“मैं काका की सलाह मानकर फजीहत में पड़ गया । एक दिन वे कहने लगे, "आयुष्मान, कोई लेबिल अपने ऊपर चिपका लो, वरना किसी दिन जेल चले जाओगे । तुम्हें बेकार घूमते देखकर किसी दिन कोई पुलिसवाला पूछेगा—क्या नाम है तेरा ? बाप का नाम क्या है? कहाँ नौकरी करता है? तुम अपना और बाप का नाम तो बता दोगे, पर तीसरे सवाल के जवाब में कहोगे—नौकरी कहीं नहीं करता । यह सुनकर पुलिसवाला कहेगा-नौकरी नहीं करता? तब कोई चोर-उचक्का है तू । वह तुम्हें पकड़कर ले जाएगा । इस देश में जो किसी की नौकरी नहीं करता, वह चोरसमझा जाता है । गुलामी के सिवा शराफत की कोई पहचान हम जानते ही नहीं हैं ।”
― निठल्ले की डायरी
― निठल्ले की डायरी
“आम भारतीय जो गरीबी में, गरीबी की रेखा पर, गरीबी की रेखा के नीचे हैं, वह इसलिए जी रहा है कि उसे विभिन्न रंगों की सरकारों के वादों पर भरोसा नहीं है। भरोसा हो जाये तो वह खुशी से मर जाये। यह आदमी अविश्वास, निराशा और साथ ही जिजीविषा खाकर जीता है।”
― आवारा भीड़ के खतरे [Awara Bheed Ke Khatare]
― आवारा भीड़ के खतरे [Awara Bheed Ke Khatare]
“जगन्नाथ काका के साथ मैं एक बारात से लौट रहा था । एक डिब्बे पर बारातियों ने कब्जा कर लिया था । काका ने मुझसे कहा, "अगर अपना भला चाहते हो, तो दूसरे डिब्बे में बैठो । बाराती से ज्यादा बर्बर जानवर कोई नहीं होता । ऐसे जानवरों से हमेशा दूर रहना चाहिए । लौटती बारात बहुत खतरनाक होती है । उसकी दाढ़ में लड़कीवाले का खून लग जाता है और वह रास्ते में जिस-तिस पर झपटती है । कहीं झगड़ा हो गया, तो हम दोनों भी उनके साथ पिटेंगे ।”
― निठल्ले की डायरी
― निठल्ले की डायरी
“विज्ञान ने बहुत से भय भी दूर कर दिये हैं, हालाँकि नये भय भी पैदा कर दिये हैं। विज्ञान तटस्थ (न्यूट्रल) होता है। उसके सवालों का, चुनौतियों का जवाब देना होगा। मगर विज्ञान का उपयोग जो करते हैं, उनमें वह गुण होना चाहिए, जिसे धर्म देता है। वह गुण है - 'अध्यात्म' - अन्ततः मानवतावाद, वरना विज्ञान विनाशकारी भी हो जाता है।”
― आवारा भीड़ के खतरे [Awara Bheed Ke Khatare]
― आवारा भीड़ के खतरे [Awara Bheed Ke Khatare]
“दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है। इसका उपयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।”
― आवारा भीड़ के खतरे [Awara Bheed Ke Khatare]
― आवारा भीड़ के खतरे [Awara Bheed Ke Khatare]
Trishna’s 2025 Year in Books
Take a look at Trishna’s Year in Books, including some fun facts about their reading.
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