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Badrinath Kapoor Badrinath Kapoor > Quotes

 

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“जब कोई असीम चेतना के अद्वैत में अपने को दृढ़ता से स्थिर कर लेता है तब वह अपने आप को शांति में स्थित समझता है। फिर भले ही वह चुपचाप बैठा ही रहे अथवा कोई काम ही क्यों न करता रहे।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“मैं बराबर इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता हूँ कि इस परिवर्तनशील संसार का ख्याल भी मेरे मन में न आए। न मुझमें जीने की ही कामना है और न मरने की ही। मैं जैसा हूँ वैसा ही रहना चाहता हूँ–लालसा के ज्वर से मुक्त। इस राज्य, सुखों और धन का मैं क्या करूँगा? ये सभी उस अहं के खेलने की वस्तुएँ हैं जो मुझमें है ही नहीं।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“शरीर भी जीव की धारणा का परावर्तन होता है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“अभ्यास के द्वारा अहं शांत हो जाता है। उसके बाद तुम अपनी चेतना में विश्राम कर सकती हो। ऐसी अवस्था में यह दृश्य-संसार लुप्त होता हुआ प्रतीत होगा। अभ्यास क्या है? उसी एक का चिंतन, उसी एक का कथन, औरों से उसी की चर्चा, उसी एक के प्रति पूर्ण समर्पण।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“संतोष, सत्संग, अनुसंधान और आत्मनियंत्रण–ये ऐसे चार उपाय हैं जो संसार सागर में डूबते हुए की रक्षा करने में निश्चित रूप से सफल होते हैं। संतोष इनमें से सर्वोत्तम उपाय है, सत्संग गंतव्य तक पहुँचानेवाला उत्तम साथी है। अनुसंधान अपने में सबसे बड़ा ज्ञान है और आत्मनियंत्रण है चरम सुख।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“संतोषः परमो लाभः सत्संगः परमा गतिः विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् (16/19)”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“ब्रह्म सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान ज्ञानराशि है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“उन्हें जो प्रसन्नता या आनंद मिलता है वह उन्हें अपने अंदर से ही प्राप्त होता है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“कितना ही शक्तिशाली व्यक्ति क्यों न हो वह बिना चले गंतव्य पर नहीं पहुँच सकता। बिना निरंतर अभ्यास के पूर्ण अनासक्ति प्राप्त नहीं होती।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“हलचल अभी न हुई हो, कुंभक उत्पन्न होता है और बिना किसी प्रयास के उत्पन्न होता है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“आत्मज्ञान से वासना नष्ट होती है और साथ ही मन भी। तभी प्राणों में ठहराव आता है। यही निश्चित रूप से परमशांति है। आत्मज्ञान से ही सांसारिक पदार्थों की अवास्तविकता का बोध होता है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“संसार का बीज शरीर में ही है”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“सत्संग की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जीवन-पथ को प्रकाशित करनेवाली यह एकमात्र ज्योति है। दान, तप, तीर्थयात्रा और धार्मिक कर्मकांड की तुलना में निश्चय ही सत्संग सबसे उत्कृष्ट है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“जल और लहरों का संबंध अवास्तविक और शाब्दिक है। ठीक उसी प्रकार ज्ञान और अज्ञान का संबंध भी अवास्तविक और शाब्दिक है। यहाँ न अज्ञान ही है और न ज्ञान ही। जब तुम ज्ञान और अज्ञान दोनों को दो ईकाइयों के रूप में देखना छोड़ दोगे तो जो रहेगा वही शेष होगा। विद्या का स्व में परावर्तन ही अविद्या माना जाता है। जब इन दोनों धारणाओं को छोड़ दिया जाता है तो शेष रहता है-सत्य।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“देवताओं ने समुद्र-मंथन के द्वारा जो अमृत प्राप्त किया वह उस अमृत की अपेक्षा घटिया था जो आप जैसे ऋषियों के मुख से आशीर्वाद रूपी अमृतधारा के रूप में निस्सृत होता है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“प्राणों की हलचल प्राणायाम के अभ्यास से भी सरलपूर्वक रोकी जा सकती है। ऐसा एकांत में बिना किसी प्रकार के तनाव-दबाव के संभव है या फिर ओम् के उच्चारण के द्वारा। ओम् का अर्थ समझकर निष्ठापूर्वक उसका उच्चारण किया जाता है जिससे चेतना गहन निद्रा की स्थिति में पहुँच जाती है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“व्यक्ति को रुचियों और कुरुचियों से बचना