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“जले उमर-भर फिर भी जिनकी अर्थी उठी अँधेरे में ही,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“पर चुका जा रहा साँस का स्नेह अब
रोशनी का पथिक चल सकेगा नहीं,
आँधियों के नगर में बिना प्यार के
दीप यह भोर तक जल सकेगा नहीं,
पर चले स्नेह की लौ सदा इसलिए
जिस जगह मैं बुझूँ, उस जगह तुम जलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो”
―
रोशनी का पथिक चल सकेगा नहीं,
आँधियों के नगर में बिना प्यार के
दीप यह भोर तक जल सकेगा नहीं,
पर चले स्नेह की लौ सदा इसलिए
जिस जगह मैं बुझूँ, उस जगह तुम जलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो”
―
“जिनके घर न दिया जलता, जिनसे प्रकाश नाराज़ है, राज उन्हें सूरज पर करना मुझे सिखाना आज है,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“आँसू के बाग़ों में जिसने जाकर बोये गीत - रुबाई, सिक्कों की धुन पर अब नाचे उसके ही सुर की शहनाई।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“अब वे रातें न रहीं, अब वे बिछौने न रहे,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“है संसार अरे धनियों का दुखियों का संसार नहीं,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“जिस वक्त जीना ग़ैर-मुमकिन-सा लगे, उस वक्त जीना फ़र्ज है इन्सान का, लाज़िम लहर के साथ है तब खेलना, जब हो समुन्दर पर नशा तूफ़ान का,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“जब लिखने के लिए लिखा जाता है तब जो कुछ लिखा जाता है उसका नाम है गद्य, पर जब लिखे बिना रहा न जाए और जो ख़ुद लिख-लिख जाए उसका नाम है कविता।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“रागिनी है एक प्यार की ज़िन्दगी कि जिसका नाम है गाके गर कटे तो है सुबह रोके गर कटे तो शाम है शब्द और ज्ञान व्यर्थ है पूजा-पाठ ध्यान व्यर्थ है आँसुओं को गीतों में बदलने के लिए लौ किसी यार से लगानी चाहिए।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“और तब तक के लिए अपने कारखानों को, खूब समझा दे कि उगले न ज़हर धरती पर यूँ ही पीती न रहेगी मेरी धरती ये धुआँ यू ही रोती न रहेगी नये भारत की नज़र!”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“दिखे नहीं फिर भी रहे, ख़ुशबू जैसे साथ। वैसे ही यादें तेरी, संग चलें दिन-रात।।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“है अनिश्चित हर दिवस, हर एक क्षण सिर्फ़ निश्चित है अनिश्चितता यहाँ”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“आँसू तो मोती निकला और मोती इक पत्थर निकला भेद खुला ये तब जब अपना सारा वैभव बिखर गया।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना, उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है!!”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“मस्ती के बन की है ये हिरनिया घूमे सदा निर्द्वन्द्व, रस्सी से इसको बाँधो न साधो! घर में करो ना बन्द हम जो अरथ समझे इसका तो फूँक के बाती जली समझे! अपनी बानी प्रेम की बानी…”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“और बैठा हूँ मैं हाथों में लिए कुछ तिनके जबकि नस-नस मेरी रस्सी की तरह ऐंठी है।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“फागुन बिना चुनरिया भींगे सावन बिना भवन भींगे”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“एक क्षुद्र - सा फूल रूप सारे उपवन का? एक बूँद ही तो समुद्र की गहराई है,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“सब की सब सृष्टि खिलौना बन जाये यदि नज़र उमर की लगे न बचपन को!”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“अपनी बानी प्रेम की बानी… बोली यही तो बोले पपीहा घुमड़ें कि जब घनश्याम,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“है अधिक अच्छा यही फिर पंथ पर चल मुस्कुराता, मुस्कुराती जाय जिससे ज़िन्दगी असफल मुसाफ़िर! पंथ पर चलना तुझे तो मुस्कुराकर चल मुसाफ़िर।।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“आँधी के थपेड़े से मोमबत्ती की काँपती लौ न किसी तौर भी जल पाती है!”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“रह गये धरे के धरे ताख में ज्ञान-ग्रन्थ, छुट गई बँधी की बँधी रतनवाली गठरी लुट गई सजी की सजी रूप की हाट”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“पकी निबौरी, हरे हो गये पीले पत्ते आम के”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“है धूल बहुत नाचीज़ मगर मिटकर दे गई रूप अनगिन प्रतिमाओं को,”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“मत पुजारी बन स्वयं भगवान बनकर जी!”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“सूरज के चले जाने पर जैसे फूलों की हँसी सूख के झर जाती है”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“अब वह बचपन न रहा अब वह खिलौने न रहे।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“या फिर बेमौसम डूबूँगा ख़ुद गहरी मँझधार में!”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि
“कविता तू जिसे कहता वो बेटी है तेरी चौराहे पे लाकर उसे नीलाम न कर।।”
― काव्यांजलि
― काव्यांजलि




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