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“समाज जीवित रहेगा तभी में जीवित रहूँगा, यह कल्पना ही हमारे मनमे नहीं आती. अपना घर भला और अपन भले, ऐसी हमारी वृति बन गयी है, और ऐसे संकुचित मनके स्वार्थी व्यक्ति को आदर्श कहकर प्रसंशा होती रहती है. ऐसा यह व्यक्ति का विचार पूर्ण रूप से पौछ दो. राष्ट्र और समाज इनके साथ जो एकरूप हो जाता है, वह सच्चा देशसेवक है. अपन अपने बच्चो का पालन पोषण करते है, इन्हे पढते है, परन्तु अपन कभी ऐसा नहीं कहते कि मैंने अपने बच्चो के लिए स्वार्थ त्याग किया, कोई इस प्रकार कहे तो हम उसे स्वीकार करेंगे क्या? इसी प्रकार से राष्ट्र के लिए समाज के लिए कुछ करना यह अपना कर्त्तव्य है, इसमें स्वार्थत्याग कैसा? यह भावना मनमे दृढ होगी ऐसा करें”

करंदीकर डॉ. वि. रा.
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