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“महरी के पीछे-पीछे चोर दरवाज़े में घुसे। कमरों के बाद कमरे, दालान के बाद दालान, सेहन के बाद सेहन पार करते हुए, नौकरों, बाँदियों, लौंडियों और गुलामों की सलामें लेते हुए आखिर बेगम के खास कमरे में पहुँचे। सफेद चाँदनी का फर्श, चाँदी का तख्तपोश और कोच, छत में झाड़ और हज़ारा फानूस, चाँदी की एक पलंगड़ी, कीमती बिल्लौर की गोल मेज़ कमरे के बीचोंबीच।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], धर्मपुत्र
“अविवेक के सम्मुख विवेक नहीं चलता। जहाँ अविवेक है वहाँ विवेक सावधान रहता है।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“अम्बपाली की यवनी दासी मदलेखा के निकट आई, उसकी लज्जा से झुकी हुई ठोड़ी उठाई और कहा–‘‘कैसे इतना सहती हो बहिन, जब हम सब बातें करते हैं, हंसते हैं, विनोद करते हैं, तुम मूक-बधिर-सी चुपचाप खड़ी कैसे रह सकती हो? निर्मम पाषाण-प्रतिमा सी! यही विनय तुम्हें सिखाया गया है? ओह! तुम हमारे हास्य में हंसती नहीं और हमारे विलास से प्रभावित भी नहीं होतीं?’’ रोहिणी ने आंखों में आंसू भरकर मदलेखा को छाती से लगा लिया। फिर पूछा–‘‘तुम्हारा नाम क्या है, हला?’’ मदलेखा ने घुटनों तक धरती में झुककर रोहिणी का अभिवादन किया और कहा–‘‘देवी, दासी का नाम मदलेखा है।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“राज-काज में अनुरोध मानकर शासन करने की मेरी आदत नहीं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“वह रस अमोघ है। वह आनन्द का स्रोत है, वर्णनातीत है। उसमें आकांक्षा नहीं, वैसे ही तृप्ति भी नहीं, इसी प्रकार विरक्ति भी नहीं। वह तो जैसे जीवन है, अनन्त प्रवाहयुक्त शाश्वत जीवन, अतिमधुर, अतिरम्य, अतिमनोरम! जो कोई उसे पा लेता है उसका जीवन धन्य हो जाता है।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“रुद्रभद्र यद्यपि गंग सर्वज्ञ का अंतेवासी और शिष्य था। पर था वह वाम-मार्गी। वह त्रिपुरसुन्दरी देवी का अनन्य उपासक था। वह तन्त्र-शास्त्र का प्रकाण्ड पंडित और अभिचार-योग का प्रसिद्ध ज्ञाता समझा जाता था। मारण, मोहन, उच्चाटन आदि अभिचार-कार्य वह प्रायः करता रहता था। यह प्रसिद्ध था कि कालभैरव उसका वशवर्ती और दास है, तथा उसकी आज्ञा से यह देवता सब सम्भव-असम्भव कृत्य-कुकृत्य कर सकता है। रुद्रभद्र जिस पर कुपित हुआ, उसके जीवन की खैर न थी और शीघ्र या विलम्ब से कालभैरव उसे खा जाता था। कालभैरव”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“पहले सरस्वती नदी के जल से, फिर बहाववाली नदी के जल से, फिर प्रतिलोम जल से, मार्गान्तर के जल से, समुद्र-जल से, भंवर के जल से, स्थिर जल से, धूप की वर्षा के जल से, तालाब के जल से, कुएं के जल से, ओस के जल से, फिर तीर्थों के विविध जलों से, भिन्न-भिन्न मन्त्र पढ़कर राजा का अभिषेक किया गया।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“केवल नष्ट होने के लिए साहस करना तो आत्मघात कहाता है, और आत्मघात सदैव ही पाप है।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“तुम्हें आप्यायित करूंगी अपनी सेवा से, सान्निध्य से, निष्ठा से और तुम अपना प्रेम-प्रसाद देकर मुझे आपूर्यमाण करना।