,
Goodreads helps you follow your favorite authors. Be the first to learn about new releases!
Start by following Manav Kaul.

Manav Kaul Manav Kaul > Quotes

 

 (?)
Quotes are added by the Goodreads community and are not verified by Goodreads. (Learn more)
Showing 1-30 of 58
“क्या तुमने कभी देखा है ख़ुद को पढ़ते हुए?
मैंने उस दृश्य को लिखा है तुम्हारे लिए…”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“Hapiness is as exclusive as a butterfly, and you must never pursue it. If you stay very still, it may come and settle on your hand. But only briefly. Savour those moments, for they will not come in your way very often.”— Ruskin Bond”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“सब साफ़ दिखने से कम दिखना कितना कुछ देता है! बहुत बोलने से चुप कितना कुछ कहता है!”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“मैं अब वैसा नहीं रह गया हूँ, जैसा तुमने मुझे छोड़ा था। मैं वहीं हूँ, पर उस पगडंडी पर अब डामर की सड़क बिछ गई है। आस-पास का सारा हरा स्याह हो गया है। लगातार गिरने का डर बना रहता है, सो मेरी जड़ें निकल आई हैं। पर जहाँ हम मिला करते थे, वे कुछ जगहें अब भी हरी हैं। तेज़ धूप में जब भी उन छायाओं से गुज़रता हूँ तो हिचकी आ जाती है।”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“यह जीवन असल में एक ख़त है—किसी के लिए। पूरा जी लेने के बाद हम चाहते हैं कि बुढ़ापे में एक दिन हम बरामदे में किसी बरगद की छाया तले बैठे हुए चाय पी रहे हों। हल्की मुलायम धूप हो और उस दिन काँपते हाथों से हम अपना जीवन जो एक ख़त-सा किसी लिफ़ाफ़े में है, उसे खोलें और उस किसी को वह ख़त पढ़कर सुनाएँ। उसे हमारा जीवन एक काल्पनिक कहानी लगेगा और हम उस कल्पना में—किसी जंगल में चलते हुए—उस कहानी के सारे झूठ उसके साथ फिर जी लेंगे।”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“मैं वह नहीं हूँ जो दिखता हूँ, मैं वह हूँ जो लिखता हूँ।”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“जब भी हम मिलते लगता कि हम दोनों के लिए सब कुछ कितना नया है। हम दोनों कॉफ़ी पर बहुत देर तक अपने क़िस्से सुनते-सुनाते रहे। कुछ ही देर में हम दोनों के पास से किताबों-सी ख़ुशबू आने लगी थी।”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“बहुत बोलने से चुप कितना कुछ कहता है! हम एक जगह चुनते हैं, जहाँ बैठे रहने का सुख”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“छोटी–छोटी व्यस्तताएँ आदमी को कॉकरोच बना देती हैं। फिर उसे लगता है कि वह कभी भी नहीं मरेगा।”
Manav Kaul, ठीक तुम्हारे पीछे [Theek Tumhare Peechhe]
“तुम एक पत्थर छोड़ते हो तो दूसरा पत्थर उठा लेते हो। भारी पत्थरों को ढोते रहना तुम्हारी आदत है जिससे तुम बाज़ नहीं आते हो। हल्के रहो। छोड़ो पत्थर।”
Manav Kaul, ठीक तुम्हारे पीछे [Theek Tumhare Peechhe]
“मुझे उनके घर की घंटी बजाते ही दिखना बंद हो गया था। कुछ देर में विनोद कुमार शुक्ल मेरे सामने खड़े थे। वह जाँघिया और फटी हुई बनियान में थे। मुझे लगा कि ये वह नहीं हैं। यह उनके उपन्यास का कोई पात्र है। मुझे सिर्फ़ उनके पैर दिखे और बिना देरी किए मैं नतमस्तक था। वह झेंप गए, “आप लोग बैठिए, मैं कुछ पहनकर आता हूँ।” हम भीतर बहुत ही सादे-से कमरे में जाकर बैठ गए। पूरे कमरे में सिर्फ़ एक मुक्तिबोध की तस्वीर लगी थी। मुझे याद है जब मैंने विनोद जी को फ़ोन किया था, उनकी आवाज़ सुनते ही मैं काँपने लगा था। ज़बरदस्ती के अँग्रेज़ी शब्द मुँह से निकलने लगे। कुछ देर की हड़बड़ाहट के बाद मैंने उन्हें ‘आई लव यू’ कहा और फ़ोन काट दिया था। अभी उनके कमरे में बैठे हुए, मैं”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“कुछ तार कभी टूटते नहीं हैं. कितनी भी कोशिशें क्यों न कर लें. उन्हें लाख आश्वासन भी क्यों न दें कि अभी तोड़ रहे हैं, पर बाद में गांठ बांध कर फिर से जोड़ सकते हैं, पर वह मानते नहीं हैं. सारे तनाव, खिंचाव के साथ वह भीतर कहीं बहुत महीन त्रासदी के साथ जुड़े रहते हैं.”
