(?)
Quotes are added by the Goodreads community and are not verified by Goodreads. (Learn more)

“देवि! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसारचक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दुःख भोगता रहता है ⁠।⁠।⁠१८⁠।⁠। माताजी! सुख और दुःखको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा⁠। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दुःखका कर्ता माना करते हैं ⁠।⁠।⁠१९⁠।⁠। यह जगत् सत्त्व, रज आदि गुणोंका स्वाभाविक प्रवाह है⁠। इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक और क्या सुख, क्या दुःख ⁠।⁠।⁠२०⁠।⁠। एकमात्र परिपूर्णतम भगवान् ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दुःखकी रचना करते हैं ⁠।⁠।⁠२१⁠।⁠। माताजी! भगवान् श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं⁠। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है⁠। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है ⁠।⁠।⁠२२⁠।⁠। तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दुःख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं ⁠।⁠।⁠२३⁠।⁠। पतिप्राणा देवि! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ⁠। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें ⁠।⁠।⁠२४⁠।⁠।”

Veda Vyasa, Bhagavat Mahapuran Vyakhya Sahit Part 01 (Skand 1,2,3,4,5,6,7,8), Code 0026, Sanskrit Hindi, Gita Press Gorakhpur (Official)
Read more quotes from Veda Vyasa


Share this quote:
Share on Twitter

Friends Who Liked This Quote

To see what your friends thought of this quote, please sign up!

0 likes
All Members Who Liked This Quote

None yet!



Browse By Tag