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Munshi Premchand

“वकील—लेकर रख लो, पास रहेगी तो कभी पहन भी लोगी। नहीं तो कभी दूसरों को पहने देख लिया तो कहोगी, मेरे पास होता तो मैं भी पहनती। वकील साहब को रतन से पति का सा प्रेम नहीं, पिता का सा स्नेह था, जैसे कोई स्नेही पिता मेले में लड़कों से पूछ-पूछकर खिलौने लेता है, वह भी रतन से पूछ-पूछकर खिलौने लेते थे। उसके कहने भर की देर थी। उनके पास उसे प्रसन्न करने के लिए धन के सिवा और चीज ही क्या थी। उन्हें अपने जीवन में एक आधार की जरूरत थी—सदेह आधार की, जिसके सहारे वह इस जीर्ण दशा में भी जीवन-संग्राम में खड़े रह सकें, जैसे किसी उपासक को प्रतिमा की जरूरत होती है। बिना प्रतिमा के वह किस पर फल चढ़ाए, किसे गंगा-जल से नहलाए, किसे स्वादिष्ट चीजों का भोग लगाए। इसी भाँति वकील साहब को भी पत्नी की जरूरत थी।”

Munshi Premchand, Gaban (Hindi)
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Gaban (Hindi) (Hindi Edition) Gaban (Hindi) by Munshi Premchand
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