Kishore Chaudhary's Blog
April 1, 2026
तीन रातें और चार दिन की ज़िंदगी
एक शहर में दो अजनबी लोगों की थोड़ी फ़्लैशबैक और अधिक वर्तमान में बीती तीन रातें और चार दिन की ज़िंदगी संपन्न हुई। कहानी में तनाव नहीं था। कहानी में प्रेम भी नहीं था। कहानी परिस्थितियों के अधीन जी रहे दो लोगों की दिनचर्या थी।
इस सबके बाद अंत में पाठक के लिए थोड़ी देर सोचने को एक चमत्कार का पाठ था। केसर, जो कि कथा की नायिका है। दूध जैसी बर्फ में घुलकर अदृश्य हो चुकी थी। कथा के आरम्भ में, होटल में काम करने वाली एक पात्र इस कथा में इस तरह छूट गई थी, जैसे कहानीकार अगली कथा उसी की कहेगा। वह पुनः किसी आवेग में लंदन से प्राग की फ्लाइट पकड़ेगा और अनकहे छूट गए इस पात्र के साथ कुछ रातें और दिन बिताएगा। एक नई कहानी कहेगा।कुछ प्रसिद्ध लेखकों की उक्तियों से आरंभ होने वाला हर नया पाठ एक सिलसिला है। जिसके उपशीर्षक इस कथा को औपन्यासिक रूप देते हैं। किंतु वस्तुतः ये एक कहानी ही है। उपन्यास नहीं है। हिंदी साहित्य जगत में पिछले दस एक वर्षों में उपन्यास कहकर लंबी कहानियाँ प्रस्तुत की गई हैं। आपने अगर सोशल मीडिया पर चर्चित सस्ते, हल्के और उबाऊ कथित प्रसिद्ध उपन्यास पढ़े हैं तो आपको याद आया होगा कि वे उपन्यास नहीं हैं। वह सब पुरानी कृतियों के मूल कथानक पर रचा गया, उबाऊ गद्य है। जिस में उधार ली गई या ये कहना ठीक होगा कि सीनाज़ोरी से चोरी की गई कथा पर रचा गया गद्य है। विश्वजीत रानाडे की कहानी प्राग एक साफ़ और सादा कथा है। ये उन कथित उपन्यासों से बेहतर है कि आप पढ़ते हुए अधिक ऊब महसूस नहीं करते हालाँकि कोई जिज्ञासा नहीं जागती कि आगे क्या होने वाला है। एक शहर में तीन दिन चार रात जी लेने जैसा अहसास आपको प्रसन्न करता है कि पढ़ने में आपने समय नष्ट नहीं किया है। जो हुआ अच्छा हुआ। मैंने ये किताब कल एक नौजवान मित्र को सौंप दी है। पता नहीं वह पढ़ पाएगा या नहीं। मैंने उनसे इतना अवश्य कहा है कि आजकल यही शिल्प और ऐसा ही कथानक पढ़ा जा रहा है। मुझे एक बात पर कई बार आश्चर्य होता है कि प्रकाशक कथाकारों को ये क्यों नहीं कहते कि जाइए, कहानी और उपन्यास का भेद पढ़कर आइए। पाठकों के लिए आश्चर्य नहीं है कि अच्छे पाठक प्रायः चुप रहते हैं। मतिहीन पाठक रील्स बनाते हैं और आपको बताते हैं कि कौनसी सात किताबें आपको अवश्य पढ़नी चाहिए। प्राग (उपन्यास) ख्याति प्रकाशन से छपा है। मेरी ये टिप्पणी इस कथा के लिए किसी भी प्रकार समीक्षा नहीं है। ये केवल एक पाठकीय लघु टिप्पणी है। मैं चुप न रहा इसलिए तय है कि मैं अच्छा पाठक नहीं हूँ।
March 14, 2026
कविता कोई रेलगाड़ी है
यह जीवन होने से अधिक छूट जाने के लिए बना है।
अब तक बीता पिछला बरस व्यस्त रहा। सुख से भरा व्यस्त। जिसके बारे में कभी हम सोचते हैं कि ऐसा हो और ठीक वैसा हो जाए। कुछ घटनाएँ जीवन को पूर्वार्द्ध और उत्तरार्ध में विभाजित करती हैं। हम उस लकीर के निकट आकर ठिठक जाते हैं। प्रायः मन अनमना होने लगता है। प्रतीक्षा ऊब में। ढलने लगती है और फिर अचानक पाते हैं कि वह रेखा पार हो गई है। एक सूनापन पसर गया है। अब क्या करें के विचार में डूबे, पीठ के बल लेटे चुपचाप विदा हो चुके क्षण को सोचते हैं। जिस ख़ुशी से हज़ारों किलोमीटर कार भागी जाती थी, वही मंथर हो जाती है। दिल सोचता है, अब कहीं जाकर क्या होगा। फिर अचानक मुस्कुराते हैं कि यही तो चाहिए था। मिल गया। शुक्रिया। किताबें बरस भर छूटी रहीं। कुछ एक मित्रों से कहा “आप किताब मत भेजिए, किसी मेले में या ऑनलाइन ख़रीद की जाएगी” लेकिन काम कुछ और था इसलिए ये बातें भूल के तलछट तक चली गई। उनकी स्मृति लौटी तो सोचा थोड़ा आराम कर लो। कितना सारा पढ़ने को रखा है। पढ़ो। ऐसे में ख्याति प्रकाशन की पुस्तकें अनवरत आती रहीं। छुट्टी से दफ्तर लौटा तो कभी तीन, कभी एक किताब का पार्सल मिला। जैसे किसी ने असमाप्य तृष्णा पर तरलता उड़ेल दी हो। जैसे रेगिस्तान में शाम ढले ठंडी हवा का झौंका आया हो। जैसे कुछ सोचने के बीहड़ में खोए हुए थे और अचानक बाहर आएँ हो। कविताएँ पढ़ना लत नहीं है, आवश्यकता है। कविता बंजर मैदानों, कठोर पहाड़ों, सूने इलाकों से होते हुए शहरों तक जाती हैं। उनकी इस यात्रा में प्रेम साथ चलता है। छूटा हुआ प्रेम, आने वाला प्रेम, भुला देने के मुग़ालते में अटका प्रेम और हर तरह का प्रेम कहीं साथ नहीं छोड़ता। मनीष यादव की कविताएँ कुछ रोज़ से साथ हैं। मैं लेखक की कल्पना नहीं कर पाता। केवल अपने बारे में पढ़ता हूँ। अपने बारे में पढ़ने से मेरा आशय है कि कविता कोई रेलगाड़ी है, जिस में यात्रा कर रहा हूँ। यात्रा का जादू बाँध कर रखता है। मनीष की कविताएँ दूर तक ले जाती हैं। मन बहुत देर तक गीला रहने से उकता सकता है किंतु इन कविताओं में गीलापन चाह की तरह उपजता है। मन चाहता है, बना रहे। कभी स्त्रीलिंग-पुल्लिंग के प्रयोग में असुविधा आती है तो भूलकर आगे बढ़ जाता हूँ। कितने चेहरे, किरदार, भूगोल और कितना सारा जीवन जो सचमुच छूट जाने के लिए बना है। शुक्रिया मनीष, पढ़ना जारी है। लिखना जारी रहे।
