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Mahendra Mittal Mahendra Mittal > Quotes

 

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“उन्होंने इंद्रियों की चंचलता को दूर करने के लिए उसे भावना रूपी जल से प्रक्षालित किया”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“एक दिन वृंदा को ज्ञात हो गया कि उसके साथ विहार करने वाला पुरुष और कोई नहीं स्वयं श्रीहरि विष्णु हैं, जो कि उसके पति का रूप धारण करके उसे छल रहे हैं। यह सारी सच्चाई जानकर देवी वृंदा बहुत दुखी हुई। तब वह श्रीहरि विष्णु से बोली—तुमने एक पराई स्त्री का उसका पति बनकर उपभोग किया है। तुम्हें धिक्कार है। मैं किस प्रकार अपने पति का सामना कर सकती हूं?”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“प्रतिज्ञेश्वर, कपालेश्वर और कुमारेश्वर नामक ये तीन शिवलिंग विश्व विख्यात हैं और लोगों की आस्था और भक्ति का जीता-जागता उदाहरण हैं। ये शिवलिंग सिद्धिदायक हैं और सोलह महान ज्योर्तिलिंगों में सम्मिलित हैं।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“कार्तिकेय ने हाथ जोड़कर कृत्तिकाओं से नंदीश्वर के साथ जाने की आज्ञा मांगी।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“शिव के मन में विचार आया कि इस संसार के सभी प्राणी तो कर्मपाश में बंधे रहेंगे। सांसारिक मोह-माया में पड़कर भला वे मुझे किस प्रकार पा सकेंगे। ऐसा सोचकर त्रिलोकीनाथ कल्याणकारी भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से पांच कोस नगरी उतारकर ब्रह्माण्ड से अलग की। तत्पश्चात उसमें अपने अविमुक्ति ज्योतिर्लिंग की स्थापना कर दी। यही पंचकोसी, कल्याणदायिनी, ज्ञानदात्री एवं मोक्षदात्री नगरी काशी कहलाई।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“दोनों ज्योतिर्मय रूप धारण करके क्रौंच पर्वत पर सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गए। उसी दिन से वह पवित्र लिंग मल्लिकार्जुन नाम से जगप्रसद्धि हुआ। मल्लिका देवी पार्वती का नाम है तथा अर्जुन शब्द शिव का समानार्थी है। उसी दिन से मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में शिव-पार्वती का निवास माना जाता है।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“भगवान शिव का गोकर्ण नामक एक और तीर्थ है, जो कि उत्तर दिशा में स्थित है। यह महान ज्योतिर्लिंग संपूर्ण पापों का नाश करने वाला है। यह गोकर्ण क्षेत्र महा पवित्र है। इसी के पास एक सुंदर रमणीय महावन भी स्थित है। उसी महावन में चंद्रमौलि भगवान शिव वैद्यनाथ के रूप में स्थापित हैं, जो कि संसार के समस्त चराचर जीवों को सुख देने वाले, उनका कल्याण करने वाले तथा उनकी कामनाओं को पूरा करने वाले हैं। उनकी महिमा अद्‌भुत और अद्वितीय है। यहीं पर मिश्रर्षि नामक एक सुंदर मनोरम तीर्थ स्थल है। इसी स्थान पर महर्षि दधीचि द्वारा स्थापित दधीचेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग है।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“यह सारा जगत माया के अधीन है परंतु इस जगत की जननी मूल प्रकृति परम मनोहर महादेवी पार्वती इस माया के वशीभूत नहीं हैं। उन पर इस माया जाल का कोई असर नहीं पड़ता।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“मुनि विश्वामित्र ने उस अद्‌भुत बालक का नामकरण संस्कार किया और उसका नाम कार्तिकेय रखा। गुरु दक्षिणा के रूप में उसने मुनि को दिव्य ज्ञान प्रदान किया।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“हे ऐश्वर्यशाली! देवाधिदेव! सर्वेश्वर कल्याणकारी शिव-शंकर जब तक आप गणेश जी का पूजन नहीं करेंगे, तब तक त्रिपुरों का संहार नहीं कर पाएंगे।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“रूप धारण किए हुए विष्णुजी बोले कि पहले प्रतिज्ञा करो कि मैं जो मांगूंगा, तुम मुझे दोगे। इस प्रकार जब शंखचूड़ ने ब्राह्मण को उसकी इच्छित वस्तु देने का वचन दे दिया, तब विष्णुजी ने उससे उसका कवच मांग लिया।