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“बुद्धि का कुछ प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाते हैं। जैसे-जैसे विचार कम होते जाते हैं, बुद्धि की शक्ति बढ़ने लगती है। और यह काम भीतर बाहर दोनों प्रकार से मौन रहने से सम्भव होता है। लेकिन हम भीतर से मौन रह ही नहीं पाते। मन की आदत हो जाती है हर वक्त कुछ-न-कुछ बुदबुदाने की। हम इसे विचार का चलना समझते हैं। जबकि यह विचार नहीं होता। यहाँ तीन चीजों को अलग-अलग जानें—1. बुद्धि, 2. विचार, 3. भाषा। विचार बहुत ही सूक्ष्म क्रिया है। किसी माइक्रो चिप की तरह! विचार को तो हम भीतर-ही-भीतर बस जान लेते हैं। और जब हमें उस विचार को किसी के समक्ष व्यक्त करना होता है, तब हम भाषा का सहारा लेकर उसे व्यक्त करते हैं। एक विचार को व्यक्त करने में किसी भाषा के हजारों शब्द लग सकते हैं। इसे समझने के लिए आप एक प्रयोग कर सकते हैं। कभी जब मन में बहुत विचार उठ रहें हों, तो आप उसे लिखना शुरू कर दें या आप एकांत में हों, तो उसे बोलना शुरू कर दें। जो विचार उठे, उसे लिखने लगें या बोलने लगें। आप यह देखकर हैरान हो जाएँगे कि आपके ऐसा करते ही विचार ग़ायब होने लगेंगे।”

Rajeev Saxena, Man Ki Shakti: Chetana Ke Saat Star Ka Adhyatmik Rahasya
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