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“मेरी उम्मीद का सागर कुछ यूँ छूटा है......................................
कि हर ज़र्रे-ज़र्रे ने हमको लूटा है.............................................
कश्तियाँ सारी डूब गयी किनारों तक आते-आते........................
होसला जो कुछ भी बचा था तूफानों में, किनारों पर आकर टूटा है”
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कि हर ज़र्रे-ज़र्रे ने हमको लूटा है.............................................
कश्तियाँ सारी डूब गयी किनारों तक आते-आते........................
होसला जो कुछ भी बचा था तूफानों में, किनारों पर आकर टूटा है”
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