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Giriraj Kishore Giriraj Kishore > Quotes

 

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“नहीं हुजूर अब नौकरी नहीं करूँगा।” “तो क्या करोगे?” “मैं दर्जी का काम जानता हूँ। सोचता हूँ कपड़े सीने का काम शुरू कर दूँ। अपना हुक्का अपनी मरोड़, पिया तो पिया नहीं दिया छोड़।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“तानाशाह देशों के लिए ही नहीं होते, इन्सानों में उनके अपने लिए भी तानाशाह बैठे होते हैं। मैंने अपने विद्रोह को एक तानाशाह की तरह दबाया है।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“एक खुश्क हँसी हँसे और चुप्प हो गये। वातावरण भीगी रुई के ढेर की तरह वज़नी हो गया।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“मुसलमान बड़ों की इज्ज़त करने में कभी कोताही नहीं करता। अगर दस बार मुलाकात हो तो दस बार सलाम करता है।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“ज़बान का खाया भी याद रहता है और कहा भी!”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“तुम इस सामान को उन नदीदों को बँटवा देना जो माँगकर खाने की आदत के ग़ुलाम हैं, ग़रीबी जिन्हें काल कोठरी की तरह लगती है और जो उसका सामना करने से डरते हैं”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“जब हमने अपने लिए अलग एक मुल्क बाँट लिया तब हमारा क्या मुँह रह गया कि हम इस मुल्क पर भी अपना दखल रखें—क्या यह गैरईमानदारी नहीं होगी? कल तक हिन्दुस्तान हमें अपना इकलौता मुल्क लगता था—अब दो मुल्कों को अपना मुल्क कैसे कहें? ज़मीर की तरह आदमी का मुल्क भी एक ही होता है—”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“लगता था कि हमारा श्रेष्ठता का भाव और खानदानवाद उनके किसी भी कदम को स्वीकार नहीं करता। चाहे वह रिश्ता हो या जीवन-दर्शन। सोना”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“अगर चिट्ठी का ईज़ाद न हुआ होता तो मैं सोच नहीं सकता कि मेरा क्या होता? जो नहीं लिखना जानते उनका भी तो कुछ होता ही होगा। या तो वे मर जाते होंगे या मार देते होंगे। मरने-मारने का रोज़ जो यह सिलसिला जारी है”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“उस्तरा हाथ में लेकर आखिर कटने से कब तक बचा जा सकता है। बाल छिलते रहें और खाल बची रहे यह हमेशा नहीं होता...”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“तुम्हारा गिरेबाँ वैसे भी इतना तंग है कि तुम खुद उसके अन्दर नहीं झाँक सकते। इन्सान की इससे बड़ी बदक़िस्मती दूसरी नहीं होती कि उसका अपना गिरेबाँ उसके लिए अनजान रहे।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“मेरा बड़ा बीटा रघुबर है। मेरा ध्यान पूरा रखता है। पर ध्यान ध्यान होता है, लगाव लगाव। लगाव तो अब रहा ही नहीं। उसी तरह गायब हो गया जैसे आजकल के गोंद से चिपचिपाहट। हाँ, 'गम' ज़रूर चिपकता है।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
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“रोटी-बेटी पर किया गया अत्याचार कोई बर्दाश्त नहीं करता। कभी-न-कभी रुका हुआ पानी बहता है।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“किसी की अमानत तभी रखनी चाहिए जब ज़रूरत पड़ने पर अपने पास से लौटाने की ताकत हो।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“करो या मरो’ का जो रूप सामने आया था उससे अँग्रेज़ घबरा गये। उन्हें यह मालूम नहीं था कि गाँधी की अहिंसा का अर्थ यह भी है। अहिंसा भी उतनी उग्र हो सकती है कि अपनी मौत को सामने करके देश में इतनी प्रखर अराजकता का सूत्रपात कर दे।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“तुम्हें जल्दी-से-जल्दी ज़िन्दगी में सेटिल हो जाना चाहिए, आदर्शवाद में कुछ नहीं रखा। ये सब सवाल जो तुम्हें घेरे हैं इन्सान को आदर्शवादी और अव्यावहारिक बना देते हैं। तब आदर्श मूल्य था, अब मूर्खता है। अब देश को आदर्शवाद की ज़रूरत नहीं, सही अवसर की ज़रूरत है।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“उनकी हर हँसी से जगन को लगता था जैसे उसका अपना एक और मुखौटा झीर-झीर हो गया।”
