Vaibhav Gupta

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“चिडि़या को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहाँ हवा में उन्हें
अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी।
यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहाँ कटोरी में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहाँ चुग्गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहाँ निर्द्वंद्व कंठ-स्वर है।
फिर भी चिडि़या
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूँ ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।”
Sarveshwar Dayal Saxena, प्रतिनिधि कविताएँ

Walt Whitman
“Nothing is ever really lost, or can be lost...
...Ample are time and space—ample the fields of Nature.
The body, sluggish, aged, cold—the embers left from earlier fires,
The light in the eye grown dim, shall duly flame again;”
Walt Whitman, Leaves of Grass

Walt Whitman
“You have not known what you are—you have slumber’d upon yourself all your life;
Your eye-lids have been the same as closed most of the time;
What you have done returns already in mockeries;
The mockeries are not you;
Underneath them, and within them, I see you lurk;”
Walt Whitman, Leaves of Grass

Rajesh Joshi
“जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे
मारे जाएंगे
कटघरे में खड़े कर दिए जाएंगे, जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएंगे
बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज़ हो
उनकी कमीज़ से ज्‍यादा सफ़ेद
कमीज़ पर जिनके दाग़ नहीं होंगे, मारे जाएंगे
धकेल दिए जाएंगे कला की दुनिया से बाहर, जो चारण नहीं
जो गुन नहीं गाएंगे, मारे जाएंगे
धर्म की ध्‍वजा जो नहीं उठाए जो नहीं जाएंगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगी उन्‍हें, काफिर करार दिए जाएंगे
सबसे बड़ा अपराध है इस समय
निहत्‍थे और निरपराध होना
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे”
Rajesh Joshi, प्रतिनिधि कविताएँ

“चाँदनी की पाँच परतें,
हर परत अज्ञात है ।

एक जल में,
एक थल में,
एक नीलाकाश में ।
एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती,
एक मेरे बन रहे विश्वास में ।
क्या कहूँ , कैसे कहूँ.....
कितनी जरा सी बात है ।
चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है ।

एक जो मैं आज हूँ ,
एक जो मैं हो न पाया,
एक जो मैं हो न पाऊँगा कभी भी,
एक जो होने नहीं दोगी मुझे तुम,
एक जिसकी है हमारे बीच यह अभिशप्त छाया ।
क्यों सहूँ ,कब तक सहूँ....
कितना कठिन आघात है ।

चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है ।”
Sarveshwar Dayal Saxena (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )

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