March 13, 2026
और फिर हताशा में घर चले जाएँ
हम गालियाँ दें कि उदास खड़े रहें। हम अपनी अंगुलियों में उपजे तनाव को मुट्ठी बन जानें दें कि इसे रिस कर बह जाने दें और फिर हताशा में घर चले जाएँ। रील देखें, लतीफ़े सुनें, भद्दे नाच को कोसें, कुकरमुत्तों की तरह उग आए इन्फ़्लुएंसर्स के लिए बुरा मुँह बनाकर सो जाएँ। क्या करें कुछ समझ नहीं आता।
शाम ही से बुझा-सा रहता है,दिल हुआ है चिराग़ मुफ़लिस का।मीर तक़ी मीर के इस शेर की मानिंद मुफ़लिस के चिराग़ सा दिल लिए, मैं दफ़्तर से निकला और उल्फ़त की दुकान तक पहुँचा था कि इस मुफ़लिसी को दुर्गेश जी ने बढ़ा दिया। उन्होंने बताया कि एक बच्चे को दोस्तों ने पहले बीस हज़ार रुपये का लोन दिया। उस पैसे को ऑनलाइन गेमिंग में लगवाया। इसके बाद उधार लिए गए बीस हज़ार, पैंसठ लाख के ऋण में रूपांतरित हो चुके हैं। बच्चा घर से ग़ायब है। उसके पिता परेशान हैं। पिता कहते हैं “मेरी दिन भर की कमाई साढ़े तीन सौ रुपए है। मैंने स्वप्न में भी लाखों रुपये नहीं देखे।” उनके चेहरे का रंग कैसा है। उनके चेहरे पर चिंता की कितनी लकीरें हैं। ये देख सकते हैं मगर नहीं समझ सकते। उनके दिल का क्या हाल है? ये कोई कार्डियोलॉजिस्ट नहीं बता सकता, केवल कोई दूसरा पिता ही थोड़ा बहुत बता सकता होगा। मैं उदास हुआ। मैं इस घटना को अधिक नहीं सुनना चाहता था कि कैसे एक पत्रकार ख़बर से आगे बढ़कर पुलिस कप्तान साहब को समझाना चाह रहा है कि ये एक सुगठित अपराध तंत्र है। ये कोई भूल या वाणिज्यिक, व्यापारिक गतिविधि नहीं है। इसके बाद किस प्रकार पत्रकार ने प्राथमिक सूचना को लिखवाने में मदद की है। लेकिन दुर्गेश सिंह जो उल्फ़त को बता रहे थे, वह अनसुना नहीं हो सकता था। ब्याज बट्टे का धंधा पूरे देश में है। अनेकानेक समाचार प्रायः पढ़ने को मिलते हैं। सामूहिक आत्महत्या, हत्या और अपहरण तक पहुँचने वाले इन घटनाक्रमों को पढ़कर हम एक बारगी सदमे में आते हैं किंतु तुरत किसी व्यभिचार, अनैतिक संबंध और भोग-विलास की ख़बर पढ़कर सब भूल जाते हैं। हमारी चेतना का स्तर यही रह गया है। हमारी सामाजिक प्रतिबद्धता भी इतनी ही बची है कि पढ़ें और भूलकर आगे बढ़ जाएँ।एडमंड बर्क सत्रहवीं शताब्दी में आयरलैंड में जन्मे एक प्रसिद्ध राजनेता, दार्शनिक और लेखक थे। वे ब्रिटेन की संसद के सदस्य भी रहे और अपने गहरे राजनीतिक विचारों तथा समाज पर लिखे गए लेखों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी एक प्रसिद्ध उक्ति है कि “बुराई की जीत के लिए इतना ही काफी है कि अच्छे लोग कुछ न करें।”दुर्ग सिंह राजपुरोहित एक पत्रकार हैं, वे निरंतर कुछ न कुछ कर रहे हैं। इसलिए उनको अच्छा आदमी कहा जा सकता है। उनके बारे में अनेक लोगों के अनगिनत मत हैं। मैं उन सब पर कभी ध्यान नहीं देता। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता के उलट मेरे विचार हो सकते हैं। किंतु इस व्यक्ति ने कुछ ऐसी लड़ाइयाँ लड़ी हैं, जिनसे लोकतंत्र के अस्तित्व का बोध होता है। हम उन लड़ाइयों को समझ कर समझ सकते हैं कि अंधेरा केवल उजाले की अनुपस्थिति का बिम्ब है। मैंने कहा दुर्ग साहब, एक पत्रकार है कालू माली। वे अंतरराष्ट्रीय पत्रकार होने का दंभ भरने वालों पत्रकारों से अधिक अच्छे हैं। जिस प्रकार से आर्थिक अभावों में जी रहे परिवारों की मदद करते हैं, वह अलभ्य है। एक आप हैं जो किसी व्यक्ति की मदद के लिए पुलिस कप्तान साहब को समझा रहे हैं। प्राथमिकी लिखवा कर आ रहे हैं। बाकी बाड़मेर में सैंकड़ों सोशल मीडिया वाले पत्रकार एक स्पॉन्सर ढूँढ रहे हैं। जिनका वे प्रचार कर सकें। ऐसे मिलियन फॉलोवर्स वाले पत्रकारों का ये समाज क्या करेगा? उनसे क्या पाएगा? तीन सौ साल पहले एडमंड बर्क ने जो बात कही थी, वह बात मेरे बचपन तक जीवित थी। किसी का बच्चा कहीं बेवजह घूमता दिखता तो उसके पिता तक समाचार पहुँच जाता था। बच्चे इस डर से ग़लत रास्ते पर नहीं जाते थे कि