“बहुत लोग मुझसे अपने राज्य और दौलत के लिए लड़े। लेकिन इन्सान के लिए आज तक मुझसे कोई नहीं लड़ा। मैं खुदा का बन्दा महमूद, वही कहूँगा जो मुझे कहना चाहिए। यह औरत, जो मेरे सामने खड़ी है, उसने मुझे एक नई बात बताई है, जिसे मैं नहीं जानता था। इसके हाथ में तलवार नहीं है, तलवार का डर भी इसे नहीं है। यह रोती और गिड़गिड़ाती भी नहीं। बादशाहों के बादशाह महमूद को फटकारती है, इन्साफ के प्यार ने इसे इस कदर मज़बूत बनाया है। इसके आँसुओं का मोल तमाम दुनिया के हीरे-मोतियों से भी नहीं चुकाया जा सकता। इसने महमूद को माँ की तरह नसीहत दी है और अब मैं महमूद, खुदा का बन्दा, वही कहूँगा जो मुझे कहना चाहिए। दो सौ घुड़सवार जिनकी सरदारी फतह मुहम्मद करेगा, इज़्ज़त के साथ बादशाहों के बादशाह की माँ को इसके घर तक पहुँचा दें और उसका हर एक हुक्म बजा लाएँ। महमूद इस औरत”
―
सोमनाथ
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