चाहिए,”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“यह संपूर्ण सृष्टि उस मंच के समान है जिसपर चेतना की उक्त शक्तियाँ समय की धुन पर नृत्य करती हैं। इन सबमें प्रमुख है ‘व्यवस्था’–पदार्थों के अनुक्रम की प्राकृतिक व्यवस्था। इसे क्रिया, इच्छा, इच्छाशक्ति, समय आदि भी कहते हैं। यह शक्ति ही है जिस का आदेश रहता है कि प्रत्येक वस्तु में कुछ निश्चित गुण रहने चाहिए। इन वस्तुओं में घास की पत्ती भी सम्मिलित है और सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा भी। यह प्राकृतिक व्यवस्था उत्तेजना से रहित है परंतु अपनी परिसीमा की दृष्टि से विशुद्ध नहीं है। प्राकृतिक व्यवस्था जिस नृत्य नाटक का नर्तन करती है उसे दृश्य संसार कहते हैं।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“सभी आश्चर्यजनक पदार्थ चाहे वे चेतन हों अथवा जड़ तुम्हें सुख देने के लिए नहीं बने हैं।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“इस संसार में कर्म करता हुआ ज्ञानी व्यक्ति कुछ करता नहीं न ही वह कुछ चाहता है। इसी प्रकार हे राम, आकाश की तरह हृदय में शुद्ध रहो, परंतु देखने में बाह्य रूप से उपयुक्त कार्यों से संपादन में लगे रहो।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“जब वैयक्तिक चेतना अपने को समझने लगती है तो ज्ञान उत्पन्न होता है। पेड़ और चट्टान को जड़ मान लेने पर उनमें संबंध प्रतीत होता है। यह संबंध उनके मूलभूतों घटकों में रहता है जिनमें कुछ विशिष्ट परिवर्तन होने के कारण ही एक पेड़ बन जाता है और दूसरा चट्टान। यही बात रसेंद्रिय (जिह्वा) के संबंध में भी है। पदार्थ के स्वाद के प्रति होनेवाली जिह्वा के तंतुओं की अनुक्रिया का कारण उन तंतुओं के गठन की समानता ही है। 12”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“संत, आंतरिक शांति में निवास करते हैं”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“जब मन इच्छाओं से रहित, भ्रम या भ्रांति से मुक्त, नीरव, शांत और निर्मल होता है तब उसमें किसी प्रकार की न लालसा ही रहती है न किसी के प्रति राग-द्वेष ही। यही आत्मनियंत्रण या मनोविजय है। मोक्ष के जिन चार द्वारपालों का उल्लेख मैंने पहले किया है यह उनमें से एक है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“मन ही क्रिया है। तो भी मन, बुद्धि, अहंकार, वैयक्तिक चेतना, क्रिया, कल्पना, जन्म और मरण, सुप्त प्रवृत्तियाँ, ज्ञान, प्रयत्न, स्मृति, इंद्रियाँ, प्रकृति, माया, गतिविधि तथा ऐसे ही अन्य शब्द शब्द भर ही हैं और जिनका सत्ता से कोई संबंध नहीं।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“असीम चेतना का चिंतन करते हुए भी तुम परम स्थिति में विश्राम प्राप्त कर सकते हो”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“वह सूर्य है जो प्रकाश देता है, वह विष्णु है जो सबकी रक्षा करता है, वह रुद्र है जो सबका संहार करता है। वह आकाश है, वह भूमि है, वह जल है और वह अग्नि है। वास्तव में वह ब्रह्मांडीय चेतना है जो सभी प्राणियों में व्याप्त रहती है। जो कुछ भूत में था, वर्तमान में है और भविष्य में होगा-निश्चय ही वही वह सब है और एकमात्र वही है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“सत्य के ये ज्ञाता मनविहीन होते हैं और पूर्णतः समस्थिति में रहते हैं। वे यहाँ जीवन को खेल के रूप में लेते हैं। वे हर समय अंतर्ज्योति को देखते रहते हैं फिर भले ही वे तरह-तरह के कार्य करते हुए क्यों न दिखाई देते हों।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“यही वह मन है जो संसार के सभी पदार्थों का एकमात्र कारण है। तीनों लोकों का अस्तित्व भी मनःसृजित पदार्थों से ही है। जब मन का अस्तित्व नहीं रहता तो ये लोक भी अपना अस्तित्व खो बैठते हैं।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“पेड़ और चट्टान को जड़ मान लेने पर उनमें संबंध प्रतीत होता है। यह संबंध उनके मूलभूतों घटकों में रहता है जिनमें कुछ विशिष्ट परिवर्तन होने के कारण ही एक पेड़ बन जाता है और दूसरा चट्टान।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth
“जल में शांत रहने और उत्तेजित हो उठने की क्षमता है। इसी प्रकार ब्रह्म में भी शांत होने तथा चंचल हो उठने की क्षमता है। ऐसी ही उसकी प्रकृति है।”
Badrinath Kapoor, Yog Vashishth

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Yog Vashishth (Hindi Edition) Yog Vashishth
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