हर किसी से उनको डर था। जाने कौन पिता की पहचान वाला हमें देख ले। आज किसी को किसी के बच्चे की फ़िक्र नहीं है। ये कहना ग़लत न होगा कि अभिभावक अपने उन बच्चों के साथ भी खड़े हैं जो ग़लत जाते हुए दिख रहे हैं। ये सबसे अधिक ख़राब बात हुई है। हमने अपना समझने का अधिकार खो दिया है। अब बच्चे फ़लाँ आदमी के हैं, समाज के नहीं हैं। कुछ माह पहले रतन दवे ने एक स्टोरी की थी। वह बच्चों के बारे में थी। इसी प्रकार से नष्ट होते भविष्य के बारे में थी लेकिन उसमें कोई प्रमाणिक बाईट न थी। कथा थी, किंतु तथ्य न थे। आपने आज वह तथ्य बताया। मुझे प्रसन्नता है कि दुर्ग सिंह राजपुरोहित में समाज की चिंता शेष है। लेकिन सामाजिक चेतना युक्त हस्तक्षेप कोमा में जा चुका है। अब व्यक्तिगत प्रयास ही बचे हैं। ये हमारा नया समाज है। •••ये तस्वीर इसी शाम चुपचाप ली गई। ठीक उस समय जब हम इस गोरखधंधे का कोई लतीफ़ा याद कर बैठे।
February 22, 2026
एक चुटकी उदासी - अनुमिता
करोल बाग में एक पुरानी हवेली है। इसमें एक गुलाबी कमरा है। यह नई दुल्हन का कमरा है। स्नेह-सिक्त परिणय-क्षण पुराने नहीं हो पाते उससे पहले नई दुल्हन अल्पकाल में पुरानी हो जाती हैं। उसे कमरे से बाहर कर दिया जाता है।
अनुमिता की कहानी “दूसरी मंज़िल का कमरा” घर की बालकनी में, दफ़्तर की टेप लायब्रेरी में और थोड़ी स्टूडियोज़ में पढ़ी गई। ये दूसरी कहानी है। पहले ग्यारहवाँ घंटा पढ़ी थी। दोनों कहानियाँ उत्तरार्ध तक पहुँच कर पाठक को तीव्र घटनाओं में ले जाती हैं। पाठक का मन चौकन्ना हो जाता है। पढ़ने की गति शिथिल होने लगती है कि दृश्यों की डिटेलिंग छूट न जाए। पुस्तक के पन्नों पर अंगुलियों का दबाव बढ़ जाता है। सावधानी के अतिरेक के बाद भी मैंने कहानी संग्रह को एक ओर ये सोचकर रखा कि इसका पुनर्पाठ अनिवार्य है। टेप लाइब्रेरी में सहकर्मियों की बातचीत का स्वरवृंद मुझे कथानक से बाहर लाता है। इसके बाद भी मन कहानी के किसी दृश्य तक पहुंचता रहता है। मानसिक व्यस्तता एक प्रकार की दुविधा होती है। कि हम काम कम कर रहे होते हैं, सोच के अनगिनत बेलगाम घोड़े अरूप भूगोल में दौड़ते-फिसलते और उचक कर संभलते रहते हैं। उस समय लगता है कि मानसिक दौड़ में घंटे भर के अल्पविराम आते रहें। स्मृति की ऊटपटांग छलाँगों के बीच हम उठते हैं और किसी काम में लग जाते हैं। जैसे कहानी सा ही जीवन चल रहा है। किसी रचना में रचे गए जीवन से बाहर आने में समय लगता है। हवेली में तन्हा रह रही कथा नायिका के अकेलेपन में जीवन की आवश्यकताएं ही हैं जो उसे भयावह सन्नाटे से बचाती हैं। कहानी के कथानक में समाई अनेक घटनाओं, दार्शनिक तत्वों और यथार्थ की नीली सियाह परिस्थिति को एक शोर्ट स्टोरी में संपन्न कर देना आसान नहीं है। जबकि लगता है, कथा साथ लिए चली जा रही है तो अच्छा है।जीवनयापन के लिए धन की पूर्ति हेतु दूसरी मंज़िल का कमरा किराए पर उठता रहता और कथा में नए पात्रों को आगमन होता रहता है। किरायेदार स्त्रियां आती हैं और गुम हो जाती हैं। कथा की अंतिम किराएदार के संग शिखर तक पहुंचते हुए, कथा परोक्ष- अपरोक्ष समाज में हर वर्ग की, अनेक प्रकार के कार्यों और कला से जुड़ी स्त्रियों के माध्यम से थोड़ा डरावना और अधिक सोचने जैसा हाल कर देती है। कि इस समाज में स्त्रियां कैसे गुम हो जाती हैं। गुम हुई स्त्री के लिए सिस्टम कहता है “औरतें तो भाग ही जाती हैं, मैडम जी” और जो बच जाती हैं, उनका स्थान बहुत कठोर हृदय से अनुमिता ने घर के सबसे अधिक कड़े और ठंडे आँगन को बताया है या फिर रसोई घर। मधुमक्खी का छत्ता एक बिंब है। हवेली के अनेक कमरे और अनेक दरवाज़े छत्ते की भाँति ही हैं। किंतु इस छत्ते में रानी मधुमक्खी दर-ब-दर है। कहने का अभिप्राय रहा होगा कि मनुष्यों के समाज की तुलना में मधुमक्खियों का समाज अधिक सुंदर है। जहाँ हर एक का अपना स्थान है। वहाँ कोई गुलाबी कमरा नहीं है। ये सब मैं सोच रहा हूँ। कहानी इतनी भर नहीं है। कथा में कहा गया संसार सजीवता से पाठक के आस पास उपस्थित रहता है। ख़ालीपन नहीं है। कथा के तत्व मुखर हैं। किंतु एक बार पढ़ लेने भर से कथा की गूढ़ता तक पहुँच पाना सम्भव नहीं होता। कहानी संग्रह एक सहकर्मी माँग लेती है। ये किताब मुझे दे दीजिए। अब वे सोमवार को मिलेंगी। मेरा मन है कि कहानी पढ़ने वाला बताए कि क्या पढ़ा और कैसा लगा। हर एक कहानी हर व्यक्ति के मन में अलग तरीके से घुलती है। उसका अलग रंग बनता है। कहानी कहने वाला, कहानी कहने के बाद किस रंग में घुलता होगा?