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“पानी में भीगे रहने के कारण उसके हाथ और पैरों की उँगलियों में खारवे हो गये थे जिसकी वज़ह से वह रोज़ काम से निबटकर अपनी गली हुई उँगलियों में कत्था लगाया करता था। उसके हाथ-पैर लाल रहते थे, लगता था जैसे सड़ गये हों। लोगों के लिए घिन की वज़ह से खाना मुश्किल हो गया था।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“जैसे कैक्टस का पौधा कम जल पीता है, बड़े आदमी का बच्चा कम पढता है।”
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“मज़ाकिया आदमी थे। वे कहा करते थे कि रखैल होती है तो लगता है जैसे दावत में जा रहे हों। घरवाली चौके की तरह होती है। कोयले से लकीर खींची और बैठा दिया। वही पीढ़ा, वही थाल। रखैल के ज़ीने पर पाँव रखते ही पाँव अपने आप उठने लगते हैं। जैसे पंख निकल आये हों।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“जैसे ही खर्चे का दबाव बढ़ा वैसे ही ज़मीन निकाल दी। अब लगता है धरती की जितनी अवमानना ज़मींदारों ने की उतनी शायद लुटेरों ने भी न की हो। धरती न माँ थी और न आर्थिक साधन।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“लोग कहते थे कि यह काम वह औरत ही कर सकती है जो औरत होने की सीमाएँ लाँघ जाये। या तो सती या फिर तवायफ़।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“मरता हुआ बूढ़ा और बढ़ता हुआ बच्चा हमेशा अपनों का सहारा खोजता है।”
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“अरे नहीं साहब, बहुत हो चुकी चोचलेबाज़ी! अब जब ज़मीन नज़र आने लगी तो ज़मीन पर ही चलने दीजिए।”
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“आपने तो देखा है वहाँ मैं लड़की की तरह रहती थी। यहाँ बहू क्या हुई, पिंजरे की मैना हो गयी। जब आपकी आज़ादी आ जायेगी तो क्या हम औरतों के ये पिंजरे भी खुल जायेगे?” “आज़ादी”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“ज़मीन-जायदाद इस तरह अपने को अलटे-पलटे ना तो कैसे अपना ज़हर पचाये और कैसे दूसरे में उतारे।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“बकरी के लिए भोजन था पर सिंह के सामने बँधी थी।”
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“साईस से माफ़ी न माँगकर भी माफ़ी माँग रहे हैं। कभी-कभी इस तरह के लोग अपने आपको अपने अहंकार से इतना बाँध लेते हैं कि सच बात भी उसके नीचे दबी रह जाती है। हालाँकि तामझाम वही सब करते हैं। बस, उन्हें कहना न पड़े दूसरा समझ जाये।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“गाँधी क्या करे? वह बँटवारा टालना चाहता था। वह जानता था कि अगर देश नहीं बँटा तो रास्ता निकल आयेगा। पर रास्ता निकालने की थावस किसमें थी। गाँधी अकेला पड़ गया था। सब जल्दी में थे। गाँधी चाहता था कि पहले नीयत साफ़ कर लो। आजादी तो आ ही जायेगी। उनके लिए गाँधी का इस्तेमाल इतना ही था कि आजादी मिल जाये और वे सत्ता-आरूढ़ हो जायें। फिर गाँधी मरे या जिये। देश कटे या बटे।”
Giriraj Kishore, ढाई घर
“जिन लोगों में अपने बड़प्पन का अहसास गहरा होता है वे खुलकर हँस नहीं पाते। वेदना की रमक की तरह ही हँसी की रमक भी आती है और गायब हो जाती है।”
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