Manav Kaul, Bahut Door, Kitna Door Hota Hai
“मुझे उनके घर की घंटी बजाते ही दिखना बंद हो गया था। कुछ देर में विनोद कुमार शुक्ल मेरे सामने खड़े थे। वह जाँघिया और फटी हुई बनियान में थे। मुझे लगा कि ये वह नहीं हैं। यह उनके उपन्यास का कोई पात्र है। मुझे सिर्फ़ उनके पैर दिखे और बिना देरी किए मैं नतमस्तक था। वह झेंप गए, “आप लोग बैठिए, मैं कुछ पहनकर आता हूँ।” हम भीतर बहुत ही सादे-से कमरे में जाकर बैठ गए। पूरे कमरे में सिर्फ़ एक मुक्तिबोध की तस्वीर लगी थी। मुझे याद है जब मैंने विनोद जी को फ़ोन किया था, उनकी आवाज़ सुनते ही मैं काँपने लगा था। ज़बरदस्ती के अँग्रेज़ी शब्द मुँह से निकलने लगे। कुछ देर की हड़बड़ाहट के बाद मैंने उन्हें ‘आई लव यू’ कहा और फ़ोन काट दिया था। अभी उनके कमरे में बैठे हुए, मैं अपनी”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“नींद एक धोखा है। बिखरी हुई ज़िंदगी के बीच जब भी एक गहरी नींद मिलती है तो लगता है कि सब सही हो गया है। मानो बिखरा हुआ घर उठते ही वापिस, ख़ुद-ब-ख़ुद सलीक़े से जम गया।”
Manav Kaul, प्रेम कबूतर
“और फिर वही त्रासदी हुई कि हम भटके नहीं”
Manav Kaul, Bahut Door, Kitna Door Hota Hai
“चमकने के बीच में जीता है।”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“जीने की प्रक्रिया में हमेशा सवाल जमा होते रहते हैं । कुछ जवाब मिल जाते हैं, कुछ सवाल धुंधले पड़ जाते हैं, और कुछ आपके साथ, अपनी पूरी तीव्रता लिए रहने लगते हैं ।”
Manav Kaul, Antima
“चुप्पी कैसे कहें?” उसने कहा। “तुम लिखते हो... तुम जानो।” “इन सारे मौन को कहने के लिए एक प्रेत की ज़रूरत होगी... चलते-फिरते प्रेत की... जो बातों को ऐसे कहे कि कविता लगे... हाँ कविता... कविता की ज़रूरत होगी... कविता छुपे हुए वाक्यों को सतह पर आसानी से ले आती है। पर उस प्रेत को सुनने के लिए गहरे उतरना पड़ेगा।” “कितना गहरे?” भूमिका ने चंचलता लिए पूछा। “उतना ही जितनी जगह हमेशा छूटी रहती है हमारे दो संवादों के बीच।” भूमिका चुप रही और वह इस चुप्पी में किसी प्रेत के कुछ कह देने की प्रार्थना करने लगा।”
Manav Kaul, Chalta-Phirta Pret । चलता-फिरता प्रेत
“वह बारिश के ही दिन थे जब मां नहीं रही थी । तब पूरा घर काटने को दौड़ता रहता था । मैं और मेरे पिता के बीच से मानो सारा सामान्य किसी ने उधेड़ दिया था । हम दोनों उधड़े स्वेटर से पूरे घर में बिखरे पड़े रहते । मैं उनके लिए क्या करूं और वो मेरे लिए क्या करें में हम दोनों एक-दूसरे को ताकते रहते ।”
Manav Kaul, Antima
“I have survived because of my writing. This enormous banyan tree of words has sheltered me from harsh days in the sun. One could call it escapism.....Though I have found love in my life, I have understood it only through my writing.”
Manav Kaul, A Night in the Hills
“जाने कितनी उम्र होगी इनकी ! जाने कितने लोगों का जाना इन्होंने देखा होगा ! शायद एक उम्र के बाद मृत्यु भी दैनिक जीवन का हिस्सा जान पड़ती होगी, जिसका घटना, दूध उबलकर गिर जाने जितना दुख देता होगा ।”
Manav Kaul, Antima
“कितनी दूर?” “बहुत दूर।” “नदी के उस पार तक…।” “नहीं… और दूर… जहाँ ये हाईजाज जाता है।” “कहाँ जाता है हवाई जहाज?” “बहुत ही दूर।” “तेरे को पता है बहुत दूर कितना दूर होता है?” “कितना?” “अबे जहाज तो चाँद पर भी जाते हैं।” “ये वाला थोड़ी जाता होगा।” “क्या पता!”
