“मनुष्य ही ऐसा जीव है जो अपने पिंजरे स्वयं बनाता है. जब मनुष्य की प्रवित्ति सीमाओं और बन्धनों को तोड़ कर जीने की है, जब उसकी अभिलाषा सृष्टि की ही भांति असीम और अपार हो जाने की है तो फिर ये सीमायें क्यों? क्या मनुष्य अपनी ही प्रवित्तियों से डरता है? अपनी ही अभिलाषाओं से घबराता है? शायद यही सच है.”
―
Sandeep Nayyar,
Samarsiddha