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“यहां पर तो ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां तपस्या की जा सके। तब भगवान शिव ने पांच कोस लंबे-चौड़े शुभ व सुंदर नगर की तुरंत रचना कर दी। वे दोनों त्रिलोकीनाथ भगवान शिव के चरणों का स्मरण करके वहां तपस्या करने लगे। उन्हें इस प्रकार तपस्या करते-करते बहुत समय बीत गया। उनकी कठिन तपस्या के कारण उनके शरीर से पसीने की बूंदें निकलीं। उन श्वेत जल की बूंदों को गिरता हुआ देखकर भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपना सिर हिलाया तभी उनके कान से एक मणि गिरी और वह स्थान मणिकर्णिका नाम से प्रसिद्ध हो गया।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“ब्राह्मण के रूप में ही दैत्यराज की पत्नी देवी तुलसी के पास गए। मायावी विष्णुजी देवताओं के कार्य को पूरा करने के लिए देवी तुलसी के साथ भक्तिपर्वूक विहार करने लगे।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“शुक्राचार्य ने भगवान विद्येश (शिव) का स्मरण कर अपनी विद्या का प्रयोग आरंभ किया। उस विद्या का प्रयोग करते ही युद्ध में मृत पड़े दैत्य अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर इस प्रकार उठ खड़े हुए मानो इतनी देर से सोए पड़े हों।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“समयानुसार वे छः ऋषि पत्नियां गर्भवती हो गईं।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“सर्वप्रथम ‘ऋग्वेद’ भगवान शिव का स्मरण करते हुए बोले—हे ब्रह्मन्! हे श्रीहरि! जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं तथा जिसके द्वारा सबकुछ प्रवृत्त होता है, जिन्हें इस संसार में परम तत्व कहा जाता है, वह एक भगवान शिव ही हैं। तब ‘यजुर्वेद’ बोले कि उन परमेश्वर भगवान शिव की कृपा से ही वेदों की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। उन्हीं भगवान शिवशंकर को संपूर्ण यज्ञों तथा योग में स्मरण किया जाता है। तत्पश्चात ‘सामवेद’ बोले कि जो समस्त संसार के लोगों को भरमाता है और जिसकी खोज में सदा ऋषि-मुनि लगे रहते हैं, जिनकी कांति से सारा विश्व प्रकाशमान होता है वह त्र्यंबक महादेव जी हैं। इस पर ‘अथर्व’ बोल उठे, भक्ति से साक्षात्कार कराने वाले तथा समस्त दुखों का नाश करने वाले एकमात्र देव भगवान शिव ही हैं।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“तब सब देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए पशु बन गए। तभी से सदाशिव ‘पशुपति’ नाम से जगत में विख्यात हुए।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“तुम्हारे मस्तक पर सिंदूरी रंग की आभा है, इसलिए तुम्हारा पूजन सदैव सिंदूर से किया जाएगा। जो भी सिद्धियों और अभीष्ट फलों को प्राप्त करने के लिए तुम्हारा पूजन सिंदूर से करेगा, उसके काम में आने वाली सभी बाधाएं और विघ्न दूर हो जाएंगे।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“देवताओं ने ब्राह्मी, नारायणी, ऐंद्री, वैश्वानरी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणी, वायवी, कौबेरी, यक्षेश्वरी और गारुड़ी देवी का रूप धारण किया हुआ था।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“पर्वत पर उन्होंने कई भागों में मानव अंगों को जन्म दिया, परंतु वह पर्वत उनके भार को सहन नहीं कर सका और उसने उन्हें गंगाजी में गिरा दिया। गंगाजी ने उन्हें जोड़ दिया पर वे उस बालक के तेज को सहन नहीं कर सकीं और उसे अपनी तरंगों में बहाकर सरकंडे के वन के निकट छोड़ दिया। वह तेजस्वी बालक मार्गशीर्ष में शुक्ल षष्ठी के दिन पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“अग्नि ने दुबारा प्रश्न किया कि भगवन् आपका तेज धारण करने की क्षमता तो किसी में भी नहीं है।