February 19, 2026
जीवन अलग रूपों में
कुल जमा चार फ़ोन कॉल से मालूम हुआ कि विचित्र मौसम है। कहीं छींटे गिर रहे और कहीं हवा तेज़ है। इधर सूनी दोपहर के बाद उतरी शांत शाम पसरी हुई है। इस शाम में अचानक लगता है कि मानू को यहाँ होना चाहिए था।
एक लंबे कहे जा सकने योग्य अवकाश से कार्यालय लौटने पर चार पुस्तकों का बंडल मिला। “ये कुछ दिन पहले आया था” ऐसा कहते हुए कार्यालय के सहयोगी के स्वर में थोड़ी उदासी थी। जैसे मेरे अवकाश पर होने के कारण समय पर पुस्तकें मुझ तक न पहुँच पाने में उनका कोई दोष है। मैंने कहा “ ये सुंदर बात है। इस बार लौटने पर खालीपन बहुत बड़ा है। ये पुस्तकें कुछ क्षण मेरा सहयोग करेंगीं।” हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करते हुए बंडल ले लिया। पतझड़ कहीं आया होगा मगर मुझतक नहीं आया। मैं किसी स्वप्न में साधारण जीवन जिए जा रहा हूँ। कभी लगता है कि स्वप्न का न टूटना अच्छा है। कभी सोचता हूँ, चलो उदास आदमी, आगे चलो। इसलिए दोपहर में निर्जन हो चुकी सड़क पर विचारों में खोया हुआ घर पहुँच जाता हूँ। रेगिस्तान का सूनापन साथ चलता है और मैं शुक्रिया कहता जाता हूँ कि क्लस्ट्रोफ़ोबिया से मुक्ति केवल दुर्गम भूगोल ही दे सकता है। जैसे पहाड़, समंदर और रेगिस्तान। मैं अपने ख़ालीपन को शब्दों से भरने की जुगत में हूँ। कि लिखना आरम्भ करूँ तो अपनी कथा के पात्रों के दुख, अकेलेपन और असीम उदासी में रम सकूँ। मैं भूल जाऊँ कि दफ़्तर जाना होता है, रेडियो पर बोलना होता है और स्टूडियो में रिकॉर्डिंग्स करनी होती है। मैं केवल नशे में जीने की कामना को फलीभूत होते देख सकूँ। देखूँ भी नहीं बस ये गुज़र जाए और मुझे ख़बर न हो। एक चुटकी उदासी। ये शीर्षक मन को छू लेने के योग्य था। किसी नई किताब पर लिखा हो कि ये कहानी संग्रह है तो लाज़िम है कि मेरी अंगुलियाँ सबसे पहले उन्हीं पन्नों को टटोलने लगेंगीं। कहानियों से प्रेम आपको सुंदर प्रेमी बनाता है। वह जो बुलबुलों की तरह फूटता है। वह जिसमें सात रंग छिपे रहते हैं। वह जिसे ठहरे हुए पाठक उपेक्षा से देखते हैं। लेकिन वे नहीं जानते कि कहानियाँ प्रेमी के छोटे चुम्बनों की भाँति होती हैं। उम्र भर याद रह सकती हैं। मैंने एक कहानी पढ़ी। ग्यारहवाँ घंटा। ग्यारह की संरचना काफ़ी रोचक है। इस के रूप में अनेक अर्थ गढ़े जा सकते हैं। ये शुभ है। ये पूर्णता भी है। लेकिन इसके आगे का संसार जटिल होता है। जहाँ से एक असामाप्य उलझन और कार्य आरम्भ हो जाता है। कहानी अनुमिता शर्मा की कही हुई है। जब आप बहुत अकेले और अशांत होते हैं तब अचानक कोई चिड़िया चहचहाती है। कोई भ्रमर गुनगुनाता है। कभी कान बजने लगते हैं। ठीक ऐसे बेतरतीब उलझे हुए होने में किसी प्राचीन वस्तु तक पहुँचने की भाँति, इस कहानी तक पहुँचा। मैंने अनुमिता को पहली बार पढ़ा। एक कहानी भर पढ़ने से क्लारिस लिस्पेक्टर की स्मृति हो आई। बीसवीं सदी की कहानीकार हैं। उन्हें पढ़ते समय अक्सर लगता है कि कहानी बाहर नहीं घट रही, मन के भीतर घट रही है।वे कहानी नहीं सुनातीं — चेतना को पकड़ती हैं। पढ़ते समय लग सकता है कि घटना लगभग नहीं है। जबकि सबकुछ घटित होता है। घटना से जुड़ने के लिए पात्र के मन की सूक्ष्म हलचल की परछाई को पकड़ना होता है। समय की इतनी उलट देर होती है कि पाठक रेगिस्तान की शाम को देखते हुए अनेक रंगों से गुज़रता हुआ भूल जाता है कि कौनसा रंग कब देखा और स्थायी रंग क्या था। घटना को अनुभूति में बदल देना, क्लारिस लिस्पेक्टर का सिग्नेचर है। अनुमिता को पढ़ते हुए पाया कि घटनाएँ पिघल कर अनुभूतियों में ढल चुकी हैं। पिघले हुए मोम की संरचना एक ऐब्सट्रेक्ट आर्ट है। अनुमिता की कहानी ग्यारहवाँ घंटा इसी प्रकार का कोई जादू है। अस्तित्व का अनुभव। आह। ये सब लिखते समय कानों पर पास ही बजते शादी के गानों की जुएँ रेंग रही हैं। जल्द ये क़स्बा छोड़कर गाँव चला जाना चाहता हूँ। हालाँकि जानता हूँ वहाँ जीवन अलग रूपों में अधिक कठिन है। जैसे अनन्या बिल्ली को सौत समझती है।
September 28, 2025
तुम्हारी आँखों में डूबता हूँ।
एक गडरिया
अपनी समस्त भेड़ों को लेकर लौटता हुआखो जाता है ढलान के पार।
ठीक ऐसे मैं अपनी समस्त इच्छाओं के साथ
तुम्हारी आँखों में डूबता हूँ।
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चिड़िया एक चहक में हँसती है
मैं बंद आँखों से तुमको देखता हूँ
जबकि तुमको कभी देखा ही नहीं।
जबकि चिड़िया सचमुच हँसती है।
•••
तुम्हारी ठोड़ी का तिल विस्मृति में अलभ्य हो जाएगा। सूरत की याद धुंधली सी शेष रह जाएगी। उस समय कोई पुरानी तस्वीर दिख जाएगी तो शायद कोई बात भी याद आएगी। शायद सोचें भी कोई बात अनकही रह गई थी।
एक शोर है। कानों को छूकर गुज़र रहा है। दुनिया ठहरी हुई है मगर भागती सी नज़र आ रही है। हर लम्हे कोई दृश्य, कोई चौंध या कोई आवाज़ जागती है बुझ जाती है।