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“देव-रक्षा भी होनी चाहिए।’’ ‘‘देवता तो नित्य-रक्षित हैं पुत्र।’’ ‘‘फिर भी सुरक्षा के विचार से देवता का स्थानान्तरित होना आवश्यक है।’’ ‘‘सर्वदेशस्थ–सर्वव्यापी देवता का कैसे स्थानान्तर करोगे पुत्र?’’ ‘‘मेरा अभिप्राय ज्योतिर्लिङ्ग से है प्रभु।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“स्वर्ण-मृणाल-सी कोमल भुज-लताएं सर्पिणी की भांति वायु में लहरा रही हैं। कोमल कदली-स्तम्भ-सी जंघाएं व्यवस्थित रूप में गतिमान होकर पीन नितम्बों पर आघात-सा कर कटि-प्रदेश को ऐसी हिलोर दे रही हैं जैसे समुद्र में ज्वार आया हो। कुन्दकली-सा धवल गात, चन्द्रकिरण-सी उज्ज्वल छवि और मुक्त नक्षत्र-सा दीप्तिमान् मुखमण्डल–सब कुछ अलौकिक था। क्षण-भर में ही युवक विवश हो गया। उसने आखेट एक ओर फेंककर वीणा की ओर पद बढ़ाया। अम्बपाली के पदक्षेप के साथ वीणा आप ही ध्वनित हो रही थी। युवक ने वीणा उठा ली, उस पर उंगली का आघात किया, नृत्य मुखरित हो उठा। अब तो जैसे ज्वालामुखी ने ज्वलित, द्रवित सत्त्व भूगर्भ से पृथ्वी पर उंडेलने प्रारम्भ कर दिए हों, जैसे भूचाल आ गया हो, पृथ्वी डगमग करने लगी हो। वीणा की झंकृति पर क्षण-भर के लिए देवी अम्बपाली सावधान होतीं और फिर भाव-समुद्र में डूब जातीं। उसी प्रकार देवी सम पर ज्योंही पदक्षेप करतीं और निमिषमात्र को युवक की अंगुली सम पर आकर तार पर विराम लेती, तो वह निमिष-भर को होश में आ जाता। धीरे-धीरे दोनों ही बाह्यज्ञान-शून्य हो गए। सुदूर नील गगन में टिमटिमाते नक्षत्रों की साक्षी में, उस गहन वन के एकान्त कक्ष में ये दोनों ही कलाकार पृथ्वी पर दिव्य कला को मूर्तिमती करते रहे–करते ही रहे। उनके पार्थिव शरीर जैसे उनसे पृथक् हो गए। उनका पार्थिव ज्ञान लोप हो गया, जैसे वे दोनों कलाकार पृथ्वी के प्रलय हो जाने के बाद समुद्रों के भस्म हो जाने पर, सचराचर वसुन्धरा के शेष-लीन हो जाने पर, वायु की लहरों पर तैरते हुए, ऊपर आकाश में उठते चले गए हों और वहां पहुंच गए हों जहां भूः नहीं, भुवः नहीं, स्वः नहीं, पृथ्वी नहीं, आकाश नहीं, सृष्टि नहीं, सृष्टि का बन्धन नहीं, जन्म नहीं, मरण नहीं, एक नहीं, अनेक नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं!”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“युवक ने सामने महामाया की विकराल मूर्ति हाथ में त्रिशूल लिए देखी। रुद्रभद्र ने कोप कर कहा, ‘‘अधम, महामाया के कोप में गिर कर भस्म होगा तू।’’ फिर पात्र में मुँह लगाकर गटागट बहुत-सी मद्य पीकर जलती हुई दृष्टि से युवक की ओर देखा। युवक ने प्रणिपात करके कहा, ‘‘प्रभु, अपराध क्षमा हो, सर्वज्ञ की आज्ञा उल्लंघन करने की शक्ति मुझ में नहीं थी।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“रज़ील, तबीयत से भी और खसलत से भी।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], धर्मपुत्र
