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Start by following कबीर दास.
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“देह धरे का दंड है सब काहू को होय । ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय॥
भावार्थ: देह धारण करने का दंड–भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है। अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए, दुखी मन से सब कुछ झेलता है।”
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भावार्थ: देह धारण करने का दंड–भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है। अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए, दुखी मन से सब कुछ झेलता है।”
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“मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग ।
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग ॥”
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तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग ॥”
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“साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं ।
धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं ॥
भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं, सच्चे साधु का मन भाव को जानता है, भाव का भूखा होता है, वह धन का लोभी नहीं होता क्योकि जो धन का लोभी है वह तो साधु नहीं हो सकता”
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धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं ॥
भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं, सच्चे साधु का मन भाव को जानता है, भाव का भूखा होता है, वह धन का लोभी नहीं होता क्योकि जो धन का लोभी है वह तो साधु नहीं हो सकता”
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“अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि ज्यादा बोलना अच्छा नहीं है और ना ही ज्यादा चुप रहना भी अच्छा है जैसे ज्यादा बारिश अच्छी नहीं होती लेकिन बहुत ज्यादा धूप भी अच्छी नहीं है।”
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अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि ज्यादा बोलना अच्छा नहीं है और ना ही ज्यादा चुप रहना भी अच्छा है जैसे ज्यादा बारिश अच्छी नहीं होती लेकिन बहुत ज्यादा धूप भी अच्छी नहीं है।”
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