अपने होने के प्रदर्शन को बहुत दूर तक फैला देने को पाँखें फलाए हुए लोग उड़ते जाते हैं। उनको देखकर दिल उदास होता है। कहाँ जाओगे? कितनी दूर जाओगे। कितने बचे रहोगे। सब क्षण भर में स्मृति से मिट रहा है।
कोई नाम, यश, प्रतिष्ठा कुछ भी नहीं है। सबका वहम है जैसे कुछ बन रहे हैं। असल में मिटते जाने को देखने का हुनर कठिन है। इसलिए सब बनते जाने में लगे हैं। ये भोलापन है। ये नादानी है।
September 8, 2025
भ्रम है कि कुछ
तुम मुझे प्रेम कर रहे हो और ये एक इल्यूजन है। तो भी ये बहुत सुंदर है।
इन दिनों मैं जब लिखता हूँ तब वाक्य से कोई एक शब्द छूट जाता है। उस छूटे हुए शब्द को मैं पढ़ता हूँ। जबकि वह वहाँ लिखा नहीं होता है। कुछ देर बाद मुझे समझ आता है कि वाक्य से शब्द छूट गया है।
मैं जो सोचता हूँ, उसे ठीक लिखा गया है के भ्रम में जीना कोई अचरज भरी बात नहीं है। अनेक व्यक्तियों के साथ ऐसा होता। किंतु हम प्रायः अचम्भे से भर उठते हैं। जैसे किसी शहर पहली बार गए हों और अनुभूत करें कि इसे पहले भी देखा है।
हम किसी अजनबी को देखकर चौंक जाएँ और समझें कि इस व्यक्ति से पहले भी मिलना हुआ है। किसी दफ्तर में काम आरम्भ करें और पाएँ कि अरे मैं यहाँ पहले भी काम करता था।
ये सब असामान्य जान पड़ सकता है किंतु हमारा मस्तिष्क निरंतर सूचनाओं से घिरा रहने के कारण कभी जटिल व्यवहार करता है। जैसे कि कोई ठीक बात नहीं है मगर रोना आ रहा है। रोना आना अकारण नहीं है। वास्तविक कारण मस्तिष्क की जटिल रचना में कहीं खो गया है। रोने का कारण बनने वाली सूचना, अनुभूति को जागृत करके कहीं अंतरिक्ष में खो गई है।
ए स्ट्रीटकार नेम्ड डिजायर, टेनेसी विलियम्स का सबसे प्रसिद्ध नाटक है और यह 20वीं सदी के अमेरिकी साहित्य का एक क्लासिक माना जाता है।
इस नाटक की नायिका ब्लैंच डुबोइस अपने पुराने, अभिजात्य परिवार का घर खोने के बाद, अपनी बहन स्टैला के पास न्यू ऑरलियन्स में आ जाती है। उसका पुराना घर नहीं रहा। वह नए शहर में आ गई है किंतु मस्तिष्क में वह घर किसी जानकारी की भाँति सदैव उपस्थित रहेगा। हम अनेक बार किसी पुराने में घर में होने का आभास करते हैं। जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं होता। तो क्या वह घर चलकर हमारे पास आ जाता है। या हम उसी घर में लौटने की इच्छा से किसी भ्रम में पड़ जाते हैं।
ब्लैंच के चरित्र के माध्यम से, ये धारणा उभरती है कि कभी-कभी लोग भ्रम को यथार्थ से अधिक पसंद करते हैं। इल्यूजन सम्मोहक भी हो सकता है। ब्लैंच कहती है कि उसे कठोर सच्चाई नहीं चाहिए, बल्कि सुंदर झूठ चाहिए।
हाई होने की अवस्था या मद में होने पर वास्तविकता और सोचने-समझने में अंतर आ जाता है। कभी-कभी भ्रम जादुई, अविश्वसनीय और प्रेतात्मक दृश्य रच लेता है।
जेम्स थर्बर की एक कहानी है द सीक्रेट लाइफ ऑफ़ वाल्टर मिटी। अच्छी कहानी है। नायक एक साधारण व्यक्ति है। वह अपनी पत्नी के साथ शहर में खरीदारी करने जाता है। लेकिन रोज़मर्रा की हर छोटी घटना उसके भीतर कल्पना का तूफ़ान पैदा कर देती है।
जब कार चला रहा होता है, वह खुद को बहादुर पायलट के रूप में देखता है। जब अस्पताल के पास से गुजरता है, तो खुद को एक महान सर्जन समझने लगता है जो एक जटिल ऑपरेशन कर रहा है। अदालत के पास से गुज़रते ही वह कल्पना करता है कि वह एक मामले का मुख्य गवाह है और बहादुरी से गवाही दे रहा है।
असलियत में वाल्टर बहुत शर्मिला आदमी है मगर कल्पना में वह निडर और आत्मविश्वासी व्यक्ति है।
वॉल्टर अपने नीरस जीवन से बचने के लिए कल्पना की दुनिया में जीता है। असल जिंदगी में वह जो नहीं कर पाता, कल्पना में करता है। इसे पलायनवादी होना कह सकते हैं। मगर ये कल्पनाएं उसके लिए जीने का साहस जुटाती हैं।
हम जीवन के लिए अनेक जुगत लगाते हैं। ऐन ऑक्युरेंस एट आउल क्रीक ब्रिज, सदी से अधिक पुरानी कहानी है। एम्ब्रोस ब्राइस ने एक ऐसा पात्र रचा, जिसे फाँसी दी जानी है।
फाँसी तय है मगर जैसे ही फंदा खींचा जाता है पेटन फ़ार्क्वार नदी में गिर पड़ता है। असल में उसके फंदे की रस्सी टूट जाती है। इसके बाद वह गोलीबारी से बचता हुआ जंगल में भागता जाता है। इस भागने की डिटेलिंग अद्भुत है।
वह अपने घर पहुँच जाता है। अपनी पत्नी को देखता है। वह उसे गले लगाने को होता है कि गर्दन के टूटने की आवाज़ आती है।
कथा के उपसंहार में पाठक को समझ आता है कि वह वास्तव में भ्रांति में जी रहा था। माना जाता है कि मृत्यु से ठीक पहले इंसान का मन तेज़ी से काम करता है। पूरा जीवन या समस्त कल्पनाएं एक ही पल में उसके मस्तिष्क से गुज़र सकती है। ये भी एक भ्रम से भरा क्षण होता होगा कि द्रुत गति से भागते अतीत के दृश्यों को वह सचमुच का जीवन समझता है।
अनेक बार हमें आख़िर तक मालूम नहीं होता ये भ्रम है या सच। कभी हम भ्रम को सच मानकर उम्र भर इसी विश्वास में बने रहते हैं। ये भी जीवन की लालसा ही है।
