विकास’s
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Indrani wrote: "मैं भी सोमबार से शुरू कर सकती हूँ। मैं इस वक़्त सिर्फ 1Q84 पढ़ रही हूँ. वह तब तक ख़तम हो जानी चाहिए।"बढ़िया। सोमवार से ही शुरू करते हैं। उम्मीद है गोरब भाई भी तैयार होंगे।
Indrani wrote: "कब से शुरू करना ठीक रहेगा ?"मैं आने वाले सोमवार से शुरू कर सकता हूँ। तब तक जो पढ़ रहा हूँ खत्म कर दूँगा। बाकी लोग निर्धारित करे तो उस हिसाब से ही काम हो? आप कब से पढना शुरू कर सकती हैं?
Gorab wrote: "i know both of you have dozakhnama in your tbr... just thinking whether we three can buddy read it this month? thoughts??"चलिये मैं भी तैयार हूँ. लेट्स डू इट.
Sandeep wrote: "दिव्य प्रकाश दुबे की 'मुसाफ़िर कैफ़े' ट्राई कर सकते हैं. वैसे मैंने नहीं पढ़ी है, मगर तारीफ़ काफी सुनी है."खरीद के मैंने रख तो ली है लेकिन पढने का विचार अभी नहीं है.
Gorab wrote: "Have acquired loads of Hindi books. Do ping me if you're interested to read any of it :)Vaishali ki Nagarvadhu: Sampoorn Sanskaran
Chaudhah Phere
[book:Meri Teri U..."
लेट्स डू दोज़खनामा इन नवम्बर.
Gorab wrote: "There's a bollywood film called Antardwand.... the main theme is groom kidnapping. And its based on true story(ies)!"yep, one of the side effects of Dowry.
Gorab wrote: "Thanks for your age and work related comments Indrani. Didn't know giving out wrong ages is still prevalent in arranged marriage. A friend from Punjab shared a really funny (and tragic actually) i..."
Yeah, this used to happen a lot. I have heard that in some parts of bihar people kidnap the guy and then get him married to their daughter.
Gorab wrote: "Along with Khasak, I can suggest a few more BR's Dozakhnama - Indrani has the Bengali edition and I have Hindi.
Rehan per Raggu - Vikas and me had planned to read this Hindi book, but never conclu..."
I have read Chokher Bali but had read the english edition.
Have got the rest.
Indrani wrote: "Shall we think about The Legends of Khasak"I have this book with me so i'm okay with it.
Indrani wrote: "विकास wrote: "Indrani wrote: "Gorab wrote: "महिम बाबू पर अब तक ज्यादा ध्यान नहीं गया है.केवल विनय से उनकी बेटी के विवाह की चर्चा में ही उन्हें देखा है."
महिमबाबु को movies की भाषा में बोले तो ज़्य..."
Sure we can do another BR. Should it be in hindi or it could be in english too?
Indrani wrote: "Gorab wrote: "महिम बाबू पर अब तक ज्यादा ध्यान नहीं गया है.केवल विनय से उनकी बेटी के विवाह की चर्चा में ही उन्हें देखा है."
महिमबाबु को movies की भाषा में बोले तो ज़्यादा screen space नहीं मिला। पर..."
बिल्कुल हारान बाबू की तो माहिमा अपरम्पार हैं। उनमे आत्म मुग्धता प्रचुर मात्रा में है। इसलिए उन्हें लगता है कि सारा समाज उन्ही के चारो ओर घूमता है और इसलिए जब सुचरिता गोरमोहन की तरफ आकर्षित होने लगती है तो उन्हें बुरा इस बात का लगता है कि उन्हें छोड़कर वो ये काम कैसे कर सकती है।
लेकिन उनसे ज्यादा चिढ मुझे हरिमोहिनी से होती है। सुचरिता उनकी इज्जत करती है तो उनके सामने चुप रहती है। लेकिन वो तो अपने विचार उसके ऊपर थोपती ही जा रही हैं।
खैर, आगे बातें दिलचस्प हो रही हैं।
मेरे संस्करण (एडिशन) में 404 पृष्ठ हैं। मैं 364 वें पृष्ठों पर हूँ। अभी तक मेरी राय में भले ही उपन्यास का नाम गोरा हो लेकिन मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित परेश बाबू के चरित्र ने किया है। मैं उनकी तरह ही बनना चाहूँगा। गोरा हठी है लेकिन अब उसका मन भी सुचरिता के संपर्क में आने से बदल रहा है। लेकिन अभी भी उसकी कट्टरपंथी कम नहीं हुई है। आनंदमयी ने भी प्रभावित किया है लेकिन उन्होंने सारी रूढ़ियाँ गोरमोहन के मोह में छोड़ी थी इसलिए वो प्रभाव कम पड़ा। लेकिन उनका सहज बोध (intuition) कभी कभी आश्चर्य चकित कर देता है। जिन लोगों से उन्हें स्नेह है उनके मन के भाव वो कितनी आसानी से जान जाती हैं सचुमुच मुझे हतप्रभ कर देता है। आगे देखते हैं क्या होगा?