“मैं संयमी हूं, दूसरे लोग अपने लिए जो अन्न रांधते हैं, उसी में से बचा हुआ थोड़ा अन्न मैं भिक्षाकाल में मांग लेता हूं। आप लोग यहां याचकों को बहुत स्वर्ण, वस्त्र, अन्न दे रहे हैं। मुझे स्वर्ण नहीं चाहिए, उससे मेरा कोई काम नहीं सरता। वस्त्र मैं श्मशान से उठा लाता हूं, मैं तो दिगम्बर आजीवक हूं, मुझे अन्न चाहिए। मुझे अन्न दो। आपके पास बहुत अन्न हैं, आप लोग खा-पी रहे हैं, मुझे भी दो, थोड़ा ही दो। मैं तपस्वी हूं, ऐसा समझकर जो बच गया हो वही दो।’’ एक ब्राह्मण ने क्रुद्ध होकर कहा–‘‘अरे मूर्ख, यहां ब्राह्मणों के लिए अन्न तैयार होता है, चाण्डालों के लिए नहीं, भाग यहां से।’’ ‘‘अतिवृष्टि हो या अल्पवृष्टि, तो भी कृषक ऊंची-नीची सभी भूमि में बीज बोता है और आशा करता है खेत में अन्न-पाक होगा। उसी भांति तुम भी मुझे दान दो। मुझ जैसे तुच्छ चाण्डाल मुनि को अन्न-दान करने से तुम्हें पुण्य-लाभ होगा।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“मैं सर्वजय और सर्वज्ञ हूं, निर्लेप हूं, सर्वत्यागी हूं, तृष्णा के क्षय से मुक्त हूं। मेरा गुरु नहीं है। मैं अर्हत हूं, मैं सम्यक्-सम्बुद्ध, शान्ति तथा निर्माण को प्राप्त हूं,”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“भिक्षुओ! विद्वान् आर्य को रूप से, वेदना से, संज्ञा से और विज्ञान से उदास रहना चाहिए। उदास रहने से इन पर विराग होगा, विराग से मुक्ति, मुक्ति से आवागमन छूट जाएगा भिक्षुओ!”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“दूर-दूर के कौल वामपन्थी उस उत्सव में सम्मिलित होते थे। ‘महाशक्ति त्रिपुरसुन्दरी’ का स्तवन, कीर्तन और पूजन, उत्तर कौल-क्रिया से कौलिक सम्प्रदाय के शाक्त करते थे। इन दिनों यहाँ नित्य मद्य, मांस और मत्स्य मधु का नैवेद्य चढ़ता, भैरवी चक्र की रचना होती, और भक्तगण भोगविलास को मोक्ष का परम साधन मानकर, वर्ण-जाति का विचार छोड़कर, महाशक्ति महामाया त्रिपुरसुन्दरी की आराधना करते थे। मन्दिर के एक गोपनीय भाग में शंकर की अर्द्धाङ्गिनी महाशक्ति की आराधना होती थी। और उसकी पूजा-अर्चना परम्परा से चली आती हुई–दीक्षित स्त्री-पुरुषों के समक्ष, अवर्ण्य विधि से होती थी। बिना दीक्षित हुए व्यक्ति का वहाँ पहुँचकर जीवित लौटना सम्भव न था।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“पार्थिव लिंग शरीर से जब ज्योति अन्तर्धान हुई, तब देवाधिष्ठान वहाँ कहाँ रहा? देवप्रस्थान तो हो चुका।’’ ‘‘कब?’’ ‘‘आज–अभी।’’ ‘‘तो अब यह लिंग, देवता नहीं?’’ ‘‘नहीं, देवता का पार्थिव शरीर है–जैसे मृत पुरुष का निष्प्राण शरीर रह जाता है।’’ ‘‘देवता कहाँ गए?’’ ‘‘अन्तर्धान हो गए।’’ ‘‘किसलिए?’’ “धर्मद्वेषी शत्रु के विनाश के लिए।’’ ‘‘कहाँ?’’ ‘‘किसी पुण्य शरीर में।’’ ‘‘किस प्रकार?”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“अब कामभोग की परितृप्ति के लिए, मायामय आचरण, संयमसहित, वैर-भाव से मुक्त हो आत्मा का अहित करनेवाली प्रवृत्तियों को त्यागकर, पाप-कर्मरूप कांटे को जड़मूल से खींच निकालने में सतत यत्नशील था। अहिंसा उसका मूलमन्त्र था। यह सर्वजित् पुरुष प्रत्येक वर्षाऋतु का चातुर्मास किसी नगर-ग्राम में ठहरकर काटता था। चार-चार उपवास करता और वर्षा की समाप्ति पर फिर पैदल यात्रा करता था।इस प्रकार वह कठिन वज्रभूमि लाटदेश को पारकर भद्दिलपुर,कदली-समागम,कूपिक, भद्रिकापुरी, आदिग्राम आदि जनपद घूमता हुआ राजगृह में आ पहुंचा। राजगृह में बुद्ध महाश्रमण की बहुत धूम थी। वे अनेक बार राजगृह आ चुके थे और अब नगर में भिक्षु चारों ओर घूमते दीख पड़ते थे। परन्तु इस श्रमण का आचार-व्यवहार ही भिन्न था। महाश्रमण बुद्ध ब्रह्मचर्य पर विशेष बल देते थे, परन्तु महावीर जिन अहिंसा पर आग्रह रखते थे। वे ‘छै जीवनिकाय’ का उपदेश देते थे, उसी पर स्वयं भी आचरण करते और उसे धर्मज्ञान करानेवाला, चित्त शुद्ध करनेवाला और प्राणिमात्र के लिए श्रेयस्कर समझते थे।