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नरेंद्र कोहली, Narendra Kohli नरेंद्र कोहली, Narendra Kohli > Quotes

 

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“प्रकृति के निर्माण की समकक्षता मनुष्य नहीं कर सकता। मनुष्य तो प्रकृति का अनुकरण करता है।”
Narendra Kohli, हिडिम्बा
“उसे नीति और न्याय का परामर्श दूँगा। न्याय, धर्म का दूसरा नाम है माता! वह न्याय की रक्षा करेगा, तो न्याय उसकी रक्षा कर लेगा।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“आवेश से बचो वत्स! हम विचार कर रहे हैं; और विचार के लिए आवेश हलाहल विष है।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“मोह मानसिक रोग है पुत्र! आत्मा का कलुष! यदि वह मात्र साधारण भ्रम है तो प्रबोधन से ही मिट जायेगा; किन्तु यदि वह अत्यन्त सघन है, तो मोह की सघनता के अनुपात में ही पीड़ा अथवा दण्ड पा कर ही वह छूटे तो छूटे; उनकी आकांक्षापूर्ति से तुम उनका मोह नष्ट नहीं कर सकते। यदि उनकी इच्छापूर्ति होती रहेगी, तो उनका लोभ बढ़ेगा, मोह सघन होगा,”
Narendra Kohli, हिडिम्बा
“जिस राजसभा में ऋषि का सम्मान नहीं होता, वहाँ न धर्म होता है न न्याय!”
Narendra Kohli, हिडिम्बा
“जब दृष्टि में सिद्धान्त नहीं, व्यक्ति होता है, तो निर्णय न्याय के आधार पर नहीं, व्यक्ति की इच्छा के आधार पर होते हैं।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“हमारे भीतर के गुण ही बाह्य सृष्टि में से अपने समतुल्य गुणों को आकृष्ट करते हैं। यदि हम अपने भीतर से रजोगुण तथा तमोगुण सर्वथा समाप्त कर दें, तो बाह्य सृष्टि के ये गुण हमारी ओर आकृष्ट नहीं होते, न हम पर प्रभाव डालने की बात सोचते”
Narendra Kohli, हिडिम्बा
“जिसका निर्णय न्याय है, वचन विधान है और चिन्तन त्रिकाल का सत्य है—उस व्यक्ति को ग्वाला कहकर उसकी उपेक्षा का प्रयत्न सचमुच क्षुद्रता का प्रदर्शन है।”
Narendra Kohli, अभिज्ञान
“आश्रम में तुम्हें धर्म भी मिल सकता है और न्याय-बोध भी; किन्तु न्याय तो राजसभा में ही मिल पायेगा। न्याय के साथ दण्ड-विधान भी जुड़ा है। न्याय के लिए दुष्ट-दलन करना पड़ता है, धर्म के लिए आत्म-दमन! न्याय माँगा जाता है, धर्म साधा जाता है। न्याय में अधिकार है, धर्म में दायित्व। धर्म ऋषि देता है और न्याय राजा!”
Narendra Kohli, हिडिम्बा
“मुनि बोले, “अपनी वर्तमान बुद्धि को सृष्टि का अन्तिम सत्य मत मानो। उसका विकास और संस्कार करने का प्रयत्न करो। जो सत्य दूसरों द्वारा अनुभूत है, उसके अनुभव का प्रयत्न करो। अपनी बुद्धि को इन्द्रियों का दास मत बनने दो। तब तुम देखोगे कि वस्तुतः तुम्हें उतनी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है, जितनी तुमने एकत्रित कर ली हैं। यह तुम्हारी आवश्यकता नहीं है, जो तुम्हें अर्जन और संचय के लिए प्रेरित करती है—यह तुम्हारा मोह है। यदि इस मोह को तुम पहचान पाओगे, तो उसे त्याग भी पाओगे। मोह से मुक्त होते ही तुम अनुभव करोगे कि जीवन मात्रा, धन के अर्जन के लिए नहीं है। आवश्यकता भर धन अर्जित करना सबके लिए अनिवार्य हो सकता है; किन्तु उसकी एक सीमा है। वहाँ पहुँच कर व्यक्ति यह निर्णय करता है कि अब वह अतिरिक्त धन अर्जित करने के लिए कोई भी कार्य नहीं करेगा।”
Narendra Kohli, हिडिम्बा
“मेरी दो बातें स्मरण रखो पुत्र! और उनपर विश्वास भी करो। पहली यह कि ईश्वरीय नियमों का जब तक स्वयं अनुभव न करो, दूसरे व्यक्ति के कहने मात्र से उसका विश्वास मत करो। दूसरी यह कि, यदि तुम वस्तुतः जल में स्थित हो, तब ही तैरने के लिए हाथ-पैर मारो।”
Narendra Kohli, हिडिम्बा
“संन्यासियों की त्याग-वृत्ति इस सृष्टि के क्रम को चलाये नहीं रख सकती। क्षात्र-धर्म तो समाज के पालन में है, अन्याय के प्रतिकार में है,”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“पुष्प भी कहीं अपना शृंगार करते हैं?”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“अपनी निजता की परिधि व्यापक करो राजन्! प्रत्येक असमर्थ की समर्थ होने में सहायता करो; और उसे समर्थ होते देख कर, प्रसन्नता पाओ। तुम देखोगे जीवन कितना आन्नददायक है।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“नारी-पुरुष के उन्मुक्त सम्बन्धों की पीड़ा, यातना और अव्यवस्था को देख कर ही तो मानव-समाज ने विवाह की परिकल्पना की होगी...”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“कृष्ण ने उन्हें सदा भाभी ही कहा। उन्हें देखते ही कृष्ण के मन में प्रसन्नता का जैसे कोई उत्स फूट पड़ता; और प्रसन्नता ऊर्जा बन जाती। रूपा भाभी को देखते ही कृष्ण इतने वाचाल और चंचल हो उठते थे कि उन्हें भय होता कि कहीं कोई अटपटी बात न कह डालें। पर वे अपनी उस ऊर्जा का क्या करते। मन होता, बांसुरी में कोई आह्वादक राग छेड़ दें, या फिर जोर से नाचने लगें। रूपा भाभी एक बार मुस्कराकर उनसे कोई बात कर लेतीं तो वे धन्य हो जाते और यदि वह अपना कोई काम कह देतीं तो कृष्ण कृतकृत्य हो जाते। उन्हें लगता कि उनके जीवन का वह एक दिन सार्थक हो गया है… तब”