सुषमा गुप्ता का नवीनतम कहानी संग्रह मन विचित्र बुद्धि चरित्र कुछ माह पहले पढ़ा था। इस संग्रह की कुछ कहानियों में भ्रम का सुंदर रूपायन है या ये तत्व उपस्थित है।
मन्त्रविद्ध कथा और अन्य कथाओं की पृष्ठभूमि सुंदर है। अलोप होते दृश्य से नवीन दृश्यों तक का निष्क्रमण अत्यधिक तीव्र है। पात्र भावनाओं की जटिलता में उलझे हुए हैं। उनको जो चाहिए वह कहते नहीं हैं, जहाँ होना चाहते हैं, वहाँ होने का स्वप्न इस तरह देखते हैं, जैसे वह वास्तविक जीवन है।
उनके पास भी भ्रम है कि कुछ छूट गया है किंतु वे पुनः स्वयं को छूटे हुए स्थान पर पाते हैं। वे प्रेम से भरे हैं किंतु प्रेम के प्रकटीकरण में असमर्थ हैं। वे प्रेम की भावुकता का स्पर्श महसूस करते हैं। किंतु जाग में सोए हुए और सोने में जागे हुए प्रतीत होते हैं। वे अपनी कल्पना से दीवार के पार देख सकने जैसा अनुभूत करते हैं। उनकी कल्पना या भ्रम की वह स्थिति जिसे वे सच समझते हैं, उस में जीवन को पूर्ण वास्तविक जानते हैं। उनके सम्मुख उपस्थित संसार वास्तविक होते हुए भी अचरज भरा होता है। इस अनुभूति का धरातल इल्यूजन है।
कथाएं लंबी हैं। शोर्ट स्टोरी के फॉर्म में आते ही एक दबाव में उछलने लगती हैं। जैसे गुब्बारे फोड़ने के खेल में कोई बार-बार चूकता है। एक आसान काम क्लिष्ट होता जाता है। कथानक में पाठक को अपनी कल्पना के कुछुओं से उतर कर प्रेत की भाँति दूसरे दृश्य में पहुंचना होता है।
सब कहानियाँ आपको पसंद नहीं आ सकती। क्योंकि आपकी रुचि विशेष प्रकार के कथानक, शिल्प और डिटेलिंग में होती है। कथाकार अलग समय में अलग संसार रचता है। जिसकी भाषा और क्रियाएं भी अलग हैं। एक ही कथाकार की अलग कथाओं के लिए मेरा मन सचेत रहता है। वह हमेशा इस बात की तैयारी रखता है कि अगली कहानी में कथाकार किसी अन्य भाव में विचरण कर रहा होगा।
इल्यूजन का संसार अद्भुत होता है। हम कितनी बार भ्रम के प्रेम में सुख पाते हैं और कितनी बार अपने साधारण होने को लांघकर कल्पना में विशेषज्ञ व्यक्ति के किरदार में पहुँच जाते हैं। कभी हम एक रेलवे स्टेशन पर बैठे वाइट क्रिपर्स को देखते हुए रंग बिरंगे फूलों से भरी घाटी में घूम आते हैं।
September 7, 2025
तुम एक तत्व हो
प्रेम फीलिंग नहीं एक एलिमेंट है।
पहले अनुभूत हो कि सब कितना ख़ाली सा है। इसके बाद लगे कि क्या चाहिए। इसके बाद पाएँ कि दीवारें, छत और खिड़कियां एक क़ैद सी जान पड़ रही हैं। फिर हम घर के अलग कमरों में टहलते हुए ढूंढें कि क्या कम पड़ गया है। फिर हम सोचने लगें कि क्या चाहिए।ठीक उस समय लगता है कि ये नई चीज़ है जिसकी कमी हो गई है। हमको एक टाइट हग चाहिए। ऐसी बाँहें कि देर तक उनमें उलझे खड़े रहें। अपने आप को भूल जाएँ। उससे कहें कि अब सामने बैठ जाओ। तुमको देख लें। उस तरह देखें जिसे निहारना कहा जाता है। आँखों में झांकते जाएँ। फिर सर से पांव तक देखें, जैसे पहली बार देख रहे हों।
कोई हल्का स्वादिष्ट भोजन मंगवाएँ। थोड़ा हाई होने का सोचें मगर डिनर न करते हुए केवल डिनर की टेबल पर बैठे देखकर हाई हो जाएँ।
दुनिया से कहें कि तुम्हारी चिंता न करने के लिए हमें माफ़ कर दो। कल सुबह जागेंगे तब संभव हुआ तो तुमको सोचेंगे। फिर चिपक कर सो जाएँ। जैसे कोई शिशु सोता है। वह है। बस।
इतना समझ कर लगता है कि प्रेम एक अनुभूति नहीं है, ये एक तत्व है। जिसकी हमारे जीवन में कमी हो गई थी। ये तत्व जो हमारे जीवन की वैसी ही आवश्यकता है जैसे मैग्नीशियम। जैसे दूसरे जीवनदायी पदार्थ।
कभी यह तत्व हवा की तरह अदृश्य होकर भी हमें छूता है, और कभी यह जल की तरह बहकर हमें शीतलता देता है।
अनुभूति” और “तत्व” अलग होते हैं। अनुभूति का मतलब है किसी चीज़ को महसूस करना। यह वैयक्तिक होती है। यानी हर व्यक्ति की अनुभूति अलग हो सकती है। जैसे मीठा खाने पर आनंद की अनुभूति। प्रिय व्यक्ति से मिलने पर प्रेम की अनुभूति। ठंडी हवा में सिहरन की अनुभूति।
अनुभूति बदलती रहती है, व्यक्ति-व्यक्ति और समय-समय पर अलग हो सकती है।
तत्व का मतलब है मूलभूत सच्चाई या आधारभूत घटक। यह निरपेक्ष होता है – यानी व्यक्ति की सोच से नहीं बदलता। जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश – ये पाँच तत्व। सत्य को भी “तत्व” कहा जाता है, क्योंकि वह अपरिवर्तनीय है।
“प्रेम एक तत्व है” कहने का अर्थ है कि प्रेम जीवन का आधारभूत, सार्वभौमिक सत्य है। क्योंकि तत्व स्थिर और शाश्वत माने जाते हैं, वे परिस्थितियों के बदलने से नहीं बदलते। प्रेम को “अनुभूति” कहने पर हम उसके महसूस होने की बात कर रहे होते हैं, और प्रेम को “तत्व” कहने पर हम उसके शाश्वत, मूलभूत स्वरूप की बात कर रहे होते हैं।