Manav Kaul, Bahut Door, Kitna Door Hota Hai । बहुत दूर, कितना दूर होता है
“बहुत दूर आने पर भी बहुत दूर आ गए हैं का एहसास नहीं होता है. अपना जिया हुआ अभी भी पूरे शरीर में, कल ही की तो बात है, जैसी हरकत कर रहा होता है. उदासी किस तरह परछाई की तरह बिल्कुल साथ में सरक रही होती है.”
Manav Kaul, Bahut Door, Kitna Door Hota Hai
tags: past
“शायद बच्चों का बड़ा होना जितना मां-बाप को खलता होगा, उतना ही बच्चों का मां-बाप को लगातार बूढ़े होते देखना । पर ये बचकानी बातें हम एक-दूसरे से कहते नहीं कि बडे़ मत हो या बूढ़े मत हो... हम बस एक-दूसरे से आंखें चुराने लगते हैं ।”
Manav Kaul, Antima
“मैं पहाड़ों को देखता हूँ तो बार-बार सिर झुक जाता है। शर्म आती है ख़ुद पर। हमारे भीतर कितनी ज़्यादा हलचल है! कितने छिछले हैं हमारे सपने और कितना कमज़ोर है हमारा ‘मैं’! पहाड़—चुप और शांत—अपनी पूरी ख़ूबसूरती और अपने सारे रहस्यों के साथ हमारे सामने खड़े रहते हैं, पर हमारी नज़र ‘मैं’ के आगे देख ही नहीं पाती। उसे नहीं देख पाती जिसकी गोद में हमने अपना सिर टिकाया हुआ है। उसके देवदार और चीड़ हर बहती हवा के साथ हँसते होंगे हम पर। हम जैसे सदियों से सदियों तक उनके पास आते रहेंगे, पर उन्हें कभी देख ही नहीं पाएँगे—चुप, शांत, गंभीर!”
Manav Kaul, Tumhare Baare Mein
“I took out my laptop, and my fingers began to dance on the keyboard. I wish I knew how to write! I wish I knew how to live! The gap between the movement of my fingers and what I was feeling so intensely in that moment was so huge that I could see the knots in the formation of each sentence being written. Then, in the process of untying the knots, I would get so entangled that I would lose my grip on what exactly I was feeling. There was a tiff going on between my living and my being. I would write and delete, again write and again delete. Each time I felt I was being untruthful. Every time the word 'Kashmir' would appear in front of my eyes, I wondered why this word seemed to be so distant. I left my Kashmir. I tried to write Shabeer's Kashmir or tried to narrate from Mushtaq's point of view. Why had my Kashmir faded so much?”
Manav Kaul, Rooh, A Novel
“expectation is an enigma concealed in the envelope of life.”
Manav Kaul, Under the Night Jasmine
“वह जब भी दिखता है मुझपर थोड़ा हँस लेता है। मैं कई बार बीच सड़क को छोड़कर गलियों में छिप जाता हूँ। जीवन का सामना करने से मैं घबराता हूँ। जीवन की उम्र मेरी उम्र के आस–पास ही कहीं है। वह हमेशा अचानक मुझसे टकरा जाता है, कहता है कि चलो बैठकर बात करते हैं। मैं उसके साथ कभी नहीं बैठता हूँ। मैं उससे खड़े–खड़े बात करता हूँ। खड़े–खड़े बात करने में एक चलतापन होता है जिसपर मैं हमेशा सहज बना रहता हूँ। बैठकर बात करने में ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। बैठकर बात लंबी चलती है। फिर खड़े होने की गलियाँ खोजनी पड़ती हैं। बैठकर बात करने में बहुत देर खड़े होकर भी बात होती रहती है। बैठे–बैठे आप सीधे जा नहीं सकते। जबकि खड़े–खड़े बात करने में आप सीधे कहीं जा सकते हैं।”
Manav Kaul, ठीक तुम्हारे पीछे [Theek Tumhare Peechhe]
“पर मैं बार-बार उस बात पर वापस आता हूं कि मैं क्या हूं ? और इस दुनिया में मेरी भागीदारी क्या है ? सारे जवाब लगातार बदलते रहते हैं और लगातार एक असहायता घर करती जाती है । यह लड़ाई भीतर कभी ख़त्म नही होती कि हमारी भागीदारी का क्या मतलब है ? और वह कहां तक है ? इन सवालों के प्रति ईमानदारी बनाए रखने में हमारी सारी भागीदारी भी, समस्या की परिधि पर अपना दम तोड़ चुकी होती है ।”
Manav Kaul, Antima
“Some, who have closed their eyes, are wide awake. Some, who look out at the world, are fast asleep. Some who bathe in sacred pools remain dirty. Some are at home in the world but keep their hands clean.”
Manav Kaul, Rooh । रूह

« previous 1
All Quotes | Add A Quote
Tumhare Baare Mein Tumhare Baare Mein
654 ratings