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“आपका सुदामा नामक पार्षद इस समय दानव योनि में शंखचूड़ के रूप में सभी को दुख दे रहा है।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“बालक का देदीप्यमान मुख देखकर विश्वामित्र दंग रह गए। वह बालक दिव्य तेज से प्रकाशित हो रहा था।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“ज्योर्तिलिंग की स्थापना की। फिर शिवलिंग पर चंदन और यक्षकर्दम का लेप किया। राजचंपक, धतूर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदंब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, ढाक, सिंधुवार, बंधूकपुष्प, पुनांग, नागकेसर, केसर, नवमल्लिक, रक्तदला, कुंद मोतिया, मंदार, बिल्व पत्र, गूमा, मरुआ, वृक, गंठिवन, दौना, आम के पत्ते, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, नांदरुख, अगस्त्य, साल, देवदारू, कचनार, कुरबक और कुरंतक के फूलों और अनेक प्रकार के पल्लवों से भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना की।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“अलौकिक शक्ति द्वारा इस बात का ज्ञान हुआ कि शंखचूड़ की रक्षा करने वाला कवच और उसकी पतिव्रता स्त्री की शक्ति, अब उसके साथ नहीं रही, तो तुरंत ही उन्होंने अपना विजय नामक त्रिशूल उठा लिया”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“मैं रोज युद्ध में देवताओं के अनेक सैनिकों को मार गिराता हूं, फिर भी देवसेना किसी भी तरह कम नहीं हो रही है। मेरे द्वारा मारे गए सारे देवगण अगले दिन फिर से युद्ध करते हुए दिखते हैं। गुरुदेव! मृतों को जीवन देने वाली विद्या तो आपके पास है, फिर देवता कैसे जीवित हो जाते हैं?”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“भगवान शिव जब इस प्रकार से देवताओं को शंखचूड़ के वध का आश्वासन दे ही रहे थे, तभी उनसे मिलने के लिए राधा के साथ श्रीकृष्ण वहां पधारे। भगवान शिव को प्रणाम करके वे प्रभु की आज्ञा से उनके पास ही बैठ गए। श्रीकृष्ण और राधा ने महादेव जी की मन में बहुत स्तुति की। जब भगवान शिव ने उनसे उनके आने का कारण पूछा, तब श्रीकृष्ण बोले—हे कृपानिधान! दयानिधि! आप तो सबकुछ जानते हैं। आप ही इस जगत में सनाथ हैं। आप तो जानते ही हैं कि मैं और मेरी पत्नी दोनों ही शाप भोग रहे हैं। मेरा पार्षद सुदामा भी शाप के कारण दानव की योनि में अपना जीवन जी रहा है।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“इस पृथ्वी लोक में दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु सच्चिदानंद स्वरूप, निर्विकार एवं सनातन ब्रह्मरूप है। वह अद्वितीय परमात्मा ही सगुण रूप में शिव कहलाए और दो रूपों में प्रकट हुए। वे शिव ही पुरुष रूप में शिव एवं स्त्री रूप में शक्ति नाम से प्रसिद्ध हुए।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“उनके क्रोध से तत्काल ही एक पुरुष उत्पन्न हो गया, उसका नाम भैरव था। भगवान शिव ने उस पुरुष को आदेश देते हुए कहा—हे कालराज! तुम साक्षात काल के समान हो। इसलिए आज से तुम जगत में काल भैरव के नाम से विख्यात होगे। तुम ब्रह्मा पर शासन करो और उनके गर्व को नष्ट करो तथा इस संसार का पालन करो। आज से मैं तुम्हें काशीपुरी का आधिपत्य प्रदान करता हूं।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण
“अग्निदेव से कहा कि माघ महीने में जो भी स्त्री सबसे पहले प्रयाग में स्नान करे उसके शरीर में आप इस शक्ति को स्थित कर देना। माघ का महीना आने पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में सर्वप्रथम सप्तऋषियों की पत्नियां प्रयाग में स्नान करने पहुंचीं। स्नान करने के उपरांत जब उन्होंने अत्यधिक ठंड का अनुभव किया तो उनमें से छः स्त्रियां अग्नि के पास जाकर आग तापने लगीं। उसी समय उनके रोमों के द्वारा शिवजी की शक्ति के कण अग्नि से निकलकर उनके शरीर में पहुंच गए।”
Mahendra Mittal, शिव पुराण

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