिछड़े, जीवन में दोबारा कहाँ मिलते हैं। आप तो अपने काफ़िले के साथ बने हुए हैं, मेरा काफ़िला, मेरे लोग, स्मरण हैं आपको? कहाँ गए वो लोग? किस प्रदेश में होंगे?”
Geetashree, Rajnatni
“घर पछुआरे धनी, लवंग केर गछिया लवंग तुबइ सारी राति हे ताही अवसर अएला, सामी हमर सामी होतहिं भोर भिनुसार हे… कहवां से अएलौं सामी भोर भिनुसरबा हे… कहमाँ गमएलौं सारी राति हे तोहरो सं सुन्नरि धनी मालिन बेटिया उहमे गमैलौं सारी राति हे आबथु मालिन बेटी बैसथु पलंग चढ़ि कइसे लोभएल सामी (स्वामी) मोर हे राजा बेटा हँसलइ हमे मुसकेलियै मोने मोन जोड़ल पिरीत हे…”
Geetashree, Rajnatni
“एक साँवली लड़की, जिसने देह पर एक वस्त्र किसी तरह लपेट रखा था। कमर से लेकर वक्ष तक एक ही वस्त्र में, काले घने बाल खुले थे, हवा में उड़ रहे थे। लड़की चुपचाप झुरमुट के पास बैठी थी। गुमसुम, अपने में खोयी हुई। बल्लाल ने छुपकर उसे निहारा। लड़की का मासूम सौंदर्य उसे खींच रहा था। उसका मन हुआ—सीधे उसके पास जाए और प्रणय निवेदन कर दे। मन पर नियंत्रण किया।”
Geetashree, Rajnatni
“प्रेम एक पल में पराया कर देता है। उनसे दूर कर देता है जो अपने होते हैं। प्रेम का अपना मनोलोक होता है।”
Geetashree, Rajnatni
“मैं पुष्प-गंध तुम पुष्प-रंग पिया।”
Geetashree, Rajnatni
“हम बस गए तो उसी जाल में फँस जाएँगे, जिसमें संसार फँसा है, हमें पेशा बदलना होगा, कोई जाति चुननी होगी, जातीय पहचान के बिना हमें कोई टिकने न देगा अधिक दिन तक।”
Geetashree, Rajnatni
“शांत पड़ी हुई लड़की, एक चंचल लहर में बदल गई थी। चेहरे की सारी उदासी गायब। अब वो उछलने लगी थी। पहले कोई चंचल हिरणी थमी हुई थी।”
Geetashree, Rajnatni
“वह स्वर्ग की उस नदी में उतरा, जिसका किनारा उसे नहीं चाहिए था। चाहे उस वक्त स्वर्ग छूट जाए।”
Geetashree, Rajnatni
“रात में खिलने और महकने वाले अधितकर फूल सफ़ेद ही होते हैं…”
Geetashree, Rajnatni
“मधुमालती की झाड़ हूँ, ज़्यादा काँट-छाँट पसंद नहीं करती, खुल कर बढऩा और फैलना पसंद है हमें, महल में कैसे रह पाऊँगी…”
Geetashree, Rajnatni
“डेरे के बाहर गीत-संगीत में डूबे थे। कुछ सयानी लड़कियाँ और औरतें नृत्य कर रही थीं। सर्द रात थी। अलाव जलाए हुए कुछ लोग आग ताप रहे थे। कुछ मंजीरे, ढोल पर थाप दे रहे थे। ढोर-डंगर समीप ही शांत पड़े हुए थे। मशालें जला कर रोशनी का प्रबंध किया गया था। वह ईंटों का चूल्हा बना कर खाना पकाने का बंदोबस्त करने लगी थी। बंजारा मिट्टी का घड़ा लेकर पानी की खोज में निकला हुआ था। बंजारन अचानक वहाँ चली गई, जहाँ नृत्य चल रहा था। दूर से ही नज़ारा लेती हुई वह भी ठुमकने लगी। उधर चूल्हा सुलगता रहा, वह विस्मृत कर गई। नृत्य से गहरा लगाव जो था। दूर से हल्के अँधेरे-उजाले में बंजारे ने अपनी बंजारन को नृत्य-मग्न देखा तो आह्लाद से भर उठा। चलो, अच्छा हुआ…अपने आप नृत्य कर रही है, ऐसे तो उसे आग्रह करना पड़ता था। कुछ देर उसके नृत्य को अपलक देखता रहा, मुग्ध होता रहा कि बंजारन नाच-गाकर, करतब दिखाकर, परिवार का पेट तो भर ही लेगी।”
Geetashree, Rajnatni

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