Narendra Kohli, अभिज्ञान
“जल के भीतर की थाह तो निषाद-स्त्रियाँ ही पा सकती हैं। वे नाव में बैठी हुईं जल की ऊपरी थिरकन को देख कर बता सकती हैं कि उसके भीतर कौन-सी मछलियाँ हैं और कितनी संख्या में हैं।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“विद्वानों ने केवल विद्या पायी है, चरित्र नहीं पाया;”
Narendra Kohli, अभिज्ञान
“मन में पहले चिन्ता जागी, चिन्ता ने क्षोभ को जन्म दिया। उनके धैर्य ने बलात क्षोभ को दबाया तो असहायता उपजी और असहायता से विरक्ति ने जन्म लिया।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“गान्धारी ‘द्वेष’ के रोग से ग्रस्त है। और यह रोग संक्रमणशील है। यह माता से पुत्र को मिलेगा। द्वेष, द्वेष को जन्म देगा और अन्ततः नाश होगा, महानाश!”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“तुमने मुझे गर्भ में रखा। जन्म दिया। और फिर पालन-पोषण और विद्याभ्यास के लिए पिता को सौंप दिया। इससे अधिक प्रेम, मोह का दूसरा नाम है। वंचना का प्रश्न ही कहाँ है।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“वह मेरी कामना थी, याचना नहीं।” “इसमें याचना की कोई आवश्यकता नहीं थी पिता जी!” भीष्म कुछ संकुचित हुए, “पिता की कामना-भर जानना ही पुत्र के लिए पर्याप्त होता है।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“ब्रह्म मुहूर्त में नदी पार करने को उत्सुक तो कोई तपोभ्रष्ट योगी ही होगा।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“यदि साम्राज्य चिन्ताओं का घर है तो मनुष्य को चाहिए कि वह उसे त्याज्य माने...”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“द्वैपायन का ज्ञान तो किसी को दासी-पुत्र नहीं मानता। वह न किसी को दासी मानता है, न स्वामिनी। प्रकृति ने तो किसी को दास अथवा स्वामी नहीं बनाया। यह सामाजिक विधान है। और कोई सामाजिक विधान, किसी संन्यासी तपस्वी के चिन्तन का नियन्त्रण नहीं करता। सन्यासी ने समाज का त्याग कर दिया है।...”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“तपस्या और साधना में भेद है। तुम्हें शायद साधना की आवश्यकता है। तुम तपने नहीं सधने आये हो। साधनरिक्त होने नहीं, साधन-सम्पन्न बनने आये हो। साधना के लिए मन की एकाग्रता चाहिए। वैविध्यपूर्ण संसार से अपना मन समेट कर, किसी एक बिन्दु, इच्छा अथवा मार्ग पर केन्द्रित करना पड़ता है। एक अपने लक्ष्य को छोड़ कर, शेष सब कुछ त्यागना पड़ता है, सबका मोह छोड़ना पड़ता है। किन्तु इस त्याग के कारण, उस व्यक्ति को विरक्त नहीं, समुचित अनुरक्त मानना चाहिए।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“जिन राज्यों की सीमाएँ मिलती हैं, उनमें सौहार्द के स्थान पर, प्रतिस्पर्धा ही अधिक होती है।” भीष्म ने एक नीति-वाक्य में सारी स्थिति स्पष्ट कर दी।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“उसके अनुकूल बनो, उसकी शरण में जाओ। उससे प्रार्थना करो कि उसने जो क्षमता तुम्हें नहीं दी, उसकी कामना से भी तुम्हें मुक्त करे। यदि तुम ‘काम’ को जीत लोगे वत्स! तो आत्मजयी हो जाओगे। सम्भव है कि, जिसे तुम प्रकृति की वंचना समझते हो, वह तुम्हारे लिए प्रकृति का वरदान सिद्ध हो।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १
“प्रकृति को समझने का प्रयत्न, मनुष्य की स्थिति की खोज, सृष्टि के गुह्यतम भेदों से साक्षात्कार—सुदामा क्या हैं, कहां से आये हैं, कहां जायेंगे? जन्म से पहले भी क्या जीव की कोई स्थिति होती है? मृत्यु के पश्चात् वह कहां जाता है? इस सृष्टि का स्रष्टा कोई है क्या? यदि है, तो उसका स्वरूप क्या है? और यदि नहीं है, तो कौन चलाता है इसे? कौन बनाता है?...इन सब के बीच सोना-चांदी और हाथी-घोड़े का क्या काम?...”
Narendra Kohli, अभिज्ञान
“जीवन न यम-फाँस है, न काम-पाश! मेरे मन में न स्त्री की कामना है, न सम्पत्ति की, न अधिकार की।”
Narendra Kohli, बंधन : महासमर भाग - १

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