प्रकाश जिसे छुआ नहीं जा सकता। केवल वह हमें छूता है। उस को तत्व मानने का विचार कई परंपराओं और दर्शनशास्त्र में भी है। भारतीय दर्शन में पाँच तत्व माने गए हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। यहाँ “अग्नि” को केवल आग ही नहीं, बल्कि प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। यानी, प्रकाश अग्नि-तत्व का ही एक रूप है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार, प्रकाश ऊर्जा का एक रूप है। यह किसी पदार्थ की तरह ठोस “तत्व” नहीं है, लेकिन प्रकृति का मूलभूत घटक है।
तो क्या प्रेम एक अनुभूति है। हमने प्रेम महसूस किया। अगर हमने प्रेम महसूस न किया तो कोई बात नहीं। जबकि वह जो तड़प और बेचैनी होती है, वह केवल अनुभूत करने की नहीं होती। वह होती है एक कमी। एक तत्व की कमी। ऐसा तत्व जिसे छुआ नहीं जा सकता, किसी भौतिक आकार में देखा नहीं जा सकता मगर उसके अभाव में हम बेचैन हो जाते हैं। हमारा मस्तिष्क उधेड़बुन में फँस जाता है।
तो ये आवश्यक है कि गले लग जाएँ, बाँहों में भर लें और सिमट कर निकट सो जाएँ। यही मन उसे तत्व बनाता है। हालाँकि मैं स्वयं अनेक बार इस स्थिति में कोई हल खोजने लगता हूँ। जिसमें किसी दूसरे की उपस्थिति आवश्यक न हो। मेरा सोचना मुझे प्रायः दुविधा में डालता है।
कभी लगता है तुम भी एक तत्व हो, जिसके बिना काफ़ी गड़बड़ें खड़ी हो जाती हैं।
September 4, 2025
अर्ध राजनीतिक कविताएँ
मन पर दो लगाम लगानी पड़ती हैं।
मन कहे कि पुस्तक तो आपने पढ़ ली है। अब मैं दौड़ सकता हूँ। ठीक उसी समय दूसरी पुस्तक उठा ली जाए। मन कब लगाम तुड़ा बैठे, इसका भी कुछ ठीक नहीं है। किंतु मैं पुस्तकों के घेरे में उसे बाँधे रख लेता हूँ। अनुराग वत्स के प्रकाशन से जब पहला परिचय हुआ तब वे पंद्रह के आस-पास पुस्तकें प्रकाशित कर चुके थे। हमने राजमा चावल खाए। काग़ज़ी और प्लास्टिक की पत्तलों को समेटा। उनको कूड़ेदान में डालकर एक साथ चल दिए थे। रुख़ की कुछ पुस्तकों को कोमलता से छुआ। उनके पन्नों का रंग आँख भर देखा। स्याही की सुगंध लेने के लिए क्षणभर पुस्तकों को चेहरे में निकट रखा। फिर अनुराग से कहा। कृपया सब पुस्तकें भिजवा देना। उस पार्सल में आई पुस्तकों में सबसे पहले व्योमेश शुक्ल को पढ़ना आरम्भ किया था। बनारस पर गद्य। चालीस एक पन्ने पढ़े थे कि पुस्तक घर के चार-पाँच कमरों में रखी अनेक पुस्तकों के बीच कहीं खो गई। इसके बाद उसकी कई बार स्मृति उभरी किंतु वह जिस प्रकार आई थी, वैसे ही खो भी गई। कुछ मित्रों ने कहा व्योमेश शुक्ल ने अच्छा लिखा है। मैंने कहा मैं शीघ्र इस पुस्तक को पूरा पढ़ लूँगा। अचानक किन्हीं कारणों से व्योमेश यहाँ-वहाँ बोलते हुए दिखे। उनको सुना तो जैसे पढ़ने की उत्सुकता पूर्ण हो गई। लेखक को एक्टिविस्ट की तरह देख लेने से मन, उसके लिखे की खोज से भटक जाता है। वह जाने कितना सुंदर मन होगा, ये जानने की चाह पर संतोष आ गिरता है। उसी पार्सल में पंकज चतुर्वेदी का कविता संग्रह सम्मिलित था। आकाश में अर्धचंद्र। सुंदर शीर्षक है। आधा होना अनेक भावों से भरा होता है। आशा, प्रतीक्षा अथवा अफ़सोस। मुझे आशा थी। कहीं से देखा गया अर्धचंद्र आधे मारग के शेष होने की भाँति है। आपने अर्ध राजनीतिक कविताएँ पढ़ीं होंगीं। वे कविताएँ जो सीधे सत्ता को बदलने का आह्वान नहीं करती वरन् वंचित वर्ग के दुखों, सामाजिक असमानता और लैंगिक पक्षपात जैसे विषयों पर मुखर होती हैं। वे जो सत्ता की मनोवृत्ति को सरल शब्दों में परिभाषित करती हैं। पंकज चतुर्वेदी की कविताएँ ऐसा ही कोमल हस्तक्षेप हैं। नब्बे का दशक आरम्भ हुआ तब मैं हिंदी साहित्य में स्नातक कर चुका था। मेरा सामना ऐसी ही कविताओं से हुआ किंतु वे पूर्ण राजनीतिक कविताएँ थीं। सब न सही किंतु अधिसंख्य कविताएँ ऐसी ही थी। जिन्हें पढ़कर भारी ऊब होती थी। उनमें से जो तत्व अनुपस्थित था, वह थी कोमलता। यही तत्व आकाश में अर्धचंद्र रच रहा होगा। मैंने इस संग्रह की भूमिका में व्योमेश शुक्ल का नाम पहले देख लिया किंतु उनकी बात समस्त कविताओं के बाद पढ़ी। एक सुंदर और डरावनी बात हुई। कविताएँ पढ़कर मैं जिस कविता को आपके साथ बाँट लेना चाहता था, उसी को व्योमेश शुक्ल ने भूमिका में चुना था। ये सुंदर बात है कि एक कविता ने दो मन को बराबर छू लिया था। डरावना ये है कि बाक़ी कविताओं का क्या? इस कविता संग्रह का एक भाग है, अमरूद का पेड़। ये गद्यात्मक कविताएँ हैं। मैंने इस भाग को बहुत धीमे पढ़ा। ये भाग मेरे मन का रहा। इसमें कुछ स्वतंत्र कविताओं के अतिरिक्त व्यक्तियों के लिए लिखे गए नोट्स कहे जा सकते हैं। मुझे साहित्य की इस परम्परा से कभी प्रेम नहीं हुआ कि किसी व्यक्ति के लिए कविता लिखी जाए। ये इसके लिए, ये उसके लिए बाक़ी जाने किसके लिए। अनुराग को मेरा धन्यवाद पहुँचे कि एक लेखक की तस्वीर बनी। दोबारा पढ़ूँगा तो इस कच्ची तस्वीर में सुन्दर लेखक की छवि और स्पष्ट होगी।
September 2, 2025
अविनाशी प्रेम
वेन यू लव डीपली, यू फील डीपली।
बचपन से अब तक कितने ही ऐसे स्त्री-पुरुष निरंतर दिखते रहे हैं। जो अनमने, चुप, उदासीन और अचानक उग्र हो जाने स्वभाव के थे।
