Dandi
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“उसी समय राजवाहन के पाँवों की चाँदी की बेड़ी खुल गई और चन्द्रलेखा की छवि जैसी अप्सरा बनकर वह बेड़ी प्रदक्षिणा करके राजवाहन से हाथ जोड़कर बोली : ‘देव! मुझपर दया करें। मैं चन्द्रकिरण से उत्पन्न सुरतमंजरी नामक सुरसुन्दरी हूँ। एक बार मैं आकाश में उड़ रही थी कि एक कलहंस ने मेरे मुख को कमल के भ्रम में आकर ढंक लिया। जिससे मैं घबरा गई और उसे हटाते समय अनजाने ही मेरे गले का हार गिर गया, जो हिमवान् पर्वत के एक सरोवर में डुबकी लगा-लगाकर स्नान करते महर्षि मार्कण्डेय के सिर पर जा गिरा। उनके सफेद बाल मणि-किरणों से और भी श्वेत दीख पड़ने लगे।”
― Dashkumarcharit
― Dashkumarcharit
“राग दशा से ऋषि कटकर रह गया; बोलाः प्रिये! यह क्या? यह उदासीनता क्यों? मुझपर तो तुम्हारा असाधारण प्रेम था। वह कहाँ गया? “काममंजरी ने मुस्कराकर कहा : भगवन्! जिस स्त्री ने राजकुल में आज मुझसे हार मानी है, उससे मेरा एक बार झगड़ा हो गया था। उसने मुझे ताना मारकर कहा : अरी! तू तो ऐसी हेकड़ी जताती है जैसे तूने मारीचि को ही जीत लिया हो! तब दासी होने की शर्त रखी गई और मैंने इस काम का बीड़ा उठाया। आपकी दया से काम सिद्ध हो गया। “इस अपमान से मूर्ख मारीचि बहुत दुःखी हुआ।”
― Dashkumarcharit
― Dashkumarcharit
“उसने कहा कि महाकाल निवासी महादेव की आराधना करो। तभी मैं पत्नी को लेकर आया हूँ। भक्त-वत्सल गौरीपति की करुणा से आपके चरणारविन्दों के दर्शन मुझे प्राप्त हो गए।”
― Dashkumarcharit
― Dashkumarcharit
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