MEHUL

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Ramdhari Singh 'Dinkar'
“जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुङ्कार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- “ज़ंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ-हाँ, दुर्योधन! बाँध मुझे। “यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झङ्कार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', रश्मिरथी

Ramdhari Singh 'Dinkar'
“अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख, मुट्‍ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', रश्मिरथी

Ramdhari Singh 'Dinkar'
“है ऋणी कर्ण का रोम-रोम, जानते सत्य यह सूर्य-सोम, तन, मन, धन दुर्योधन का है, यह जीवन दुर्योधन का है। सुरपुर से भी मुख मोड़ूँगा, केशव! मैं उसे न छोड़ूँगा। “सच है, मेरी है आस उसे, मुझपर अटूट विश्वास उसे, हाँ, सच है मेरे ही बल पर, ठाना है उसने महासमर।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', रश्मिरथी

Ramdhari Singh 'Dinkar'
“कसक भोगता हुआ विप्र निश्चल कैसे रह सकता है? इस प्रकार की चुभन, वेदना क्षत्रिय ही सह सकता है।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', रश्मिरथी

Ramdhari Singh 'Dinkar'
“धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान, जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', रश्मिरथी

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