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“एकमात्र ओषधि है, यह बात मैंने आपको बतला दी ⁠।⁠।⁠३२⁠।⁠। प्राणियोंको जिस पदार्थके सेवनसे जो रोग हो जाता है, वही पदार्थ चिकित्साविधिके अनुसार प्रयोग करनेपर क्या उस रोगको दूर नहीं करता? ⁠।⁠।⁠३३⁠।⁠। इसी प्रकार यद्यपि सभी कर्म मनुष्योंको जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्रमें डालनेवाले हैं, तथापि जब वे भगवान्‌को समर्पित कर दिये जाते हैं, तब उनका कर्मपना ही नष्ट हो जाता है ⁠।⁠।⁠३४⁠।⁠। इस लोकमें जो शास्त्रविहित कर्म भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये किये जाते हैं, उन्हींसे पराभक्तियुक्त ज्ञानकी प्राप्ति होती है ⁠।⁠।⁠३५⁠।⁠। उस भगवदर्थ कर्मके मार्गमें भगवान्‌के आज्ञानुसार आचरण करते हुए लोग बार-बार भगवान् श्रीकृष्णके गुण और नामोंका कीर्तन तथा स्मरण करते हैं ⁠।⁠।⁠३६⁠।⁠। ‘प्रभो! आप भगवान् श्रीवासुदेवको नमस्कार है⁠। हम आपका ध्यान करते हैं⁠। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षणको भी नमस्कार है’ ⁠।⁠।⁠३७⁠।⁠। इस प्रकार जो पुरुष चतुर्व्यूहरूपी भगवन्मूर्तियोंके नामद्वारा प्राकृतमूर्तिरहित अप्राकृत मन्त्रमूर्ति भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन करता है, उसीका ज्ञान पूर्ण एवं यथार्थ है ⁠।⁠।⁠३८⁠।⁠।”

Ved Vyasa, Bhagavat Mahapuran Vyakhya Sahit Part 01 (Skand 1,2,3,4,5,6,7,8), Code 0026, Sanskrit Hindi, Gita Press Gorakhpur (Official)
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