30 वें अध्याय पे पहुँच चुका हूँ। गोरा को पहली बार जात पात पे संदेह हुआ है। अब देखना है उसमें कैसे बदलाव आयेंगे। आप लोग कहाँ तक पहुँच चुके है। हाँ, आनन्दमयी विनय को गोरा से अधिक जानती हैं और समझती हैं। जिस तरह से उन्होंने विनय के मन की बात समझी वो आश्चर्यजनक है। पढ़कर अच्छा लगा।
@gorab बिलकुल विनय केवल गोरा की बात को दोहरा रहा है इसलिए जवाब उसने घुमाने वाले ही दिए। वो खुद इतना कट्टरपंथी नहीं है लेकिन वो गोरा को बहुत मानता है इसलिए उसकी बात को गलत नहीं ठहरा सकता है। और सुचरिता के सामने तो बिलकुल नहीं। ब्रो कोड यही डिक्टेट करता है। ;-) :-p जोक्स अपार्ट इस चौथे अध्याय से लिए अंश से ये बात स्पष्ट हो जाती है:
सिद्धांत के रूप में कोई बात जैसे मानी जाती है, मनुष्यों पर प्रयोग करते उसे सदैव उसी निश्चित भाव से नहीं माना जा सकता। कम-से-कम विनय जैसे लोगों के लिए यह संभव नहीं है। विनय की ह्रदय वृति बहुत प्रबल है। इसलिए बहस के समय मनुष्य को सिद्धांत से ऊपर माने बिना नहीं रह सकता। यहाँ। तक गोरा द्वारा प्रचारित जो भी सिद्धान्त उसने स्वीकार किए हैं, उनमे से कितने स्वयं सिद्धान्त के कारण और कितने गोरा की प्रति अपने एकांत स्नेह के दबाव से, यह कहना कठिन है।
अब जो व्यक्ति किसी के सिद्धान्त भी उससे प्रेम होने के कारण अपना सकता है। वो उस व्यक्ति को गलत साबित नहीं होने देगा और उसका समर्थन करेगा भले ही उसे खुद लग रहा हो कि वो व्यक्ति गलत है।
Gorab wrote: "काफी अच्छा विवरण लिखा है आपने कॉलेज का।आप कह रहे हो ज्यादा विकास नहीं था? आप अकेले ही थे क्या!
... sorry for the PJ. Just kidding :P
[हिंदी में बोले तो - ग़रीब चुटकुले के लिए माफ़ी। केवल बचपना था :..."
नहीं विकास तो बहुत थे ..... एक क्लास में दो तीन विकास थे .. :-D
Indrani wrote: "I find this one interesting - An unsuitable job for a woman by P D James - want to read to just be able to say that the writer is wrong. :) :)Ajeeb ladki is sounding normal. :) :)"
i was intrigued by the book cover.
Apart from that i'm interested in contemporary hindi literature (especially literature written by woman writers) so i keep picking the short story collections.
के विषय में भी बहुत अच्छी बातें सुनी हैं मैंने
Indrani wrote: "I find this one interesting - An unsuitable job for a woman by P D James - want to read to just be able to say that the writer is wrong. :) :)Ajeeb ladki is sounding normal. :) :)"
P D James has written two novels with Cordelia Gray as the protagonist. She's the detective. I have read the second one - The skull beneath the sea. This is the first one and her first case. Hence, the title.
सुचरिता गोरा की तरफ आकर्षित है। लेकिन ललिता विनय को गोरा की छाया से उभारना चाहती है।क्या वो कामयाब हो पाएगी? देखना होगा। मैं अब उन्नीसवाँ अध्याय शुरू करूँगा।
Indrani wrote: "Gorab wrote: "मैं भी 19 वें अध्याय पर हूँआज सुबह सुबह थोडा पढ़ा और मजा आ गया
इस उपन्यास में कहानी (प्लाट) उतना मूल नहीं है जितना की किरदारों की सोच
१०० वर्ष पहले लिखा हुआ है और अब तक एकदम सटीक
आज ..."
जी लेखक का काम यही होता है कि वो बिना सेंसर किए अपने समाज की स्थिति को दिखलाए। इसीलिये मैं हमेशा सेंसरशिप के खिलाफ रहा हूँ। अक्सर समाज में ज्यादा कुछ बदलता नहीं है।हाँ, पहनावा बदल जायेगा, बात चीत करने का जरिया बदल जाएगा लेकिन मूल रूप से समाज अभी भी वैसा ही है।इसलिए जब हम पुराने लेखको को पढ़ते हैं तो वो बातें हमारे वक्त भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं जितनी उस वक्त रही होंगी।
इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने आर के नारायण साहब को पढ़ना शुरू किया। उस वक्त मैं कॉलेज में था और देहरादून के एक गाँव में रहता था। इधर उत्तर भारत में ज्यादातर कॉलेज गाँव के पास ही होंगे। कॉलेज नया खुला था इसलिए उधर ज्यादा विकास नहीं हुआ था।(कॉलेज खुलने के एक साल बाद ही वो गाँव से क़स्बा बनने लगा था।और अब तो काफी कुछ बदल गया उधर।) उस वक्त नारायण साहब के मालगुडी और उस गाँव में ज्यादा फर्क नहीं लगा मुझे। बच्चे साइकिल के टायर से खेलते थे, बुजुर्ग लोग पेड़ के नीचे चबूतरे पे बैठकर गप्पे लगाते थे और हम जैसे छात्र चाय की दुकान पे बैठकर पढ़ाई छोड़कर पॉलिटिक्स से लेकर फिल्मे और क्रिकेट के ऊपर बातचीत करते थे।
उस समय बहुत आसान तरीके से साहित्य का महत्व समझ में आ गया। और ये भी ऊपरी तौर से चाहे लोग जितने जुदा हों उनका कोर एक जैसा ही है। फिर चाहे वो लोग किसी भी वक्त में रहे हो।