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“राजा वही है जो सबका स्वामी है, जिसे राजत्व का ज्ञान है और मर्यादापालन की शक्ति है। जिसमें वह नहीं है, वह राजा ही नहीं। उसके प्रति विद्रोह का प्रश्न ही नही उठता।’’।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“मै तुझसे यह पूछती हूँ, कि क्या तुझसे किसी ने यह नहीं कहा कि तू मृत्यु का दूत, जीवन का शत्रु और मनुष्यों में कलंक रूप है?”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“यद्यपि कोई शाश्वत चैतन्य आत्मा संसार में नहीं है, परन्तु एक चेतना-प्रवाह स्वर्ग या नरक आदि लोकों के भीतर एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक शरीर-प्रवाह से दूसरे शरीर-प्रवाह में बदलता रहता है।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“क्षत्रियों के लिए अपना प्राचीन दार्शनिक धर्म छोड़ नया मोटा धर्म निर्माण कर लिया, जिसे समझने और उस पर आचरण करने में उन विदेशियों को कोई दिक्कत नहीं हुई।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“यदि कोई यथार्थ पौरुषवान् पुरुष हो और यौवन और सौन्दर्य को वासना और भोगों की लपटों में झुलसने से बचा सके, तो उसे प्रेम का रस चखने को मिल सकता है।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“इन तलवारों के पीछे दासता, घमण्ड, स्वार्थ, दुराचार, पाखण्ड जो छिपा हुआ है। ये एक लाख तलवार अमीर की उस अकेली तलवार का भी मुकाबला नहीं कर सकतीं जो केवल एक ईश्वर को मानता है, जिसका एक धर्म, एक जाति, एक ईश्वर और एक ईमान है–जहाँ छोटे-बड़े सब बराबर हैं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“नारी-जन्म पाया तो पुरुष को आत्मार्पण भी करो।’’ ‘‘यह तो स्त्री-पुरुष का नैसर्गिक आदान-प्रतिदान है।’’ ‘‘वह गान्धार में होगा हला; यहां केवल स्त्री ही आत्मार्पण करती है, पुरुष नहीं। पुरुष स्त्री को केवल आश्रय देता है।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“तुम्हारा यह दिव्य रूप, यह अनिन्द्य सौन्दर्य, यह विकसित यौवन, यह तेज, यह दर्प, यह व्यक्तित्व स्त्रीत्व के नाम पर, किसी एक नगण्य व्यक्ति के दासत्व में क्यों सौंप दिया जाए? तुम्हारी जैसी असाधारण स्त्री क्यों एक पुरुष की दासी बने? यही क्यों धर्म है”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“साधु,श्रमण,निगण्ठ,श्रोत्रिय लोग भक्ष्य,भोज्य,चूष्य,लेह,चव्य आदि विविध पदार्थों का आस्वाद ले रहे थे।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“भिक्षुओ! यह दु:ख निरोध भी सत्य है जिसमें तृष्णा का सर्वथा विलय होकर त्याग और मुक्ति होती है।”
आचार्य चतुरसेन, वैशाली की नगरवधू [Vaishali ki Nagarvadhu]
“त्रिपुरसुन्दरी के सम्बन्ध में विविध किंवदन्तियाँ थीं। अनेक रस-रहस्य की बातें लोग करते थे। वहाँ प्रत्येक गोख और स्तम्भ पर शिवशक्ति की मिथुन-मूर्तियाँ खुदी थीं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ

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