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Rishu Kumar
“किसी ने पूछा, वो लड़की कहाँ की थी,
मैंने कहा—शायद जन्नत से आई थी।
अप्सराओं ने भी जिसे देखकर अपने आईने छुपा लिए,
परियों ने जिसके सामने अपने पंख झुका दिए।
उसके चेहरे पर चाँदनी भी ठहरकर निखरती थी,
उसकी आँखों में पूरी कायनात उतरती थी।
सच कहूँ तो वो हुस्न नहीं, कोई अधूरी दुआ थी—
जिसे ख़ुदा ने जाने किस फ़ुर्सत में पूरा किया था।”
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मैंने कहा—शायद जन्नत से आई थी।
अप्सराओं ने भी जिसे देखकर अपने आईने छुपा लिए,
परियों ने जिसके सामने अपने पंख झुका दिए।
उसके चेहरे पर चाँदनी भी ठहरकर निखरती थी,
उसकी आँखों में पूरी कायनात उतरती थी।
सच कहूँ तो वो हुस्न नहीं, कोई अधूरी दुआ थी—
जिसे ख़ुदा ने जाने किस फ़ुर्सत में पूरा किया था।”
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