अपनी सुध खोए हुए जीये जाते थे। कुछ एक अकेले बात करते थे, कुछ किसी को कोसते रहते थे। कुछ एक व्यर्थ का कूड़ा क़ीमती सामान की तरह अपनी पीठ पर लादे हुए घूमते थे। उनकी बातें किसी को समझ नहीं आती थी। उनमें से कुछ कभी-कभी पत्थर फेंकते थे।
हम में से कोई ठीक-ठीक नहीं जानता कि उनके साथ हुआ क्या था? क्या वे किसी धोखे से दीवाने हो गए या फिर कोई बेशक़ीमती शै खो गई और अचानक हुई कमी ने उनको ऐसा बना दिया था।
विक्षिप्त व्यक्तियों की कथा का आरम्भ कहाँ से होता था, ये कौन जान सकता था। लेकिन इतना तय था कि उनका भरोसा भरभरा कर ढह गया था। वे जिस बुनियाद पर जीवन को देखते थे, वह अचानक पृथ्वी के तल में समा गई थी।
बचपन में ही सुन लिया था कि प्रेम में लोग पागल हो जाते हैं। पागल होना का हिंदी शब्द अधिक गहरा है, विक्षिप्त हो जाना। हमारी बोलचाल की भाषा में इस शब्द को न्यूनतम स्थान मिला है। इसलिए कि इस शब्द से एक भय उत्पन्न होता है। मैं इस शब्द से इतना बचता रहा हूँ कि स्मृत नहीं होता कभी इसका प्रयोग अपने लेखन में किया हो।
मुझे लगता है अनुभूतियों से भरे प्रत्येक व्यक्ति का पाँव कभी न कभी फिसलता है और वह उदासी के गड्ढे में जा गिरता है। चुप रहने लगता है, आँसू बहाता है। एक भयावह घटाटोप में घिर जाता है, जिसमें केवल आशंकाओं का अँधेरा होता है। उसे कोई आशा दिखाई नहीं देती।
कुछ लोग समय के साथ इस से उबर जाते हैं किंतु अधिकांश इस घाव को अंतिम सांस तक सहन करते हैं। इस पीड़ा का कोई ठीक बयान नहीं होता। इसकी कोई निश्चित अवधि नहीं होती। ये सब एक न टलने वाली नियति की भाँति ठहर जाता है।
प्रेम की अनेक दारुण कथाएं हैं। अनेक महाकाव्य हैं। वे सब असमाप्य हैं। उनका विस्तार असीमित हैं। उनका कहा गया दुख, अनकहे दुख के आगे लघु है।
उदासी हमको घेर लेती है। कभी हम स्वयं उदासी का चारा बनकर उपस्थित हो जाते हैं। क्या सचमुच हम अपनी इच्छा से उपस्थित होते हैं अथवा हम इतने कोमल होते हैं कि उदासी के पदचाप सुनकर समर्पण कर देते हैं।
कुछ ठीक कहना कठिन है।
प्रेम कथाओं में समाज बड़ी बाधा के रूप में रहा है। उसमें आरोप, आत्मसम्मान, दुख, बिछोह और उपसंहार में मृत्यु ने स्थाई स्थान बनाए रखा। किंतु इन कथाओं में एक समय दोनों पात्र गहरे और समतुल्य प्रेम में रहे। आगे की कहानी में कोई बाधा खड़ी हुई और कथा ने अपना काल पूरा किया।
भले ही हम कितना भी कहें कि कथानक नया कहाँ से आएगा। वही मनुष्य, वही अनुभूतियाँ और वही परिणाम। किंतु कथा संसार उसी भाँति बदला है, जैसे मनुष्य बदला। प्रेम कथाएं भी इसी नए मनुष्य की, उसके आचरण और जीवन की कही जाने लगीं हैं। कथानक भी अलग है।
इन कथाओं में उपसंहार तो इतना यथार्थ भरा होने लगा है कि हमें सहसा विश्वास नहीं होता कि हम कोई कहानी पढ़ रहे थे। हम जिसे पढ़ रहे थे, उसे पहचानते हैं। वह अभी यहीं-कहीं था। उससे मिले हुए हैं। कदाचित ये हमारे साथ घटित हुआ है।
दो बरस पहले शांभवी को पढ़ा था “मेलडीज़ ऑफ अ व्हेल” शिल्प ने प्रभावित किया। कथानक ने रुक-रुककर पीछे लौटने को बाध्य किया। उस कथा को कहने की प्रक्रिया में सबसे अधिक सुंदर था, उबाऊ, समय-काटू और बोझिल परम्परागत साँचे से बाहर आना।
इस बरस प्रियंका हर्बोला की कही लंबी कहानी पढ़ी, अविनाशी प्रेम। इस कथा को पढ़ने में अनेक सुंदर बातें रही। किसी कथा को सरलता से कह पाना ही कथाकार की उपलब्धि है। कथा में इस समय के पात्रों का सुघड़ चित्रण अद्भुत है। इतना सुंदर कि जैसे मैं अविरल को जानता हूँ। हो सकता है, थोड़ा सा अविरल मुझ में भी है।
निशि जो कि फर्स्ट पर्सन है, जो कथा कह रही है। समस्त कथानक का केंद्र है। वह कहीं से बनावटी और अप्रत्याशित नहीं है। वह किसी रूपक की भाँति भी नहीं है। उसकी मान्यताओं, प्रतिबद्धता और प्रेम में विचलन नहीं है।
कथा में उसकी उपस्थिति ऊपरी दृष्टि से परम्परावादी जान पड़ सकती है किंतु वास्तव में वह प्रेम की एक गहराई है, जो उदासी की सघनता की ओर ले जाती है। इस चरित्र के लिए ही पहले पंक्ति लिखी है कि जब आप गहरा प्रेम करते हैं तब आप गहराई से अनुभूत करते हैं।
इस कहानी को पढ़कर मैंने पहली बार सोचा कि विक्षिप्त, दीवाने या पागल कहे जाने वाले सजीव पात्रों को करुणा की दृष्टि से देखना। उनके बारे में कुछ नहीं जानते हो, दयालु रहना। हो सके तो समझना कि वे अच्छे मनुष्य हैं।
प्रियंका, आपको बहुत शुभकामनाएँ। और कथाएं रचें। कड़े परिश्रम में गहरा धैर्य भी रखें। छूटे हुए रिक्त स्थानों को पहचानें। कथा को कोई दृश्य लांघने नहीं दें। अंत में थोड़ा ठहराव भी रखें कि एक औपन्यासिक कथा में जीवन का वह हर क्षण उतार सकें, जिसकी पाठक को आवश्यकता है।
मैंने इसे पढ़ा, मुझे सुख हुआ। धन्यवाद।
[पुस्तक अविनाशी प्रेम | प्रियंका हर्बोला | प्रकाशक - अंजुमन प्रकाशन]
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