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“जैसे कामदेव ने रति का मन बहलाने को स्त्री जाति की एक शालभञ्जिका (पुतली) बना दी हो। क्रीड़ा सरोवर के शरद ऋतु के कमलों की शोभा से मानो मदन से उसके चरण बनाए थे। उद्यान की बावड़ी में मस्ती से घूमने वाली हंसिनी की गति लेकर ही इस अलसगमना की चाल बनाई गई थी। अपने तरकश की शोभा से दोनों जाँघें, अपने लीलामन्दिर के द्वार पर लगे कदली की शोभा से घुटने, जैत्ररथ की शोभा से सघन जघन, पीली कमल कलियों से कर्णाभूषण तथा गंगा के भंवर जैसी नाभि बनाई थी। प्रासाद के सोपानों-सी त्रिवली थी। धनुष के आगे लगे फूलों पर मँडराते भौंरों की भाँति उसकी रोमावलि थी। पूर्ण स्वर्ण कुम्भ-से स्तन थे। लतामण्डप की कोमलता से उसके हाथ, जयशंख की सुन्दरता से कण्ठ, कर्णफूल की जगह लटकी आम्रमंजरी की ललाई से वर्ण, बिंबाफल से रक्त वर्ण होंठ, बाणाकार कुसुमों से मन्द मुस्कान, प्रथम कामदूती और कोकिला की वाणी से उसकी बोली, अपनी समस्त सेना के सेनापति मलयपवन की सुगंधि से उसका श्वास, जयध्वज की मछलियों से नयन, धनुषयष्टि से भ्रूलताएँ, अपने प्रथम मित्र चन्द्रमा की कलंकहीन छवि से उसका मुख और लीला मयूर के पँखों से केश बनाए थे। ऐसा लगता था जैसे कामदेव ने ही उसको सकल गन्ध-सामग्रियों, कस्तूरी, चन्दन आदि के जल से नहलाया था और शरीर-भर में कर्पूर का चूर्ण मलकर उपस्थित कर दिया था। वह मूर्तिमती लक्ष्मी-सी सुन्दरी थीं जब उस मालवकन्या ने कामदेव की पूजा कर ली तब देखा कि उसके ही पूजा किए हुए देवता का सा सुन्दर राजवाहन सामने था। वह काम के बस में हो गई। मन्द-मन्द बहती वायु में काँपती लता की भाँति वह हिल उठी।”

Dandi, Dashkumarcharit
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Dashkumarcharit (Hindi Edition) Dashkumarcharit by Dandin
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