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“इसके बावजूद १३ नवंबर १९४८ कि रात को कुख्यात बंगाल स्टेट प्रिजनरस एक्ट के अधीन श्रीगुरुजी को फिर गिरफ्तार कर लिया गया. यह वही एक्ट था, जिसे आज़ादी से पहले नेहरू ने एक "काला कानून" बताया था......... सत्याग्रहियों का मुख्य नारा नेहरू सरकार क्को दी गयी इस चुनौती के रूप में था- 'संघ के खिलाफ आरोप सिद्ध करो या प्रतिबन्ध हटाओ।”
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“पटेल और नेहरू के बिच हुए पत्र व्यव्हार से भी यह बात स्पष्ट होती है. इस मामले में संघ कि लिप्तता कि जांच का अनुरोध करते हुए प्रधानमंत्री द्वारा लिखे गई पत्र के निस्चययात्मक जवाब में पटेल ने गांधीजी कि हत्या के एक महीने के भीतर २७ फरवरी १९४८ को भेजे पत्र में लिखा- "में लगभग दैनिक आधार पर बापू कि हत्या के मामले में चल रही जांच कि प्रगति पर नज़र रखे हुए हूँ. सभी मुख्य आरोपी अपनी गतिविधियो के बारे में लम्बे और ब्योरेवार विवरण दे चुके थे. इन विवरणों से यह साफ़तोंर पर उभरकर आ जाता है कि संघ का इस मामले में कोई हाथ नहीं था.”
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